I. सितंबर के तीन दिन
इस सितंबर में तीन दिनों के दौरान भारतीय गणराज्य ने अपनी हालत को पिछले एक दशक के किसी भी एक घोटाले से कहीं अधिक स्पष्टता से सामने रख दिया।
23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि भारत के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित रूप से इस बात पर आपत्ति दर्ज की थी कि उनका अपना आयोग किस तरह चलाया जा रहा था।
24 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी, जो गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी हैं, की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने सूचीबद्ध हुई, जिसके पास निवारक निरोध से जुड़े मामलों की रोस्टर जिम्मेदारी नहीं थी।
उस पीठ ने हाई कोर्ट की उनके खिलाफ की गई कड़ी टिप्पणियों और उन्हें व्यक्तिगत रूप से मुआवजा देने के आदेश पर रोक लगा दी। एक कानूनी समाचार वेबसाइट द्वारा इस अनियमितता की ओर ध्यान दिलाए जाने के कुछ ही घंटों के भीतर रोक को सीमित कर दिया गया।
26 सितंबर को तीनों चुनाव आयुक्तों ने बैठक की और एक संयुक्त प्रेस नोट जारी किया, जिसमें कहा गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित सभी आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बाद ही जारी किए गए थे।
पहले दिन ने दिखाया कि चुनावों का निर्णायक खुद अपनी बहुमत के खिलाफ काम कर रहा था।
दूसरे दिन ने दिखाया कि जब उस निर्णायक के परिवार का मामला सामने आया तो सर्वोच्च न्यायालय अपनी रोस्टर व्यवस्था के मामले में लचीला हो सकता है।
तीसरे दिन ने दिखाया कि जिन दो असहमत आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं, उन्होंने एक ऐसे बयान पर हस्ताक्षर कर दिए जो उस असहमति से इनकार करता था।
सप्ताह के अंत तक चुनाव आयोग के भीतर मौजूद आखिरी आंतरिक नियंत्रण टूटा नहीं था; उसे आत्मसात कर लिया गया था।
यह प्रक्रिया सितंबर 2026 में शुरू नहीं हुई थी और न ही यह किसी एक मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के साथ समाप्त होगी।
यह उस प्रक्रिया का नवीनतम चरण है जो 2011 में शुरू हुई थी।
यह प्रक्रिया कहां समाप्त होगी, यह उस सवाल पर निर्भर करता है जो गांधी ने 1909 में पूछा था: हम कौन-सा बीज बो रहे हैं?
II. फाइलें क्या कहती हैं
रिकॉर्ड विशिष्ट है और उसकी ताकत भी यही है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक नामित वैधानिक अधिकारी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को यह अधिकार देता है कि वह तय करे कि मतदाता सूची में कौन रहेगा और कौन बाहर होगा।
जनवरी 2026 से ये निर्णय ECINet के माध्यम से लिए जाने लगे, जो आयोग का एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है और जिसकी अनुमतियां दिल्ली स्थित उसके आईटी निदेशालय के नियंत्रण में थीं।
नवंबर 2025 से ही चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की थी कि वैधानिक कार्य उन्हीं अधिकारियों के पास रहने चाहिए जिन्हें कानून ने इसके लिए नामित किया है और आईटी प्रणालियों को उन अधिकारियों को प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए।
मई 2026 में जोशी ने “मतदाता सूची के डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण’ की चेतावनी दी और एक स्वतंत्र ऑडिट का प्रस्ताव रखा, ताकि यह प्रमाणित किया जा सके कि केवल वैधानिक प्राधिकारी ही मतदाता संबंधी डेटा में बदलाव कर सकते हैं।
यह ऑडिट नहीं हुआ।गोवा में ERO उन 97 मतदाताओं को बहाल नहीं कर सके जिन्हें उन्होंने पात्र पाया था, क्योंकि सॉफ्टवेयर में उन्हें बहाल करने का विकल्प ही नहीं था। कानून ने फैसला अधिकारी को दिया था और सॉफ्टवेयर उसे उस फैसले को लागू करने से रोक रहा था।
’28 जुलाई को एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ने आयोग के आंतरिक काम का पुनर्विन्यास किया और आईटी विभाग की निगरानी कर रहे उप चुनाव आयुक्त को उस जिम्मेदारी से हटा दिया।
अगले दिन दोनों आयुक्तों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
उसके अगले दिन दोनों ने मिलकर उस आदेश को पलट दिया।
19 अगस्त को आयोग ने प्रस्ताव दिया कि उसी उप चुनाव आयुक्त को “व्यक्तिगत आधार” पर उनके कैडर में वापस भेज दिया जाए और कार्मिक विभाग ने 24 अगस्त को इसे मंजूरी दे दी।
