बीज और वृक्ष: चुनाव आयोग, हारने वाले की सहमति और भारत के अगले गणराज्य का निर्माण

I. सितंबर के तीन दिन
इस सितंबर में तीन दिनों के भीतर भारतीय गणराज्य की हालत जितनी साफ दिखाई दी, उतनी शायद पिछले एक दशक के किसी एक घोटाले में भी नहीं दिखाई दी।
23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस ने खबर दी कि भारत के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने दस महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित रूप में आपत्ति दर्ज की थी कि उनका अपना आयोग किस तरह चलाया जा रहा है।

24 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी, गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी, की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने सूचीबद्ध हुई, जिसके पास निवारक हिरासत से जुड़े मामलों की रोस्टर जिम्मेदारी नहीं थी। उस पीठ ने हाई कोर्ट की उन टिप्पणियों और उनके खिलाफ व्यक्तिगत रूप से लगाए गए मुआवजे पर रोक लगा दी, जो उन्हें खुद भरना था। एक कानूनी समाचार वेबसाइट ने रोस्टर की इस अनियमितता की ओर ध्यान दिलाया तो कुछ ही घंटों में रोक को सीमित कर दिया गया।

26 सितंबर को तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई और एक संयुक्त प्रेस नोट जारी किया गया। इसमें कहा गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision से जुड़े सभी आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी के बाद ही जारी किए गए थे।

पहले दिन यह सामने आया कि हमारे चुनावों का निर्णायक खुद अपने ही बहुमत के खिलाफ काम कर रहा था। दूसरे दिन यह दिखा कि जब उसी निर्णायक के परिवार का मामला आया तो सर्वोच्च अदालत रोस्टर के मामले में लचीली हो गई। तीसरे दिन उन दो चुनाव आयुक्तों ने, जिन्होंने असहमति दर्ज की थी, ऐसा बयान जारी कर दिया जिसमें उनकी अपनी दर्ज की हुई असहमति ही नकार दी गई।
सप्ताह खत्म होते-होते चुनाव आयोग के भीतर मौजूद आखिरी आंतरिक नियंत्रण टूटा नहीं था; उसे अपने भीतर ही समाहित कर लिया गया था।

यह कहानी सितंबर 2026 में शुरू नहीं हुई और न ही एक मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाए जाने के साथ खत्म होगी। यह उस प्रक्रिया का नया चरण है जो 2011 में शुरू हुई थी।

यह प्रक्रिया कहाँ जाकर खत्म होगी, इसका जवाब उस सवाल में छिपा है जो गांधी ने 1909 में पूछा था—हम कौन-सा बीज बो रहे हैं?

II. फाइलें क्या कहती हैं
रिकॉर्ड स्पष्ट है। और उसकी ताकत भी यही है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत हर निर्वाचन क्षेत्र में नियुक्त निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी Electoral Registration Officer (ERO) को यह तय करने का अधिकार है कि मतदाता सूची में किसका नाम रहेगा और किसका नहीं।

जनवरी 2026 से ये फैसले ECINet के जरिए होने लगे। यह आयोग का एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है और इसकी अनुमतियों पर दिल्ली स्थित आयोग के आईटी निदेशालय का नियंत्रण था।

नवंबर 2025 से ही चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराई थी कि कानून जिन अधिकारियों को वैधानिक जिम्मेदारी देता है, वही उन कामों को करेंगे और आईटी प्रणाली उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकती।

मई 2026 में जोशी ने मतदाता सूची के डेटाबेस के “धीरे-धीरे केंद्रीकरण” की चेतावनी दी और एक स्वतंत्र ऑडिट का प्रस्ताव रखा, ताकि यह प्रमाणित किया जा सके कि मतदाता डेटा में बदलाव केवल वैधानिक अधिकारी ही कर सकते हैं।

वह ऑडिट नहीं हुआ।
गोवा में ERO ने 97 ऐसे मतदाताओं को पात्र पाया, जिन्हें सूची में बहाल किया जाना था। लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके, क्योंकि सॉफ्टवेयर में उन्हें बहाल करने का विकल्प ही नहीं था। कानून ने फैसला अधिकारी को दिया था, लेकिन सॉफ्टवेयर ने उसे अपना फैसला लागू करने से रोक दिया।

28 जुलाई को एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त ने आयोग के भीतर काम का बंटवारा बदल दिया और आईटी विभाग की देखरेख कर रहे उप चुनाव आयुक्त को उस जिम्मेदारी से हटा दिया। अगले दिन दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। उसके अगले ही दिन दोनों ने मिलकर उस आदेश को पलट दिया।

19 अगस्त को आयोग ने प्रस्ताव दिया कि उसी उप चुनाव आयुक्त को “व्यक्तिगत कारणों” के आधार पर उनके मूल कैडर में वापस भेज दिया जाए। कार्मिक विभाग ने 24 अगस्त को इसकी मंजूरी दे दी।

