लल्लू-फटाखा योजनाओं में लाखों करोड़ फूंक दिए सरकार ने! देश को फायदा हुआ निल बटा जीरो! इंफ्रास्ट्रचर के विकास के नाम पर भारत सरकार का मुख्य शौक है सफ़ेद हाथी पालना। फिर उस सफ़ेद हाथी को राजनीतिक सर्कस का मुख्य आकर्षण बताया जाता है। ये सफ़ेद हाथी और सर्कस लोगों को ठगने का काम कर रहे हैं और कुछ ही लोगों को फायदा पंहुचा रहे हैं। सरकार लाखों करोड़ रुपये इन इंफ़्रा योजनाओं पर बरसा चुकी है और आम आदमी को ठग चुकी है। सीएजी सहित कई सरकारी रिपोर्ट्स इसकी पुष्टि कर चुके हैं। ये 100 से ज्यादा शहरों में एयरपोर्ट बनाने और 28 शहरों में मेट्रो रेल के बहाने बड़े बड़े अनुपयोगी और अनुत्पादक खर्च के प्रोजेक्ट्स हैं।
लगता है कि इन विशालकाय परियोजनाओं को केवल उद्घाटन और प्रचार के लिए ही बनाया गया। देश में दर्जनों एयरपोर्ट ऐसे हैं जहां कोई भी यात्री विमान आता जाता नहीं है। 28 शहरों में मेट्रो का नेटवर्क तैयार किया गया है लेकिन उनमें से केवल तीन शहरों में ही मेट्रो रेल परियोजनाएं सफल हुई है। अनेक मेट्रो स्टेशनों की जगह का उपयोग ऑफिशियल रूप से किटी पार्टी / बर्थ डे पार्टी के लिए हो रहा है , ताकि कुछ ना कुछ तो कमाई हो -जैसे भागते भूत की लंगोटी ! जब जरूरत ही नहीं थी तो क्यों इतना रुपया खर्च किया गया? वह रुपया किसकी जेब में गया और किसकी जेब से गया? इसके पीछे की मंशा सरकार में बैठे लोगों की इमेज बिल्डिंग की कोशिश है और कथित भूमाफियाओं और बड़े उद्योगों को फायदा पहुंचाना भी !
मध्य प्रदेश का खजुराहो एयरपोर्ट को ही लें। जहां न तो कोई फ्लाइट न आ रही है और न जा रही है, लेकिन एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने कस्टमर सेटिस्फैक्शन इंडेक्स में इसे देश का नंबर-1 एयरपोर्ट बताया है! बात में दम तो है, जब कोई फ्लाइट ही नहीं होगी तो पैसेंजर भी नहीं होंगे ! ऐसे में कौन सा पैसेंजर शिकायत कर सकता है ? 5-स्टार रिसॉर्ट जैसा एयरपोर्ट है जहाँ फ्लाइट्स भले ही ज़ीरो हों, पर सजावट ऐसी कि फाइव स्टार होटल भी शर्मा जाएं! सरकार कहा रही है कि यहाँ से पैसेंजर फ्लाइट्स केवल तीन महीने के लिए ही बंद की है, पर चार्टर्ड फ्लाइट्स तो आ-जा रही हैं ना। किसकी चार्टर्ड फ्लाइट्स? अडानी-अम्बानी की? बागेश्वर बाबा की या मुख्यमंत्री की?
गया एयरपोर्ट का हाल देखो ! हर सर्दी में विदेशी तीर्थयात्रियों का तांता लगा रहता है, प्लेन भर-भर के आते हैं, लेकिन पैसेंजर एक्सपीरियंस ऐसा है कि पूछो मत, जैसे किसी ज़माने के रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में आ गए हो।
सरकार ने कुछ साल पहले एक लल्लू-फटाखा स्कीम लांच की थी और नाम रखा था उड़ान यानी ‘उड़े देश का आम नागरिक’ ! स्कीम के तहत विकसित/पुनर्जीवित छोटे और क्षेत्रीय हवाई अड्डे लाये गये जहाँ फिलहाल कोई शेड्यूल्ड कमर्शियल फ्लाइट नहीं चल रही है। ये अस्थायी रूप से नॉन-ऑपरेशनल हैं। कारण है सब्सिडी खत्म होना, कम यात्री संख्या, एयरक्राफ्ट की कमी, खराब विजिबिलिटी, रनवे बंद होना, एयरलाइन का संचालन बंद करना आदि शामिल हैं।
इस योजना में अस्थायी रूप से बिना फ्लाइट वाले 15 एयरपोर्ट शामिल थे। सरकार की तरफ से राज्य सभा में बताया गया था कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, आज़मगढ़, चित्रकूट, कुशीनगर, मुरादाबाद, श्रावस्ती; पंजाब के पठानकोट और लुधियाना; मध्य प्रदेश के दतिया और चित्रकूट के अलावा इसमें पाकयोंग (सिक्किम), भावनगर (गुजरात), अम्बिकापुर (छत्तीसगढ़), राउरकेला (ओडिशा), कलबुर्गी (कर्नाटक), शिमला (हिमाचल प्रदेश) आदि शामिल थे।