जुलाई में फॉर्म 6 जिसे हर नया मतदाता भरता है में यह पूछा जाने लगा कि क्या आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम अंतिम गहन पुनरीक्षण की मतदाता सूची में था।
संधू ने इसे ‘अनधिकृत और अवैध’ बताया।
फॉर्म चुनाव नियमावली में निर्धारित होते हैं, जिनमें संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है और जिन्हें संसद के पटल पर रखा जाता है। इसमें तीन अवैधानिकताएं शामिल हैं और इनमें से प्रत्येक अपने आप में गंभीर है।
पहली, आयोग एक कॉलेजियम निकाय है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त बराबरों में प्रथम होता है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने Seshan मामले में कहा था।
कानून के अनुसार काम का बंटवारा सर्वसम्मति से होना और निर्णय बहुमत से लिया जाना चाहिए। यहां दर्ज बहुमत के खिलाफ फैसले लिए गए।
दूसरी, ERO के अर्ध-न्यायिक कार्य को ऐसे सॉफ्टवेयर के अधीन कर दिया गया जिसे ऐसे अधिकारियों द्वारा चलाया जा रहा था जिनका उस पर कोई वैधानिक अधिकार नहीं था।
यह अधिकार-प्राप्त अधिकारी के स्थान पर दूसरे के निर्देश पर निर्णय लेना है, जिसे कोड में ही निर्मित कर दिया गया।
तीसरी, एक वैधानिक फॉर्म में बदलाव उस निकाय ने किया जिसके पास उसे बदलने का अधिकार नहीं था।
तीनों मामलों को जोड़ने वाला एक ही कानूनी सिद्धांत है।
Mohinder Singh Gill मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 324 के तहत आयोग की व्यापक शक्ति केवल वहीं लागू होती है जहां संसद मौन हो। जहां संसद ने कानून बनाया है, वहां वह शक्ति पीछे हट जाती है।
इन सभी मामलों में संसद ने कानून बनाया था और आयोग ने उसे दरकिनार कर दिया।
III. आरोप और पुष्टि
घटनाक्रम को सावधानी से पढ़ने की जरूरत है, क्योंकि व्यवस्था के समर्थक भी इसे सावधानी से पढ़ेंगे।
आरोप पहले आए।
1 अगस्त 2025 को राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि आयोग के ऊपर से नीचे तक के अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा और उनके आचरण को राजद्रोह कहा।
7 अगस्त को उन्होंने महादेवपुरा के आंकड़े पेश किए।
18 सितंबर को उन्होंने कर्नाटक के अलंद का मामला सामने रखा, जहां दिसंबर 2022 में 6,000 से अधिक फर्जी नाम हटाने के आवेदन दाखिल किए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीकृत प्रणालियों के जरिए नाम जोड़े और हटाए जा रहे थे।
आयोग का जवाब पूरी तरह ERO पर आधारित था: स्थानीय अधिकारी की जांच और सुनवाई के बिना किसी नाम को हटाया नहीं जा सकता।
अलंद ने पहली नजर में इसी बात को साबित किया।
ERO ने 6,000 से अधिक आवेदनों में केवल 24 को वास्तविक पाया और बाद में एक विशेष जांच दल ने एक पूर्व भाजपा विधायक के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। जांच में इस धोखाधड़ी को एक भुगतान लेकर चलाए गए ऐसे अभियान से जोड़ा गया जिसने सार्वजनिक पोर्टल का दुरुपयोग किया था, न कि किसी केंद्रीय प्रणाली पर कब्जे से।
पहली दर्ज आंतरिक आपत्ति लगभग सात सप्ताह बाद आई।
उसमें कहा गया कि ERO के उस वैधानिक अधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए—यही वह सुरक्षा थी जिस पर आयोग ने अपने बचाव को आधारित किया था।
आयोग का सार्वजनिक जवाब जिस सुरक्षा पर टिका था, उसके अपने सदस्य कह रहे थे कि उसी को कमजोर किया जा रहा है।
रिकॉर्ड यह साबित नहीं करता कि जिसे वह साबित नहीं कर सकता।
वह 2024 के लोकसभा चुनाव के बारे में सीधे कुछ नहीं कहता।
वह महाराष्ट्र की मतदाता सूचियों को भी स्पष्ट नहीं करता, जिनमें उस वर्ष लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच 40 लाख से अधिक नामों की वृद्धि हुई थी।
अलंद में अपराध प्रणाली के फ्रंट एंड के जरिए किया गया था, उसके मूल ढांचे पर कब्जे के जरिए नहीं।
जो लोग सितंबर के दस्तावेजों को 2014 के बाद हुए हर चुनाव के चोरी होने का प्रमाण मानते हैं, वे व्यवस्था को सबसे आसान जवाब दे देंगे।
रिकॉर्ड जो स्थापित करता है, वह अधिक गंभीर है।
आयोग ने विपक्ष को मशीन-पठनीय मतदाता सूचियां देने से इनकार किया।
उसने तकनीकी डेटा के लिए बार-बार लिखने वाली राज्य पुलिस जांच का धीमी गति से जवाब दिया।