जुलाई में Form 6 में भी बदलाव किया गया। यही वह फॉर्म है जिसे हर नया मतदाता भरता है। अब इसमें पूछा गया कि क्या आवेदक, उसके माता-पिता या उसके दादा-दादी का नाम पिछली गहन पुनरीक्षण वाली मतदाता सूची में था।
संधू ने इसे “अनधिकृत और अवैध” बताया।

इन फॉर्मों का प्रारूप Registration of Electors Rules के तहत तय होता है। इन नियमों में बदलाव करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है और ये नियम संसद के सामने रखे जाते हैं। यहाँ तीन अलग-अलग अवैधानिकताएँ दिखाई देती हैं और इनमें से हर एक अपने आप में गंभीर है।

पहली, चुनाव आयोग एक सामूहिक संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त बराबरों में पहले हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Seshan मामले में यही सिद्धांत स्थापित किया था। कानून के मुताबिक आयोग के काम का बंटवारा सर्वसम्मति से और फैसले बहुमत से होने चाहिए। यहाँ दर्ज बहुमत के खिलाफ फैसले लिए गए।

दूसरी, ERO के अर्ध-न्यायिक अधिकार को ऐसे सॉफ्टवेयर के अधीन कर दिया गया, जिसे ऐसे अधिकारी चला रहे थे जिनके पास उस अधिकार पर कोई वैधानिक नियंत्रण नहीं था। यह कानून के तहत लिए जाने वाले फैसले को सॉफ्टवेयर के जरिए निर्देशित करना है।

तीसरी, एक ऐसे निकाय ने वैधानिक फॉर्म में बदलाव कर दिया जिसे ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था।
इन तीनों मामलों को एक ही कानूनी सिद्धांत जोड़ता है।

Mohinder Singh Gill मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की व्यापक शक्ति वहीं लागू होती है जहाँ संसद ने कोई प्रावधान नहीं किया हो। जहाँ संसद ने कानून बनाया है, वहाँ आयोग की शक्ति उस कानून के अधीन हो जाती है। इन तीनों मामलों में संसद ने कानून बनाया था। और आयोग ने उसे दरकिनार कर दिया।

III. आरोप पहले, पुष्टि बाद में
घटनाक्रम को सावधानी से पढ़ने की जरूरत है, क्योंकि इस व्यवस्था के समर्थक भी इसे बहुत ध्यान से पढ़ेंगे।
आरोप पहले आए थे।

1 अगस्त 2025 को राहुल गांधी ने चेतावनी दी थी कि आयोग के ऊपर से नीचे तक के अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा और उन्होंने उनके आचरण को देशद्रोह कहा था।

7 अगस्त को उन्होंने महादेवपुरा के आंकड़े सामने रखे।

18 सितंबर को उन्होंने कर्नाटक के आलंद का मामला सामने रखा। वहाँ दिसंबर 2022 में नाम हटाने के छह हजार से अधिक फर्जी आवेदन किए गए थे। उनका आरोप था कि केंद्रीकृत प्रणालियों के जरिए मतदाताओं के नाम जोड़े और हटाए जा रहे थे।
आयोग का जवाब पूरी तरह ERO पर आधारित था। उसका कहना था कि स्थानीय अधिकारी की जांच और सुनवाई के बिना किसी का नाम मतदाता सूची से हटाया ही नहीं जा सकता। आलंद का मामला पहली नजर में इसी बात की पुष्टि करता दिखाई दिया।

ERO ने छह हजार आवेदनों में से केवल 24 को वास्तविक पाया। बाद में विशेष जांच दल ने भाजपा के एक पूर्व विधायक के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। जांच में धोखाधड़ी का स्रोत किसी केंद्रीय प्रणाली में नहीं, बल्कि पैसे लेकर सार्वजनिक पोर्टल का दुरुपयोग करने वाले एक संगठित प्रयास में मिला।

इसके करीब सात सप्ताह बाद आयोग के भीतर पहली दर्ज आपत्ति सामने आई।
उसमें कहा गया कि ERO का वैधानिक अधिकार—जिसे आयोग ने अभी-अभी अपने बचाव का आधार बनाया था—केंद्र द्वारा सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

यानी आयोग का सार्वजनिक बचाव उसी सुरक्षा पर टिका था, जिसके कमजोर पड़ने की बात उसके अपने सदस्य कह रहे थे।
रिकॉर्ड वह साबित नहीं करता, जो वह साबित नहीं कर सकता। वह 2024 के लोकसभा चुनाव के बारे में सीधे कुछ नहीं कहता।

वह महाराष्ट्र की मतदाता सूचियों की भी व्याख्या नहीं करता, जिनमें उसी वर्ष लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच 40 लाख से अधिक नाम बढ़े थे।

