सरकार की सिर्फ प्रशस्तियां ही नहीं हो सकतीं

Freedom of satire in India

भारतीय लोकतंत्र की गरिमा सदैव बहस, आलोचना और हास्य की स्वतंत्रता में निहित रही है। सियासत हास्य-व्यंग्य-बोध का प्रिय विषय रही, क्योंकि व्यंग्य सत्ता के अहंकार को आईना दिखाता है और जनमानस को सोचने पर मजबूर करता है। लेकिन बीते एक दशक में सत्ता पक्ष व्यंग्य को सहन करने की क्षमता खोता दिख रहा है।

जहां पहले विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों व्यंग्य को सहज भाव से लेते थे, वहां आज आलोचना मात्र को ‘अवमानना’ या ‘अपमान’ का रूप देकर दबाने का प्रयास हो रहा है। यह प्रवृत्ति अभिव्यक्ति की आजादी पर शिकंजा कसने जैसी है, जो लोकतंत्र की आत्मा को क्षीण करती है।

हालिया उदाहरण कॉमेडियन कुणाल कामरा का है। महाराष्ट्र विधानमंडल की विशेषाधिकार समिति के समक्ष डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे पर अपनी व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को लेकर कामरा ने माफी मांगने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कोई भी माफी यदि दिल से न हो तो वह निरर्थक है, बल्कि ऐसी माफी कलाकारों की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक मिसाल कायम करेगी। यह घटना मात्र एक कॉमेडियन की नहीं, बल्कि व्यंग्य की स्वतंत्रता की लड़ाई का प्रतीक है।

इस संदर्भ में पूर्व की उदारता याद आती है। एक समय संसद लालू प्रसाद यादव के तंज, चुटकुलों और देसी व्यंग्य से गुलजार रहती थी। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी इसे हल्के-फुल्के अंदाज में लेते थे। इससे भी पहले मशहूर कार्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण ने जवाहरलाल नेहरू का व्यंग्यचित्र बनाया। नेहरू ने स्वयं फोन कर लक्ष्मण को बधाई दी और कार्टून की हस्ताक्षरित बड़ी प्रति मांगी, जिसे वे फ्रेम करवाना चाहते थे। यह घटनाएं सत्ता की परिपक्वता और आत्मविश्वास को दर्शाती है। नेहरू जैसे नेता व्यंग्य को लोकतंत्र का अभिन्न अंग मानते थे, न कि खतरा।

लेकिन आज का यथार्थ अलग है। अखबारों में कार्टून का कोना सिमटता जा रहा है। राजनीतिक कार्टूनिस्टों पर मुकदमे, आईटी एक्ट के तहत ब्लॉकिंग और सोशल मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य, हेमंत मालवीय सहित कई कलाकारों के कार्टून या पोस्ट को ‘आपत्तिजनक’ मानकर ब्लॉक किया गया या मुकदमा चलाया गया।

कॉमेडियन पुलकित मणि (हनी हू इज फनी) के पीएम मोदी की विदेश यात्राओं पर व्यंग्य वाले रील को भारत में ब्लॉक कर दिया गया।  इसी कई स्वतंत्र पत्रकारों और व्यंग्यकारों के हैंडल्स भी प्रभावित हुए। अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही इन हैंडल्स को कुछ राहत मिली, जो दर्शाता है कि कार्यपालिका की कार्रवाई अक्सर अतिरंजित और प्रक्रिया-विरुद्ध होती है।

क्या हम वह लोकतंत्र बना रहे हैं, जहां हास्य की कोई जगह न हो, आलोचना न हो? जहां केवल प्रशस्तियां स्वीकार्य हों? सत्ता को याद रखना चाहिए कि व्यंग्य लोकतंत्र का ऑक्सीजन है। इसे कुचलने से जनता की आवाज नहीं दबी, बल्कि लोकतंत्र की गहराई कम होती है।

सहिष्णुता ही लोकत्रंत की ताकत होती है और असहिष्णुता लोकत्रंत को कमजोर करती है। सत्‍ता चाहे जिसकी हो उसे सहिष्णुता ही होना चाहिए। और आलोचना को सहने की वैसी ताकत होनी चाहिए जैसा नेहरू ने कहा था ‘लक्षमण मुझे भी मत बख्शना।’

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