उसने अपने ही सदस्यों की ऑडिट की मांग को नजरअंदाज किया।
उसने अपने ही बहुमत को दरकिनार किया।
जो निर्णायक सत्यापन के हर तरीके से इनकार करता है, वह निष्पक्षता की धारणा का दावा नहीं कर सकता।
अब प्रमाण का भार बदल गया है।
विपक्ष को यह साबित करने की जरूरत नहीं कि हर चुनाव में धांधली हुई थी।
आयोग को यह दिखाना होगा कि ऐसा नहीं हुआ था, और उसने किसी को इसकी जांच करने देने से इनकार कर दिया है।
IV. लंबा दशक
आयोग का पतन एक लंबी कहानी का अंत है, वह पूरी कहानी नहीं है।
2011 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने 2G स्पेक्ट्रम के आवंटन में 1.76 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित नुकसान का आंकड़ा दिया था।
यह संख्या और उसके आसपास उभरे भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन ने पहले एक सरकार और फिर पूरे विपक्ष की विश्वसनीयता नष्ट कर दी।
दस्तावेजी नतीजे सीधे दर्ज किए जा सकते हैं।
दिसंबर 2017 में विशेष CBI अदालत ने सबूतों के अभाव में 2G मामले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
2021 में CAG के प्रमुख विनोद राय ने संजय निरुपम के बारे में किए गए एक गलत दावे के लिए उनसे माफी मांगी।
India Against Corruption के नेताओं में से एक प्रशांत भूषण ने बाद में कहा कि इस आंदोलन को RSS और BJP का समर्थन मिला था और उन्होंने इसमें अपनी भूमिका के लिए खेद व्यक्त किया।
उस दौर का मूल घोटाला बरी किए जाने के साथ समाप्त हुआ और उसके सबसे प्रमुख आंदोलन के बारे में उसके अपने नेताओं में से एक ने बाद में कहा कि उसे समर्थन देकर खड़ा किया गया था।
इसके लिए किसी एक षड्यंत्रकारी को सब कुछ निर्देशित करते हुए दिखाने की जरूरत नहीं है।
हितों का एक साथ आ जाना इसकी व्याख्या करता है और इसका खंडन करना अधिक कठिन है।
लगभग एक सदी तक इंतजार करने के बाद संघ के लिए जल्दबाजी का कारण था।
हेमंत करकरे की मालेगांव और उससे जुड़े विस्फोटों की जांच ने उसके वैचारिक संसार से जुड़े लोगों को कटघरे में ला दिया था।
टेलीविजन समाचार का एक ऐसा तंत्र, जो बाद में कारोबारी समूहों के हाथों में अधिक केंद्रित होता गया रिलायंस ने 2014 में Network18 का नियंत्रण लिया और अडानी ने 2022 में NDTV का अधिग्रहण किया तमाशे की जरूरत रखता था।
भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को एक खलनायक की जरूरत थी।
एक महत्वाकांक्षी संवैधानिक लेखा परीक्षक ने एक आंकड़ा उपलब्ध करा दिया।
उनके हित एक ही दिशा में जा रहे थे।
इसके बाद का अभियान कई चरणों में तेज हुआ: भ्रष्टाचार से परिवारवाद तक, परिवारवाद से अभिजात्यवाद तक और अभिजात्यवाद से सभ्यतागत दुश्मनी तक।
इससे सत्ता में बड़े लाभ मिले और समाज को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
इसके बावजूद तथ्य जमा होते गए।
जज लोया की मृत्यु हुई
पेगासस सूची सामने आई, जिसमें अशोक लवासा द्वारा 2019 में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन के पांच अलग-अलग मामलों में असहमति दर्ज करने के कुछ सप्ताह बाद उनका नंबर सामने आया था।
फॉरेंसिक रिपोर्टों में भीमा कोरेगांव मामले के एक आरोपी के कंप्यूटर में फाइलें डाले जाने की बात सामने आई।
उत्तराखंड, गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में निर्वाचित सरकारें गिराई गईं।
Express के एक विश्लेषण में पाया गया कि जांच का सामना कर रहे विपक्षी नेताओं में से 25 ऐसे थे जो सत्तारूढ़ दल में चले गए और उनमें से 23 को राहत मिली।
करकरे की जांच से जुड़े मामलों में बरी होने का सिलसिला चला: 2018 में मक्का मस्जिद, 2019 में समझौता और 2025 में मालेगांव।
इनमें से प्रत्येक घटना आत्ममंथन का कारण बन सकती थी और किसी ने ऐसा नहीं किया।
व्यवस्था ने हर दुराचार की कीमत एक संस्था से उधार ली गई विश्वसनीयता से चुकाई।
2011 की कीमत CAG की विश्वसनीयता ने चुकाई।
लोया और बरी किए जाने के मामलों की कीमत अदालतों की विश्वसनीयता ने चुकाई।
दल बदलने वाले विपक्षी नेताओं की कीमत जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता ने चुकाई।
मतदाता सूचियों की कीमत चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ने चुकाई।
यह वैधता की एक पोंजी योजना थी: विश्वसनीयता के पुराने कर्ज को अगली संस्था से ली गई नई जमा राशि से चुकाना।