आलंद का मामला सिस्टम के सामने वाले हिस्से से हुआ अपराध था, उसके मूल ढाँचे पर कब्जे का मामला नहीं।
जो लोग सितंबर के दस्तावेजों को 2014 के बाद हुए हर चुनाव में धांधली का प्रमाण मानते हैं, वे व्यवस्था को सबसे आसान जवाब देने का मौका देंगे।

लेकिन रिकॉर्ड जो स्थापित करता है, वह ज्यादा गंभीर है।
आयोग ने विपक्ष को मशीन-पठनीय मतदाता सूचियाँ देने से इनकार किया।
राज्य पुलिस की उस जांच में भी उसने धीमी प्रतिक्रिया दी, जिसने तकनीकी डेटा के लिए उसे बार-बार लिखा था।
उसने अपने ही सदस्यों की ऑडिट की मांग को नजरअंदाज किया।
और उसने अपने ही बहुमत को दरकिनार कर दिया।

जो चुनावी निर्णायक हर तरह की स्वतंत्र जांच से इनकार करता है, वह निष्पक्षता की पूर्वधारणा का दावा नहीं कर सकता।
अब जिम्मेदारी का भार बदल गया है।

विपक्ष को यह साबित करने की जरूरत नहीं कि हर चुनाव में धांधली हुई थी।
अब आयोग को यह साबित करना है कि ऐसा नहीं हुआ था।
और उसने किसी को यह जांच करने ही नहीं दिया।

IV. लंबा दशक
आयोग का पतन एक लंबी कहानी का अंत है। वह पूरी कहानी नहीं है।
2011 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने 2G स्पेक्ट्रम के आवंटन में ₹1.76 लाख करोड़ के अनुमानित नुकसान का आंकड़ा दिया था।

यह आंकड़ा और उसके इर्द-गिर्द खड़ा हुआ भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन पहले एक सरकार की और फिर पूरे विपक्ष की विश्वसनीयता खत्म करने वाला साबित हुआ।

दर्ज तथ्यों को सीधे-सीधे दर्ज करना जरूरी है।
दिसंबर 2017 में विशेष CBI अदालत ने सबूतों के अभाव में 2G मामले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया।
2021 में वह आंकड़ा देने वाले CAG विनोद राय ने संजय निरुपम से अपने द्वारा उनके बारे में किए गए एक गलत दावे के लिए माफी मांगी।

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के प्रमुख नेताओं में रहे प्रशांत भूषण ने बाद में कहा कि इस आंदोलन को RSS और BJP का समर्थन मिला था और उन्होंने इसमें अपनी भूमिका पर खेद जताया।

उस दौर का मूल घोटाला अंततः बरी किए जाने के फैसले पर खत्म हुआ और उसके सबसे चर्चित आंदोलन के बारे में उसके अपने नेताओं में से एक ने बाद में कहा कि उसे समर्थन देकर खड़ा किया गया था।

इसके पीछे किसी एक साजिशकर्ता को सब कुछ संचालित करते हुए साबित करने की जरूरत नहीं है।
कई हितों का एक दिशा में आ जाना इसकी बेहतर व्याख्या करता है और इसका खंडन करना भी कठिन है।
करीब एक सदी की प्रतीक्षा के बाद संघ के पास जल्दबाजी का कारण था। हेमंत करकरे की मालेगांव और उससे जुड़े बम विस्फोटों की जांच ने उसके वैचारिक संसार से जुड़े लोगों को अदालत के कटघरे तक पहुँचा दिया था।
टेलीविजन समाचार का एक ऐसा तंत्र, जो जल्द ही बड़े कारोबारी समूहों के हाथों में सिमट गया—रिलायंस ने 2014 में Network18 का नियंत्रण हासिल किया और अडानी ने 2022 में NDTV का अधिग्रहण किया—तमाशे की जरूरत महसूस कर रहा था।

भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन को एक खलनायक चाहिए था।
एक महत्वाकांक्षी संवैधानिक ऑडिटर ने उसे एक आंकड़ा दे दिया।
उनके हित एक ही दिशा में जा रहे थे।
इसके बाद अभियान कई चरणों में तेज हुआ—भ्रष्टाचार से वंशवाद तक, वंशवाद से अभिजात्यवाद तक और अभिजात्यवाद से सभ्यतागत दुश्मनी तक।

इससे सत्ता में बड़ी उपलब्धियाँ मिलीं और समाज को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
लेकिन तथ्य सामने आते रहे।
जज लोया की मृत्यु हुई।

पेगासस की सूची सामने आई। उसमें अशोक लवासा द्वारा 2019 में इस्तेमाल किया गया नंबर उन पांच अलग-अलग मामलों में उनके असहमति वाले फैसलों के कुछ सप्ताह बाद सामने आया, जिनमें प्रधानमंत्री और गृह मंत्री द्वारा कथित आदर्श आचार संहिता उल्लंघनों के मामले शामिल थे।

