दिल्ली। हत्या के एक मामले में छह साल तक जेल में रहे व्यक्ति को बरी किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच पर कड़ी टिप्पणी की है।सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यूपी पुलिस की जांच को गलत बताया है।हत्या के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।
अदालत ने कहा कि जांच इतनी गंभीर खामियों से भरी थी कि एक निर्दोष व्यक्ति को छह साल तक जेल में रहना पड़ा। शीर्ष अदालत ने इस मामले को जांच एजेंसियों के लिए एक गलत उदाहरण बताते हुए कहा कि इस तरह की जांच किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि महज अटकलों और मनगढ़ंत कहानी के आधार पर एक व्यक्ति की जिंदगी के छह साल छीन लिए गए।
अदालत ने माना कि किसी भी मुआवजे से यह नुकसान पूरा नहीं हो सकता, फिर भी पीड़ित को राहत देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को 6 लाख रुपये देने का आदेश दिया गया।
क्या है पूरा मामला?
मामला आगरा में दर्ज एक हत्या और अपहरण केस से जुड़ा है। आरोप था कि अक्टूबर 2019 में एक युवक लापता हो गया था। बाद में पुलिस ने दीपक और उसके एक साथी को गिरफ्तार कर उन पर अपहरण, हत्या और सबूत मिटाने का मामला दर्ज किया।पुलिस का दावा था कि दोनों आरोपियों को पीड़ित के साथ देखा गया था।
जांच के दौरान फिरौती मांगने, हत्या करने और शव जलाने जैसी कहानी भी सामने रखी गई। इसी आधार पर दीपक नवंबर 2019 से जेल में बंद रहा।*सुप्रीम कोर्ट को मिली कई बड़ी खामियां*मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जांच रिकॉर्ड की विस्तार से पड़ताल की।
अदालत ने पाया कि शुरुआती एफआईआर में दीपक का नाम तक नहीं था। गवाहों के शुरुआती बयानों में भी उसका जिक्र नहीं मिला। अदालत ने यह भी पाया कि 50 लाख रुपये की फिरौती मांगने का दावा पहली बार अदालत में किया गया था।
पुलिस रिकॉर्ड में इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
डीएनए टेस्ट तक नहीं कराया गया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस जली हुई हड्डियों को पीड़ित का अवशेष बताया गया, उनका डीएनए परीक्षण तक नहीं कराया गया। न मौत का समय तय किया गया और न ही मौत के कारण को वैज्ञानिक तरीके से स्थापित किया गया। इसके अलावा सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी कानून के तहत जरूरी प्रमाणपत्रों के बिना अदालत में पेश किए गए थे।
पेट्रोल खरीदने और बरामदगी के दावे भी कमजोर
जांच एजेंसी ने यह तक पता लगाने की कोशिश नहीं की कि कथित 55 लीटर पेट्रोल कहां से खरीदा गया था। पेट्रोल के डिब्बों की जांच नहीं कराई गई और शव जलाने के स्थान का फोरेंसिक निरीक्षण भी नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि बरामदगी से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का भी ठीक से पालन नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मुकदमे की सुनवाई तेज हुई और इसी वर्ष ट्रायल कोर्ट ने दीपक को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद शीर्ष अदालत ने पूरी जांच प्रक्रिया की समीक्षा की।
डीजीपी और गृह सचिव को भेजा जाएगा फैसला
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों का काम हर हाल में दोषसिद्धि कराना नहीं बल्कि निष्पक्ष जांच कर न्याय सुनिश्चित करना है। कोर्ट ने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के डीजीपी और गृह सचिव को भेजने का आदेश दिया है ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो।