पोंजी योजना तब समाप्त होती है जब नए जमाकर्ता नहीं बचते।
26 सितंबर को आयोग ने फिर भुगतान किया इस बार सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता से।
उसने लोगों को याद दिलाया कि फॉर्म 6 में किए गए बदलावों, जिनके जरिए मतदाता सूची में नाम जोड़े जाते हैं, को सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के एक आदेश का हवाला देते हुए बरकरार रखा है।
लेकिन Express के घटनाक्रम के अनुसार फॉर्म 6 में बदलाव जुलाई में हुआ था, सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के डेढ़ महीने बाद।
यदि यह सही है तो आयोग एक ऐसे बदलाव के लिए न्यायिक मंजूरी का दावा कर रहा है जिसे अदालत ने कभी देखा ही नहीं था और जिस संस्था पर वह अब भरोसा कर रहा है, उसी की रोस्टर व्यवस्था पर दो दिन पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी के मामले की सूचीबद्धता को लेकर सवाल उठाया गया था।
श्रेय देने के लिए अब कोई विश्वसनीयता बची नहीं है।
इतिहास के दुरुपयोग ने अपनी प्रतिक्रिया भी पैदा की।
जिस व्यवस्था ने अपने विरोधियों को अवैध ठहराने के लिए देश के अतीत को फिर से लिखने की कोशिश की, उसके अपने अतीत मालेगांव से लेकर 2G में बरी किए जाने तक को फिर से पढ़ा जाने लगा।
संस्थागत विश्वसनीयता को नुकसान धीरे-धीरे और लगातार हुआ है।
अब हम उस स्थिति में खड़े हैं जहां पूरे संस्थागत ढांचे की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है और राजनीति एक बेतुकेपन में बदल गई है: चुनाव होते हैं, लेकिन उनके निर्णायक पर भरोसा नहीं किया जा सकता; अदालतें बैठती हैं, लेकिन उनकी रोस्टर व्यवस्था लचीली है; प्रेस खबरें प्रकाशित करता है और कुछ नहीं होता।
V. सत्ता नहीं, भरोसा
निर्णायक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि लोकतंत्र केवल बहुमत के अपनी जीत घोषित करने पर टिका नहीं है।
वह अल्पमत के उस जीत को स्वीकार करने पर टिका है।
चुनाव एक परीक्षा है, राजनीति का उद्देश्य नहीं।
यह कोई युद्ध नहीं है, जिसमें विजेता को लूट का माल मिल जाता है।
यह पूरे मतदाता समुदाय द्वारा विजेता को सौंपा गया भरोसा है, जिसमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने उसके खिलाफ मतदान किया है।
जनादेश एक वापस लिया जा सकने वाला न्यास है, कोई स्वामित्व-पत्र नहीं
यह विजयोल्लास पर आधारित नहीं हो सकता।
लोकतंत्र वहां अस्तित्व में रहता है जहां पराजित व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि मतगणना ईमानदार थी और उसे विश्वास रहता है कि अगली बारी उसकी होगी।
जब अल्पमत अपने नेताओं, दलों और मतदाताओं के साथ किसी नतीजे को स्वीकार करने से इनकार करता है, तो वह नतीजा लोकतांत्रिक सत्ता के रूप में काम नहीं कर सकता, चाहे उसके गुण कुछ भी हों।
1860 इसका सबसे कठिन उदाहरण है और सिद्धांत को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।
नेताओं, राज्य सरकारों और मतदाताओं के अपने पूरे तंत्र से लैस एक अल्पमत ने लिंकन के चुनाव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
संघ युद्ध के जरिए बचा और 1861 से 1865 के बीच अमेरिका एक ऐसा राष्ट्र था जिसे लोकतंत्र से नहीं, बल से जोड़े रखा गया था जो लोकतंत्र वापस आया, वह विजेताओं द्वारा दिया गया और चयनात्मक रूप से दिया गया।
1877 में पराजित दक्षिण की सहमति इस कीमत पर खरीदी गई कि मुक्त अश्वेत नागरिकों को फिर उनके पूर्व स्वामियों की सत्ता में लौटा दिया गया। एक लोकतंत्र अपने पराजितों की सहमति वापस पा सकता है—किसी और को उस समझौते से बाहर करके। यह चेतावनी उस गहन पुनरीक्षण पर सीधे लागू होती है, जिसमें उपलब्ध हर विवरण के अनुसार सबसे अधिक नाम मुसलमानों, प्रवासियों और गरीबों के हटाए गए हैं।
क्या ऐसा इनकार वैध है, यह उस कसौटी पर निर्भर करता है जिसे आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने भाषण में रखा था: जहां संवैधानिक तरीके खुले हों, वहां असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं है। इसका दूसरा पहलू वह है जो अब महत्वपूर्ण है। जब संवैधानिक रास्ते बंद हो जाएं, तब इनकार उचित है।
VI. रास्तों का बंद होना
तो क्या वे बंद हो गए हैं?