फोरेंसिक रिपोर्टों में भीमा कोरेगांव मामले के एक आरोपी के कंप्यूटर में फाइलें डाले जाने की बात सामने आई।
उत्तराखंड, गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में निर्वाचित सरकारें गिरा दी गईं।

एक्सप्रेस के एक विश्लेषण में पाया गया कि जांच का सामना कर रहे 25 विपक्षी राजनेताओं में से जो सत्तारूढ़ दल में चले गए, उनमें 23 को राहत मिली।

करकरे की जांच से जुड़े मामलों में अंततः आरोपियों को बरी किया गया—2018 में मक्का मस्जिद मामले में, 2019 में समझौता एक्सप्रेस मामले में और 2025 में मालेगांव मामले में।

इनमें से हर घटना एक जवाबदेही की मांग पैदा कर सकती थी।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

हर बार व्यवस्था ने एक संस्था से उधार ली हुई विश्वसनीयता के सहारे अपने किसी आचरण की कीमत चुकाई।
2011 में CAG की विश्वसनीयता दांव पर लगी।

लोया मामले और बरी किए जाने के फैसलों में अदालतों की विश्वसनीयता दांव पर लगी।
दल बदलने वाले विपक्षी नेताओं के मामलों में जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता दांव पर लगी।
मतदाता सूचियों के मामले में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता दांव पर लगी।

यह वैधता का एक पोंजी स्कीम जैसा सिलसिला था—विश्वसनीयता के पुराने कर्ज को अगली संस्था से मिले नए भरोसे के सहारे चुकाना।

पोंजी स्कीम तब खत्म होती है जब उसमें नए निवेशक आना बंद हो जाते हैं।
26 सितंबर को आयोग ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता को दांव पर लगाया।
उसने लोगों को याद दिलाया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने वाले Form 6 में किए गए बदलावों को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है और इसके लिए 27 मई 2026 के आदेश का हवाला दिया।

लेकिन एक्सप्रेस के घटनाक्रम के मुताबिक Form 6 में बदलाव जुलाई में हुआ था—सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के करीब डेढ़ महीने बाद।

अगर यह सही है तो आयोग अदालत से ऐसे बदलाव की न्यायिक मंजूरी का दावा कर रहा है, जिसे अदालत ने कभी देखा ही नहीं था।

और जिस संस्था पर वह अब भरोसा कर रहा है, उसी की रोस्टर में मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी का मामला दो दिन पहले सवालों के घेरे में आया था।

अब भरोसे का यह उधार खत्म हो चुका है।
इतिहास के दुरुपयोग ने अपनी प्रतिक्रिया पैदा कर दी।
जिस व्यवस्था ने अपने विरोधियों को बदनाम करने के लिए देश के अतीत को फिर से लिखने की कोशिश की, उसका अपना अतीत—मालेगांव से लेकर 2G मामले में बरी किए जाने तक—वापस सामने आकर पढ़ा जाने लगा।

संस्थागत विश्वसनीयता को हुआ नुकसान धीरे-धीरे और लगातार बढ़ता गया।
अब हम उस स्थिति में हैं जहाँ पूरे संस्थागत ढाँचे की विश्वसनीयता कमजोर पड़ चुकी है और राजनीति एक बेतुकेपन में बदल गई है:

चुनाव होते हैं, लेकिन उनके निर्णायक पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
अदालतें बैठती हैं, लेकिन उनकी रोस्टर व्यवस्था लचीली है।
प्रेस खबरें प्रकाशित करता है, लेकिन उसके बाद कुछ नहीं होता।

V. अधिकार नहीं, सौंपा गया भरोसा
चुनाव का निर्णायक इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि लोकतंत्र केवल बहुमत के अपनी जीत का दावा करने पर नहीं टिका होता।
वह अल्पमत की उस जीत को स्वीकार करने पर टिका होता है।
चुनाव एक परीक्षा है, राजनीति का उद्देश्य नहीं।

यह कोई युद्ध नहीं है जिसमें जीतने वाले को लूट का माल मिल जाए।
यह पूरे मतदाता समुदाय द्वारा विजेता को सौंपा गया भरोसा है—उन लोगों का भी, जिन्होंने उसके खिलाफ वोट दिया है।
जनादेश कोई स्थायी अधिकार नहीं, वापस लिया जा सकने वाला भरोसा है।
वह विजय के अहंकार पर आधारित नहीं हो सकता।

लोकतंत्र वहाँ होता है जहाँ हारने वाला यह मानता है कि मतगणना ईमानदार थी और यह विश्वास रखता है कि एक दिन उसकी भी बारी आएगी।

जब अल्पमत, अपने नेताओं, दलों और मतदाताओं के साथ, किसी नतीजे को स्वीकार करने से इनकार करता है तो वह नतीजा लोकतांत्रिक सत्ता के रूप में काम नहीं कर सकता—चाहे उसके अपने गुण कितने ही क्यों न हों।