इसके अलावा ये एयरपोर्ट्स भी हैं जहाँ से तो कभी भी नियमित विमान सेवा शुरू ही नहीं हुई : डोनाकोंडा (आंध्र प्रदेश),मुजफ्फरपुर, रक्सौल,जोगबनी (बिहार),डीसा (गुजरात), वेल्लोर, तंजावुर (तमिलनाडु), वारंगल, नादिरगुल (तेलंगाना), कैलाशहर, कमलपुर, खोवाई (त्रिपुरा), चकुलीया, ढालभूमगढ़ (झारखंड), खंडवा, पन्ना (मध्य प्रदेश), आसनसोल, बालुरघाट, मालदा (पश्चिम बंगाल),दपारिजो (अरुणाचल प्रदेश),शेला (मेघालय), ऐजॉल (टुरिअल, मिजोरम) आदि।
दरअसल ये एयरपोर्ट कोई ऑपरेशनल जरूरत नहीं, बल्कि प्रॉपर्टी का बड़ा वाला स्कैम है! एयरपोर्ट बनाओ और आस-पास के 30 वर्ग किलोमीटर इलाके के ज़मीन के भाव सीधे दो से 20 गुना बढ़ा दो! फिर अपार्टमेंट, स्कूल और होटल का ऐसा बड़ा वाला बुलबुला बनाओ कि लोग देखते रह जाएं! इंदौर एयरपोर्ट से महाकालेश्वर मंदिर,उज्जैन की दूरी करीब 60 किलोमीटर है। एक घंटे में सड़क मार्ग से वहां जाया-आया जा सकता है, लेकिन उज्जैन में नया एयरपोर्ट बनाने की सुगबुगाहट है।
इन एयर पोर्ट्स से करदाताओं का बोझ बढ़ा। सैकड़ों करोड़ का रखरखाव और सब्सिडी बिना पर्याप्त रिटर्न के दी गई। । यह पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य इंफ्रा पर लग सकता था। यहाँ सरकार की अरबों रुपये की पूंजी फंसी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल इंफ्रा बना देना काफी नहीं। मांग पैदा करने वाले इकोसिस्टम (सड़क कनेक्टिविटी, होटल, व्यापार) और लंबे समय तक सब्सिडी या बेहतर विमान की जरूरत है।
भारत के कई क्षेत्रीय एयरपोर्ट्स महत्वाकांक्षी योजना का परिणाम हैं, लेकिन मांग-आपूर्ति असंतुलन, उच्च लागत और सीमित व्यावसायिक व्यवहार्यता के कारण वे ‘घोस्ट’ बन गए हैं। सैकड़ों करोड़ का खर्च और रखरखाव का बोझ अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक दबाव डाल रहा है, जबकि अपेक्षित लाभ अधूरे हैं।समाधान में मांग-आधारित विकास, बेहतर पूर्वानुमान, राज्य सरकारों की साझेदारी, लंबे समय तक समर्थन और पर्यटन/उद्योग से एकीकरण शामिल होना चाहिए। एयरपोर्ट सिर्फ रनवे नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधि का केंद्र बनने चाहिए। अन्यथा, ये चमकदार टर्मिनल करदाताओं के पैसे की याद दिलाने वाले स्मारक बनकर रह जाएंगे।
यही हाल देश में मेट्रो रेल का हुआ है। 2014 के बाद मेट्रो के नाम पर दिवा स्वप्न दिखाये गये। दूसरे और तीसरे टियर के शहरों को जन्नत बनाने की बात कही गई। यातायात के लिए मेट्रो लाइनों पर लाखों करोड़ रूपये फूंक दिए गये। कोई प्लानिंग नहीं, केवल सियासी मजमेबाजी के लिए 28 शहरों में मेट्रो का जाल डाल दिया गया। हालत यह है कि देश में केवल तीनं शहरों में ही मेट्रो में यात्री आ रहे हैं। किसी किसी शहर में तो मेट्रो लाने के पहले जो अनुमान था, उसके केवल 2 प्रतिशत यात्री ही आ रहे हैं। 25 शहरों की मेट्रो परियोजना सरकार की मनमानी, फिजूलखर्ची और गलत प्राथमिकता का ताबूत बन चुकी है। जिन इलाकों में मेट्रो की ज़रूरत थी, मेट्रो के रुट वहां से नहीं, उन इलाकों से गुजरे गये, जिन इलाकों में नेताओं, अफसरों और माफियाओं की ज़मीनें थी। इससे उनकी ज़मीनें कई कई गुना महँगी हो गई, उन्होंने बहुत माल कूटा, और जनता की कीमत पर लूटा।
जरा सोचिये कि इतने रुपये में क्या-क्या काम हो सकते थे? कितने विश्व विद्यालय, स्पेशयलिटी हॉस्पिटल, कितने कारखाने, कितने शोध केंद्र खुल सकते थे! जब यह बात आप और हम जैसे लोग सोच सकते हैं तो हमारे देश के विशेषज्ञ क्यों नहीं सोचते?
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