हमारी व्यवस्था में जवाबदेही पांच रास्तों से चलती है।
कार्यपालिका प्रशासनिक जवाबदेही देती है, कानून कानूनी जवाबदेही देता है, संसद विपक्ष के जरिए जवाबदेही देती है, अदालतें न्यायिक जवाबदेही देती हैं और मीडिया सार्वजनिक जवाबदेही देता है। इन सभी को एक-दूसरे से जुड़कर काम करने के लिए बनाया गया है
प्रेस तथ्य सामने लाता है, विपक्ष उन्हें संसदीय प्रस्तावों में बदलता है, अदालतें उन्हें आदेशों में बदलती हैं, कानून मानक उपलब्ध कराता है और कार्यपालिका उसे लागू करती है।
कार्यपालिका हितों के टकराव में है
उसे संवैधानिक पदाधिकारियों के दो पत्र मिले और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है कि उसने कोई कार्रवाई की हो, सिवाय उस अधिकारी को वापस उसके कैडर में भेजने की मंजूरी देने के, जिसका दोनों आयुक्तों ने बचाव किया था।
संसद संख्या और सभापति के विवेक से बंद है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता और सभापति उसे स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं।
कानून आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में किए गए कार्यों के लिए कार्यवाही से सुरक्षा देता है और किसी अदालत ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वैधानिक अधिकार से बाहर किए गए कार्य इस सुरक्षा के अंतर्गत आते हैं या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की रोस्टर व्यवस्था का जवाब केवल मुख्य न्यायाधीश के पास है—यह वह समस्या है जिसे जनवरी 2018 में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने सामने रखा था और जिसे संस्थान ने उस सिद्धांत की पुष्टि करके सुलझा दिया कि रोस्टर का अधिकार मुख्य न्यायाधीश के पास है।
एक और रास्ता था – खुद आयोग के भीतर: उसका बहुमत।
इसने 30 जुलाई को एक बार काम किया था, जब दोनों आयुक्तों ने आईटी की निगरानी को किनारे करने वाले आदेश को पलट दिया था।
26 सितंबर को यह रास्ता बंद हो गया।
प्रेस नोट पूरी चुनाव आयोग की मंजूरी से जारी किया गया और उसमें कहा गया कि कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र आयोग या उसके आईटी विभाग की किसी नीतिगत बात से संबंधित नहीं थे, बल्कि प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित थे।
जिन दो आयुक्तों की टिप्पणियों में अवैधता दर्ज की गई थी, उन्होंने एक ऐसे दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए जिसमें सर्वसम्मति घोषित की गई।
फाइलों में उन्होंने चाहे जो लिखा हो, सार्वजनिक रूप से उनका रुख अब मुख्य चुनाव आयुक्त का रुख है।
उनकी असहमति ऐसी निजी अंतरात्मा निकली जो कभी सार्वजनिक कार्रवाई में बदल नहीं सकी।
उस नोट को ध्यान से पढ़ना चाहिए, क्योंकि वह बताता है कि यह व्यवस्था कैसे काम करती है।
वह किसी बात से इनकार नहीं करता और बहुत कुछ स्वीकार करता है।
उसमें कहा गया है कि आयोग ने आज से एजेंडा और कार्यवृत्त पहले से प्रसारित करने का आदेश दिया है। यह चुपचाप जोशी की उस शिकायत को स्वीकार करता है कि ऐसा नहीं किया जाता था।
‘गैर-SIR अवधि के लिए नियमों के अनुसार लागू फॉर्म (निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960) इस्तेमाल किए जाएंगे।’
यह चुपचाप वैधानिक आपत्ति को स्वीकार करता है।
ECINet की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई जाएगी, जिसकी अध्यक्षता एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त करेंगे और जिसमें IIT/IITs का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होगा।
यह जोशी की ऑडिट की मांग का कमजोर रूप है, जिसे उसी कार्यालय के अधिकार के तहत रखा गया है जिसने निगरानी को हटाने की कोशिश की थी।
सब कुछ सुधारा जाता है और कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाता।
प्रचार से जन्मी व्यवस्था वास्तविकता को स्वीकार कर सकती है, लेकिन वह अपनी कहानी को स्वीकार नहीं कर सकती, क्योंकि वही उसकी नींव है।
यह जनाक्रोश के प्रति अवमानना है, सार्वजनिक भरोसे का खंडन है और डटे रहने का फैसला है।
यह व्यवस्था के चरित्र का भी संकेत है: जहां जरूरी होता है, वह पीछे हटती है, लेकिन यह कभी नहीं कहेगी कि वह गलत थी।
VII. सत्ता हस्तांतरण का सवाल
यह भारतीय राजनीति के सबसे खतरनाक सवाल को सामने लाता है: क्या ऐसी व्यवस्था, जो यहां तक भी डटे रहने का रास्ता चुनती है, शांतिपूर्वक सत्ता किसी दूसरे के हाथ में सौंपेगी?
इसके प्रमाण दोनों दिशाओं में हैं।
जहां उसे हार मिली, वहां व्यवस्था ने हार स्वीकार की है: कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में, और 2024 में लोकसभा में अपना बहुमत खोने पर भी।
जिस चीज की कभी परीक्षा नहीं हुई, वह है राष्ट्रीय हार – ऐसा आम चुनाव जिसे उस निर्णायक ने हारा हो जिसे व्यवस्था नियंत्रित करती है और जिसने उस हार को प्रमाणित किया हो।
चिंता सामान्य रूप से व्यवस्था के व्यवहार को लेकर नहीं है।
चिंता विशिष्ट है: क्या निर्णायक उस एक हार को दर्ज और स्वीकार करेगा जो वास्तव में मायने रखती है?