1860 इसका सबसे कठिन उदाहरण है और इसी से यह सिद्धांत साफ होता है।
नेताओं, राज्य सरकारों और मतदाताओं के अपने पूरे तंत्र से लैस एक अल्पमत ने लिंकन के चुनाव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

संघ को युद्ध के जरिए बचाया गया और 1861 से 1865 के बीच अमेरिका एक ऐसा राष्ट्र था जो बल के सहारे एकजुट था, लोकतंत्र के सहारे नहीं।

जो लोकतंत्र बाद में लौटा, वह विजेताओं द्वारा दिया गया था और वह भी चुनिंदा लोगों को।
1877 में पराजित दक्षिण की सहमति इस कीमत पर खरीदी गई कि मुक्त किए गए अश्वेत नागरिकों को फिर उनके पूर्व मालिकों की सत्ता के अधीन कर दिया गया।

लोकतंत्र अपने हारने वालों की सहमति इस तरह भी वापस पा सकता है कि किसी और को उस समझौते से बाहर कर दे।
यह चेतावनी उस गहन पुनरीक्षण पर सीधे लागू होती है, जिसमें उपलब्ध हर आंकड़े के मुताबिक सबसे ज्यादा नाम मुसलमानों, प्रवासियों और गरीबों के कटे हैं।

ऐसे इनकार की वैधता उस कसौटी पर निर्भर करती है जिसे आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने भाषण में रखा था:
जहाँ संवैधानिक रास्ते खुले हों, वहाँ असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं है।
इसका वह निष्कर्ष अब महत्वपूर्ण है जो आज की स्थिति पर लागू होता है:
जब संवैधानिक रास्ते बंद हो जाएँ, तब इनकार जायज है।

VI. रास्तों का बंद होना

तो क्या वे रास्ते बंद हो चुके हैं?
हमारी व्यवस्था में जवाबदेही पाँच रास्तों से चलती है।
कार्यपालिका प्रशासनिक जवाबदेही देती है।
कानून कानूनी जवाबदेही तय करता है।
संसद विपक्ष के जरिए जवाबदेही सुनिश्चित करती है।
अदालतें न्यायिक जवाबदेही देती हैं।
और मीडिया सार्वजनिक जवाबदेही का काम करता है।
इन सभी को एक-दूसरे से जुड़कर काम करने के लिए बनाया गया है।
प्रेस तथ्य सामने लाता है, विपक्ष उन्हें संसद में प्रस्तावों का रूप देता है, अदालतें उन्हें आदेशों में बदलती हैं, कानून कसौटी तय करता है और कार्यपालिका उसे लागू करती है।
कार्यपालिका खुद इस मामले में हितों के टकराव में है।

उसे संवैधानिक पदों पर बैठे दो अधिकारियों के पत्र मिले और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है कि उसने कोई कार्रवाई की हो—सिवाय इसके कि उसने उस अधिकारी को उनके मूल कैडर में वापस भेजने की मंजूरी दे दी, जिसका दोनों आयुक्तों ने बचाव किया था।

संसद संख्या बल और सभापति के विवेक से बंधी हुई है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता और सभापति उसे स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं।
कानून आयोग के आयुक्तों को आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए किए गए कामों के लिए कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा देता है। अभी तक किसी अदालत ने यह तय नहीं किया है कि वैधानिक अधिकार से बाहर किए गए काम भी इस सुरक्षा के दायरे में आते हैं या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की रोस्टर व्यवस्था के लिए मुख्य न्यायाधीश के अलावा कोई जवाबदेह नहीं है।
चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने जनवरी 2018 में इस समस्या को सामने रखा था और संस्था ने अंततः इसी व्यवस्था को कायम रखकर इसका समाधान किया।

आयोग के भीतर एक और रास्ता था—उसका अपना बहुमत।
30 जुलाई को यह रास्ता काम कर गया था, जब दोनों चुनाव आयुक्तों ने आईटी की निगरानी को कमजोर करने वाले आदेश को पलट दिया था।

26 सितंबर को यह रास्ता भी बंद हो गया।
प्रेस नोट पूरे आयोग की मंजूरी से जारी हुआ।
उसमें कहा गया कि कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्र आयोग की किसी नीति या उसके आईटी विभाग से संबंधित नहीं थे, बल्कि प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के कामकाज से जुड़े थे।
जिन दो आयुक्तों के नोट में अवैधानिकता दर्ज थी, उन्होंने ही सर्वसम्मति की घोषणा करने वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।

