वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की आय में असमानता से संबंधित 2026 की रिपोर्ट ने भारत को दुनिया में सर्वाधिक असमानता वाला देश करार दिया है। यह नीति नियंताओं के लिए चिंता कारण होना चाहिए। ध्यान रहे, यह रिपोर्ट अर्थशास्त्री लुकस चांसेल, रिकार्डो गोमेज-कैरेरा, रोवाइडा मोशरिफ और थॉमस पिकेटी ने तैयार की है और यह 2018 के बाद से उनकी तीसरी रिपोर्ट है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में न केवल शीर्ष दस फीसदी लोगों के पास कुल राष्ट्रीय संपत्ति का 65 फीसदी हिस्सा है, बल्कि राष्ट्रीय आय के 58 फीसदी पर उनकी हिस्सेदारी है। इसके उलट आय के निचले स्तर यानी सबसे गरीब पचास फीसदी लोगों की कुल आय में हिस्सेदारी महज 15 फीसदी है! इस रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि चालीस फीसदी संपत्ति देश के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों के पास सिमट गई है।
जाहिर है, इस रिपोर्ट के आंकड़े देश में बढ़ती असमानता की तस्वीर दिखा रहे हैं, जिन्हें सरकार जीडीपी के आंकड़ों के जरिये ढंकने की कोशिश करती है।
एक कल्याणकारी राज्य में सरकार को आम लोगों को बुनियादी सुविधाएं और न्यूनतम आय जैसी व्यवस्था सुनिश्चित ही करनी चाहिए, लेकिन मोदी सरकार ने जिस तरह से एक बड़ी आबादी को नकद हस्तांतरण और पांच किलो अनाज जैसी योजना के जरिये संतुष्ट करने की कोशिश की है, वह देश में बढ़ती आय असमानता पर पर्दादारी को ही दिखाता है।
हैरत नहीं होनी चाहिए कि वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट 2022-23 में इन्हीं अर्थशास्त्रियों ने भारत में अरबपतियों के राज का उभार (The Rise OF Billionaires Raj) देखा था! लेकिन भारत के आर्थिक विकास की इस कहानी का दूसरा पहलू यह भी है कि 2014 से 2024 के दौरान देश में आय में असमानता घटी नहीं है। यही नहीं, श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी बीते एक दशक में 15 फीसदी के आसपास सीमित है।
वास्तव में आय में असमानता से संबंधित रिपोर्ट भारत के अगले कुछ बरस में दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावे की चमक को फीकी कर देती है।
दूसरी ओर भारत जैसी बड़ी आबादी वाले चीन ने अपनी स्थिति में सुधार किया है, जिस पर गौर किया जाना चाहिए, जहां उसने एक बड़ी आबादी को मध्यम और उच्च मध्यम आय वर्ग की ओर आगे बढ़ाने में सफलता हासिल की है।
मुश्किल यह है कि सरकार और उसके नियंता ऐसी हर रिपोर्ट को अपने प्रतिकूल मानते हैं, जबकि ऐसी रिपोर्ट नीतिगत खामियों को दूर करने में मददगार हो सकती हैं।
यह वाकई चिंता का कारण होना चाहिए कि देश में कुछ औद्योगिक घरानों और अति उच्च वर्ग का एकाधिकार बढ़ रहा है, जिसकी वजह से देश की राष्ट्रीय संपत्ति और संसाधन कुछ लोगों तक सीमित होते जा रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि ये हालात नहीं बदल सकते, बशर्ते कि हम रोग की पहचान करने के लिए तैयार हों। क्या सरकार इस रिपोर्ट की प्रस्तावना लिखने वाली अर्थशास्त्री जयति घोष के इस आकलन पर गौर करेगी कि भारत में चरम असमानता के पीछे ढांचागत खामियां नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णय जिम्मेदार हैं!