26 सितंबर के बाद कोई भी इसका उत्तर पूरे भरोसे के साथ नहीं दे सकता।
जब अगले आम चुनाव की निष्पक्षता नियमों के बजाय व्यवस्था के संयम पर निर्भर हो जाए, तो लोकतंत्र एक रियायत बन जाता है और रियायत वापस ली जा सकती है।
यदि संवैधानिक रास्ते बंद हो जाते हैं और सत्ता हस्तांतरण संदिग्ध हो जाता है, तो संभावित परिणाम व्यापक उथल-पुथल होगा।
यहां पड़ोसी देशों का उदाहरण गलत मार्गदर्शक है।
नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका छोटी राजनीतिक व्यवस्थाएं हैं, जहां कुछ ही हफ्तों में एक जनांदोलन बन सकता है और वहां की व्यवस्थाओं में RSS जैसी संगठित गहराई नहीं थी।
भारत में एक आंदोलन खड़ा करने के लिए राज्य-दर-राज्य और भाषा-दर-भाषा भारी राजनीतिक प्रयास की जरूरत होगी और उसका सामना समाज तथा नौकरशाही में गहरी पैठ रखने वाले एक जनसंगठन के साथ-साथ एक राज्य से भी होगा।
और एक गहरा डर भी है: यदि सत्ता असंवैधानिक तरीके से बदलेगी, तो उसके बाद जो आएगा, वह भी संवैधानिक नहीं होगा।
इसी तरह लंबे समय तक चलने वाली अराजकता शुरू होती है।
VIII. बीज और वृक्ष
गांधी ने 1909 में इसका जवाब दिया था।
हिंद स्वराज के “पाशविक बल” वाले अध्याय में उन्होंने लिखा कि साधन और साध्य का वही संबंध है जो बीज और वृक्ष का होता है।
सरकार का चरित्र उस तरीके से तय होता है जिससे वह सत्ता में आती है।
यह सिद्धांत वर्तमान को समझाता है।
जो व्यवस्था गढ़ी हुई मान्यता के जरिए सत्ता में आई है, उसे गढ़ी हुई मान्यता के जरिए ही टिके रहना होगा।
वह वास्तविक सहमति के जरिए शासन नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास वह कभी थी ही नहीं।
इसीलिए विश्वसनीयता पैदा करने के लिए हर संस्था को साथ लेना पड़ा और विश्वसनीयता उधार लेते-लेते एक समय ऐसा आया जब कुछ भी बचा नहीं।
इसी सिद्धांत का ध्यान से पालन करें तो आगे निकलने का रास्ता भी दिखाई देता है और वह अराजकता की ओर नहीं जाता।
गांधी ने यह नहीं कहा था कि लोकप्रिय उभार से हासिल सत्ता अव्यवस्था पैदा करती है।
उन्होंने कहा था कि उस उभार का चरित्र सरकार के चरित्र को निर्धारित करता है।
हिंसक विद्रोह एक हिंसक राज्य में बदलता है; अहिंसक जनांदोलन एक लोकप्रिय, अहिंसक राज्य को जन्म देता है।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन स्वयं एक जन-उभार था और उसने एक संवैधानिक गणराज्य को जन्म दिया।
वह ऐसा इसलिए कर सका क्योंकि सत्ता में आने से पहले उसने दशकों तक संविधान का निर्माण किया था: 1928 की नेहरू रिपोर्ट, 1931 का कराची प्रस्ताव जिसमें मौलिक अधिकारों की बात थी और कांग्रेस के भीतर वर्षों तक हुए आंतरिक चुनाव, अधिवेशन और प्रस्ताव।
गणराज्य का बीज उस तरीके में बोया गया था जिसमें आंदोलन स्वयं संचालित होता था।
जब सत्ता आई, तो उसे ग्रहण करने के लिए कुछ तैयार था।
इसीलिए भारत का आकार जो कारण है कि पड़ोसी देशों से तुलना गलत है एक सुरक्षा भी है।
एक ऐसा आंदोलन जिसे पूरे महाद्वीप में खड़ा करना हो, वह अचानक उमड़ी भीड़ नहीं हो सकता।
बढ़ते हुए उसे संगठन, नेतृत्व, नियम और कार्यक्रम विकसित करने होंगे।
उसे खड़ा करने का प्रयास ही उसे वह गहराई देता है जो अराजकता को रोकती है।
छोटी व्यवस्थाओं के उथले विद्रोह खाली स्थान छोड़ देते हैं।
एक गहरा आंदोलन संस्थाओं को जन्म देता है।
असल खतरा कहीं और है: दो संगठित शक्तियों के बीच टकराव में।
कोलंबो और ढाका में विद्रोह का सामना राज्य से था।
भारत में उसका सामना राज्य के साथ-साथ एक ऐसे जनसंगठन से भी होगा जो उसके खिलाफ लामबंद होने में सक्षम है।
अराजकता सड़क बनाम सड़क से पैदा होगी।
यहां गांधी की अहिंसा केवल नैतिकता नहीं रह जाती; वह रणनीतिक आवश्यकता बन जाती है।
एक संगठित प्रति-आंदोलन को वैधता तभी मिलती है जब उसके सामने खड़ा आंदोलन हिंसक हो जाए।
अहिंसा संघ को वह एकमात्र चीज हासिल करने से रोकती है जिसके जरिए वह अपनी लामबंदी को व्यवस्था की रक्षा के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
IX. 1977 की चेतावनी
भारत ने यह एक बार पहले किया है और उसका सबक दोनों दिशाओं में जाता है।