फाइलों में उन्होंने जो भी लिखा हो, सार्वजनिक रूप से अब उनका रुख मुख्य चुनाव आयुक्त का ही रुख है।
उनकी असहमति अंततः एक निजी अंतरात्मा बनकर रह गई, जो सार्वजनिक कार्रवाई में कभी बदल नहीं सकी।
इस नोट को ध्यान से पढ़ना चाहिए, क्योंकि इससे पता चलता है कि यह व्यवस्था किस तरह काम करती है।
इसमें कुछ भी साफ तौर पर नकारा नहीं गया है, लेकिन बहुत कुछ स्वीकार किया गया है।
इसमें कहा गया कि आयोग ने अब से एजेंडा और बैठक की कार्यवाही सभी को उपलब्ध कराने का आदेश दिया है। यह चुपचाप जोशी की उस शिकायत को स्वीकार करना है कि पहले ऐसा नहीं होता था।
“गैर-SIR अवधि के लिए नियमों के अनुसार लागू फॉर्म—Registration of Electors Rules 1960—का ही इस्तेमाल किया जाएगा।”

यह भी वैधानिक आपत्ति को चुपचाप स्वीकार करना है।
ECINet की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई गई है, जिसकी अध्यक्षता एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त करेंगे और जिसमें IIT/IITs का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी होगा।

यह जोशी के स्वतंत्र ऑडिट का कमजोर रूप है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी उसी कार्यालय को दी गई है जिसने निगरानी को हटाने की कोशिश की थी।
सब कुछ ठीक कर दिया गया है।
लेकिन कुछ भी स्वीकार नहीं किया गया है।
प्रचार से पैदा हुई व्यवस्था वास्तविकता के स्तर पर कुछ मान सकती है, लेकिन अपने आख्यान को स्वीकार नहीं कर सकती, क्योंकि वही आख्यान उसकी नींव है।

यह जनता के गुस्से के प्रति अवमानना है, सार्वजनिक भरोसे का खारिज किया जाना है और हर हाल में डटे रहने का फैसला है।
यह इस व्यवस्था के चरित्र का भी संकेत है:
जहाँ जरूरी होगा, यह पीछे हटेगी।
लेकिन यह कभी नहीं कहेगी कि वह गलत थी।

VII. सत्ता का हस्तांतरण
यह भारत की राजनीति का सबसे खतरनाक सवाल खड़ा करता है:
क्या ऐसी व्यवस्था, जो इस सबके बावजूद पीछे हटने को तैयार नहीं है, सत्ता भी शांतिपूर्वक सौंपेगी?
इसके पक्ष और विपक्ष में दोनों तरह के प्रमाण हैं।
जहाँ-जहाँ उसे हार मिली, उसने उसे स्वीकार किया है—कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में।
2024 में लोकसभा में बहुमत खोने पर भी उसने सत्ता नहीं छोड़ी, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के परिणाम को स्वीकार किया।
जिस चीज की कभी परीक्षा नहीं हुई, वह राष्ट्रीय स्तर की हार है—ऐसा आम चुनाव जिसे वह हार जाए और जिसे उसके नियंत्रण वाले निर्णायक द्वारा प्रमाणित किया जाए।
चिंता व्यवस्था के सामान्य व्यवहार को लेकर नहीं है।

सवाल विशिष्ट है:
क्या वही निर्णायक उस एक हार को दर्ज करेगा और स्वीकार करेगा जो सबसे ज्यादा मायने रखती है?
26 सितंबर के बाद इसका जवाब कोई पूरे विश्वास के साथ नहीं दे सकता।
जब अगले आम चुनाव की निष्पक्षता नियमों के बजाय सत्ता में बैठे लोगों के संयम पर निर्भर हो जाए, तो लोकतंत्र एक रियायत बन जाता है।

और रियायत वापस ली जा सकती है।
अगर संवैधानिक रास्ते बंद हो जाते हैं और सत्ता के हस्तांतरण पर संदेह पैदा होता है, तो व्यापक जन-उथल-पुथल की आशंका पैदा होगी।

यहाँ पड़ोसी देशों से तुलना सही रास्ता नहीं दिखाती।
नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका छोटे देश हैं, जहाँ कुछ ही हफ्तों में जन आंदोलन खड़ा हो सकता है। उनके शासन तंत्र में RSS जैसी संगठित और गहरी सामाजिक मौजूदगी भी नहीं थी।

भारत में ऐसा आंदोलन खड़ा करने के लिए बहुत बड़े राजनीतिक प्रयास की जरूरत होगी—राज्य-दर-राज्य, भाषा-दर-भाषा।
और उसका सामना सिर्फ राज्य से नहीं, बल्कि समाज और नौकरशाही में गहरी जड़ें रखने वाले एक बड़े संगठन से भी होगा।
और इससे भी गहरी आशंका है।

अगर सत्ता का हस्तांतरण असंवैधानिक तरीके से होता है, तो उसके बाद होने वाली व्यवस्था भी संवैधानिक नहीं होगी।
लंबे समय तक चलने वाली अराजकता इसी तरह शुरू होती है।

VIII. बीज और वृक्ष
गांधी ने इसका जवाब 1909 में दिया था।
हिंद स्वराज में हिंसा और बल प्रयोग पर लिखे अध्याय में उन्होंने कहा था कि साधन और साध्य का संबंध वही है जो बीज और वृक्ष का है।

किसी सरकार का चरित्र इस बात से तय होता है कि वह सत्ता में किस तरह आती है।
यह सिद्धांत वर्तमान को समझने में मदद करता है।
जो व्यवस्था गढ़े गए विश्वास के सहारे सत्ता में आई है, उसे टिके रहने के लिए भी गढ़े गए विश्वास की जरूरत होगी।
वह वास्तविक जन-सहमति के सहारे शासन नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पास कभी वह सहमति थी ही नहीं।
इसीलिए विश्वसनीयता पैदा करने के लिए हर संस्था को अपने साथ जोड़ना पड़ा और विश्वसनीयता तब तक उधार लेनी पड़ी, जब तक उधार देने वाला कोई नहीं बचा।

लेकिन इसी सिद्धांत को ध्यान से देखें तो रास्ता भी दिखाई देता है।
और वह रास्ता अराजकता की ओर नहीं जाता।
गांधी ने यह नहीं कहा था कि जन-उभार के जरिए हासिल हुई सत्ता अव्यवस्था पैदा करती है।
उन्होंने कहा था कि उभार का चरित्र ही तय करता है कि उससे कैसी सरकार निकलेगी।
हिंसक विद्रोह से हिंसक राज्य पैदा होता है।

अहिंसक जन आंदोलन से लोकप्रिय और अहिंसक व्यवस्था पैदा हो सकती है।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन खुद एक जन-उभार था और उसी ने एक संवैधानिक गणराज्य को जन्म दिया।
वह ऐसा इसलिए कर सका क्योंकि सत्ता में आने से पहले उसने दशकों तक संविधान की बुनियाद तैयार की थी—1928 की नेहरू रिपोर्ट, 1931 का कराची प्रस्ताव जिसमें मौलिक अधिकारों की बात थी और कांग्रेस के भीतर वर्षों तक हुए आंतरिक चुनाव, अधिवेशन और प्रस्ताव।

गणराज्य का बीज आंदोलन के काम करने के तरीके में ही बोया गया था।
जब सत्ता मिली, तो उसे संभालने के लिए एक तैयार ढाँचा मौजूद था।
यही कारण है कि भारत का विशाल आकार—जिसकी वजह से पड़ोसी देशों से तुलना सही नहीं बैठती—एक सुरक्षा भी है।
जो आंदोलन पूरे महाद्वीप में खड़ा होना है, वह अचानक सड़क पर जमा हुई भीड़ नहीं हो सकता।
उसे बढ़ते हुए संगठन, नेतृत्व, नियम और कार्यक्रम विकसित करने होंगे।
उसे बनाने की यही प्रक्रिया उसे वह गहराई देती है जो अराजकता को रोकती है।
छोटे देशों के सतही जन-उभार अक्सर सत्ता का खालीपन छोड़ जाते हैं।
गहरा आंदोलन संस्थाएँ पैदा करता है।

असल खतरा कहीं और है—दो संगठित ताकतों के आमने-सामने आ जाने में।
कोलंबो और ढाका में जन-उभार का सामना राज्य से था।
भारत में उसका सामना राज्य के साथ-साथ ऐसे जनसंगठन से होगा जो उसके खिलाफ लामबंद हो सकता है।
सड़क का सामना सड़क से होगा।

यहीं गांधी की अहिंसा केवल नैतिकता नहीं रह जाती, बल्कि रणनीतिक जरूरत बन जाती है।
किसी संगठित प्रतिआंदोलन को वैधता तभी मिल सकती है जब उसके सामने खड़ा आंदोलन हिंसक हो जाए।
अहिंसा संघ को वह एकमात्र चीज हासिल करने से रोकती है जिसके जरिए वह अपनी लामबंदी को व्यवस्था की रक्षा के रूप में पेश कर सकता है।

IX. 1977 की चेतावनी
भारत यह एक बार पहले कर चुका है।
और उस अनुभव से दोनों दिशाओं में सबक मिलता है।
जेपी आंदोलन मुख्यतः अहिंसक था।

उसने चुनाव के लिए मजबूर किया, चुनाव जीता और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण हुआ।
यह इस बात का प्रमाण है कि भारत में एक जमी हुई सत्ता को संवैधानिक तरीके से बदला जा सकता है।
लेकिन जनता सरकार ढाई साल के भीतर बिखर गई।

बीज और वृक्ष का सिद्धांत इसकी भी व्याख्या करता है।
इंदिरा गांधी के विरोध में एकजुट हुआ आंदोलन ऐसी सरकार लेकर आया जो उसी विरोध के सहारे खड़ी थी।
जैसे ही साझा दुश्मन खत्म हुआ, वह बिखर गई।
जो आंदोलन केवल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ, गहन पुनरीक्षण के खिलाफ या मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ एकजुट होगा, वह भी इसी तरह की सरकार पैदा करेगा।
सिर्फ विरोध से बनी सरकार अंततः सिर्फ विरोध की सरकार बनकर रह जाती है।