जेपी आंदोलन मुख्यतः अहिंसक था।
उसने चुनाव कराने के लिए मजबूर किया, चुनाव जीता और सत्ता को शांतिपूर्वक हस्तांतरित होते देखा।
यह प्रमाण है कि भारत में एक जमी हुई व्यवस्था को संवैधानिक तरीके से हटाया जा सकता है।
लेकिन जनता सरकार ढाई साल में ही बिखर गई और बीज और वृक्ष का सिद्धांत इसकी भी व्याख्या करता है।
इंदिरा गांधी के विरोध से ही एकजुट हुआ आंदोलन ऐसी सरकार लेकर आया जो उसी विरोध के सहारे ही बंधी हुई थी और साझा दुश्मन के खत्म होते ही बिखर गई।
केवल ग्यानेश कुमार के खिलाफ, केवल गहन पुनरीक्षण के खिलाफ या केवल व्यवस्था के खिलाफ एकजुट आंदोलन उसी तरह की सरकार पैदा करेगा।
केवल विरोध एक ऐसी सरकार पैदा करता है जो केवल विरोध पर टिकी होती है।
X. गणराज्य के लिए रचनात्मक कार्यक्रम
गांधी का उत्तर था—रचनात्मक कार्यक्रम।
उनका मानना था कि स्वराज सत्ता बदलने के क्षण में नहीं जीता जाता।
उसे पहले से बनाया जाता है, आंदोलन के अपने काम में, जहां आंदोलन अभी से उन संबंधों का अभ्यास करता है जिनकी भविष्य के राज्य को जरूरत होगी।
वर्तमान पर लागू करने पर आंदोलन का पहला काम उस लोकतांत्रिक अनुबंध का निर्माण करना है जिसे वह बहाल करना चाहता है।
इसके चार हिस्से हैं।
पहला, उसे अपनी शर्तें स्पष्ट करनी चाहिए।
विपक्ष लोकतंत्र से हटे बिना इस निर्णायक को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है।
वह आयोग में विश्वास न होने की औपचारिक घोषणा कर सकता है, लेकिन चुनाव लड़ना जारी रख सकता है—एक ऐसे पक्ष के रूप में जो अपना अधिकार मांग रहा है, न कि किसी अधीनस्थ भागीदार के रूप में।
मांग “हम नतीजों को स्वीकार नहीं करते” से बदलकर यह होनी चाहिए: “हम इस निर्णायक को स्वीकार नहीं करते और ये वे शर्तें हैं जिन पर हम किसी निर्णायक को स्वीकार करेंगे।”
इन शर्तों को बिल्कुल स्पष्ट रूप से रखा जा सकता है:
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की ऐसी प्रक्रिया जो चयन समिति में एक तटस्थ सदस्य को वापस लाए, जैसा कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal मामले में निर्देश दिया था;
ECINet और उसके एक्सेस लॉग का स्वतंत्र और सार्वजनिक ऑडिट, न कि उस कार्यालय के अधीन समिति जिसने निगरानी हटाने की कोशिश की थी;
मशीन-पठनीय मतदाता सूचियां और हर नाम हटाने तथा उसके आधार का प्रकाशित रिकॉर्ड;
ERO के वैधानिक अधिकार की बहाली और प्रमाणन, ताकि कोई सॉफ्टवेयर उस निर्णय को न बदल सके जिसे कानून किसी नामित अधिकारी को लेने का अधिकार देता है;
वोटिंग मशीनों का सवाल आश्वासनों के बजाय सार्वजनिक, स्वतंत्र परीक्षण के जरिए तय किया जाए।
दूसरा, उसे एक समय-सीमा तय करनी चाहिए।
अगला आम चुनाव 2029 में होना है।
विपक्ष का रुख होना चाहिए कि वह इस निर्णायक के तहत उस चुनाव को तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक ये शर्तें पूरी नहीं हो जातीं।
इससे व्यवस्था को सुधार के लिए तीन साल मिलते हैं।
यदि वह ऐसा नहीं करती, तो उसके सामने वैधता का ऐसा संकट होगा जिसे वह समझा नहीं सकेगी, क्योंकि उसे पहले ही लिखित रूप में बता दिया गया होगा कि सहमति के लिए क्या आवश्यक है।
तीसरा, उसे क्रम का सम्मान करना चाहिए।
सहमति वापस लेना तभी वैध है जब जनता ने संवैधानिक रास्तों को आजमाते हुए और उनके बंद किए जाने को देखा हो।
इसलिए विपक्ष को रिट याचिकाओं, हटाने के प्रस्ताव और RTI आवेदनों को पूरी तरह और सार्वजनिक रूप से आगे बढ़ाना चाहिए।
हर इनकार को प्रमाण के रूप में दर्ज करना चाहिए, इससे पहले कि वह अस्वीकृति या गैर-मान्यता की ओर बढ़े।
26 सितंबर ने एक रास्ता बंद किया है।
बंद किए गए रास्तों का रिकॉर्ड इस तरह बनाया जाना चाहिए कि बाद में कोई यह न कह सके कि विपक्ष ने कोशिश किए बिना ही रास्ता छोड़ दिया था।
चौथा, उसे अभी से संवैधानिक रास्ता तैयार करना चाहिए।
अराजकता के डर के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण है।
बांग्लादेश का संकट 2011 में शुरू हुआ, जब तत्कालीन सरकार ने उस कार्यवाहक व्यवस्था को खत्म कर दिया जो वहां चुनावों का संचालन करती थी।
उसके बाद पराजित पक्षों ने सहमति देना बंद किया, बहिष्कार हुए और अंततः एक विद्रोह ने ऐसा सत्ता हस्तांतरण पैदा किया जो संविधान से बाहर था और जिसकी स्थिति अब भी अनिश्चित है।
भारत में कार्यवाहक सरकार की कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है।
इसलिए विपक्ष को अभी से इसका मसौदा तैयार करना चाहिए, सार्वजनिक रूप से इस पर बहस करनी चाहिए और इसे अपनी मांग का हिस्सा बनाना चाहिए कि सत्ता हस्तांतरण के लिए संवैधानिक व्यवस्था क्या होगी।
इसमें पुनर्गठित चुनाव आयोग, सार्वजनिक रूप से ऑडिट की गई मतदाता सूचियां, सहमत चुनाव कार्यक्रम और जरूरत पड़ने पर चुनावी प्रशासन के लिए अंतरिम व्यवस्था का प्रावधान करने वाला संशोधन शामिल हो सकता है।
ऐसा आंदोलन जो मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग तो करता है लेकिन उसके बाद क्या होगा, इसकी योजना नहीं रखता, वह बांग्लादेश की ओर ले जाता है।
ऐसा आंदोलन जो अपना संवैधानिक रास्ता साथ लेकर चलता है, वह 1977 की ओर ले जाता है—लेकिन उसके बाद हुई टूटन के बिना।
इन चारों के पीछे वह एकता है जिसका विपक्ष में अब तक अभाव रहा है
साझा शिकायत, साझा इच्छा नहीं होती।
व्यवस्था के पास संरचनात्मक एकता है: एक आदेश, एक संगठन, एक कहानी।
विपक्ष को यह एकता बनानी होगी और भारत के उदाहरण बताते हैं कि कैसे।
उसे एक तरह के विलय के करीब जाना होगा।
उसे शिकायत को इस रूप में रखना होगा कि लोग क्या खोते हैं: पहले वोट, फिर राशन कार्ड और फिर वह नागरिकता जिसका प्रतीक वोट था।
और उसे ऐसे व्यक्ति के नैतिक नेतृत्व की जरूरत होगी जिसका पद से कोई स्वार्थ न हो।
उसके पास एक ऐसा लाभ भी है जिसका वह शायद ही कभी इस्तेमाल करता है।
बहुमत का समर्थन जो कुछ किया गया है, उसके लिए गुप्त मतदान में मिलता है और तथ्य यह है कि उसे गुप्त रूप से ही देना पड़ता है, यह दिखाता है कि लोगों ने शर्म की भावना अभी खोई नहीं है।
कोई भीड़ इस मांग के लिए इकट्ठा नहीं होती कि उसके पड़ोसियों के नाम मतदाता सूची से काट दिए जाएं।
पिछले सप्ताह की हर वापसी फॉर्म बहाल किए जाने से लेकर रोक सीमित किए जाने और कार्यवृत्त का वादा किए जाने तक—सार्वजनिक दबाव के सामने हुई।
जिस समर्थन का सार्वजनिक रूप से बचाव नहीं किया जा सकता, वह मतदान केंद्र के भीतर कायम रहता है और खुले में चुनौती मिलने पर पीछे हट जाता है।
जिन लोगों को अधिकार से वंचित किया गया है, उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है।
उनकी ताकत दृश्यता है।
इसीलिए व्यवस्था की प्रति-रणनीति हमेशा उन्हें छिपाने की रही है: उन्हें घुसपैठिया, राष्ट्र-विरोधी और गद्दार कहना और हर आलोचक को यह याद दिलाना कि कहीं न कहीं कोई फाइल खोली जा सकती है।
XI. वह बीज जो हम बोते हैं
कोई भी व्यक्ति किसी विश्वासघाती विजेता की उदारता का इंतजार नहीं करता।
लेकिन जो भी शिकायत लेकर आगे बढ़ता है, उसे याद रखना होगा कि उसकी वैधता किस चीज से बनती है।
दावा प्रतिशोध का नहीं, पुनर्स्थापना का है: किसी विरोधी के विनाश का नहीं, एक भरोसे की वापसी का।
जो आंदोलन व्यवस्था के विनाश की मांग करेगा, वह एक और विनाशकारी व्यवस्था का बीज बोएगा।
जो आंदोलन अहिंसक और रचनात्मक तरीकों से सहमति की बहाली की मांग करेगा और जिसका संवैधानिक रास्ता पहले से तैयार होगा, वह गणराज्य का बीज बोएगा।
सितंबर 2026 ने दिखा दिया है कि प्रचार पर खड़ी व्यवस्था से क्या उगता है: ऐसा निर्णायक जो अपने ही रिकॉर्ड से इनकार करता है, ऐसी अदालत जो अपनी ही रोस्टर व्यवस्था को मोड़ती है और ऐसे असहमत सदस्य जो अपनी असहमति पर ही हस्ताक्षर कर देते हैं।
अब चुनाव यह नहीं है कि भारत उथल-पुथल का सामना करेगा या नहीं, क्योंकि ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जिसकी सभी संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, किसी न किसी रूप में उथल-पुथल का सामना करेगी।
चुनाव यह है कि आने वाली उथल-पुथल अपने भीतर क्या लेकर आएगी।
गांधी की बात अगले गणराज्य पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी पहले गणराज्य पर थी:
वह उसी बीज से उगेगा, जो अब बोया जाएगा।