X. गणराज्य के लिए रचनात्मक कार्यक्रम
इस समस्या का गांधी का जवाब था—रचनात्मक कार्यक्रम।
उनका मानना था कि स्वराज सत्ता बदलने के क्षण में हासिल नहीं होता।
वह उससे पहले बनता है—आंदोलन के अपने कामकाज में, जहाँ वह आज ही उन संबंधों और मूल्यों का अभ्यास करता है जिनकी भविष्य के राज्य को जरूरत होगी।
आज की स्थिति पर इसे लागू करें तो आंदोलन का पहला काम उस लोकतांत्रिक समझौते को अभी से तैयार करना होना चाहिए जिसे वह बहाल करना चाहता है।

इसके चार हिस्से हैं।
पहला, उसे अपनी शर्तें स्पष्ट करनी चाहिए।
विपक्ष लोकतंत्र से दूर हुए बिना इस चुनावी निर्णायक को मान्यता देने से इनकार कर सकता है।
वह आयोग के प्रति औपचारिक अविश्वास की घोषणा कर सकता है, लेकिन चुनाव लड़ता रहे—एक वैध दावेदार के रूप में, किसी अधीनस्थ भागीदार की तरह नहीं।

मांग का स्वरूप बदलना होगा:
“हम नतीजे नहीं मानते” से
“हम इस निर्णायक को नहीं मानते और ये वे शर्तें हैं जिन पर हम किसी निर्णायक को स्वीकार करेंगे।”

इन शर्तों को स्पष्ट रूप से रखा जा सकता है:
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की ऐसी प्रक्रिया, जिसमें चयन समिति में एक निष्पक्ष सदस्य वापस आए—जैसा कि संसद द्वारा उस व्यवस्था को बदलने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal मामले में निर्देश दिया था;
ECINet और उसके एक्सेस लॉग का स्वतंत्र और सार्वजनिक ऑडिट—ऐसी समिति के जरिए नहीं जो उसी कार्यालय के अधीन हो जिसने निगरानी हटाने की कोशिश की थी;

मशीन-पठनीय मतदाता सूचियाँ और हर नाम हटाने का कारण दर्ज करने वाला सार्वजनिक रिकॉर्ड;
ERO के वैधानिक अधिकार की बहाली और प्रमाणन, ताकि कोई सॉफ्टवेयर उस फैसले को पलट न सके जिसे कानून किसी नामित अधिकारी को लेने का अधिकार देता है;

और मतदान मशीनों का सवाल केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक और स्वतंत्र परीक्षण के जरिए तय किया जाए।
दूसरा, उसे एक समयसीमा तय करनी चाहिए।
अगला आम चुनाव 2029 में होना है।

विपक्ष का रुख होना चाहिए कि इन शर्तों को पूरा किए बिना वह इस चुनावी निर्णायक के तहत होने वाले चुनाव को स्वीकार नहीं करेगा।

इससे व्यवस्था को सुधार के लिए तीन साल मिलेंगे।
अगर वह ऐसा नहीं करती तो उसके सामने वैधता का संकट खड़ा होगा, जिसे वह यह कहकर नहीं टाल सकेगी कि उसे पता नहीं था कि सहमति के लिए क्या जरूरी है।
उसे पहले ही, लिखित रूप में, बता दिया गया होगा।
तीसरा, उसे क्रम का सम्मान करना चाहिए।

सहमति वापस लेना तभी जायज है जब जनता संवैधानिक रास्तों को आजमाए जाते और बंद होते हुए देख चुकी हो।
इसलिए विपक्ष को रिट याचिकाओं, हटाने के प्रस्ताव और RTI आवेदनों को पूरी तरह और सार्वजनिक रूप से आगे बढ़ाना चाहिए।
हर इनकार को प्रमाण के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए।
उसके बाद ही वह मान्यता से इनकार की ओर बढ़े।
26 सितंबर को एक रास्ता बंद हुआ है।
अब बंद हुए रास्तों का पूरा रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि विपक्ष ने कोशिश किए बिना ही इनकार कर दिया था।

चौथा, उसे संवैधानिक रास्ता अभी से तैयार करना चाहिए।
अराजकता की आशंका के लिहाज से यही सबसे महत्वपूर्ण है।
बांग्लादेश का संकट 2011 में शुरू हुआ, जब तत्कालीन सरकार ने उस कार्यवाहक व्यवस्था को खत्म कर दिया जिसके तहत वहाँ चुनाव होते थे।

इसके बाद हारने वालों ने चुनावी नतीजों को स्वीकार करना बंद किया, बहिष्कार शुरू हुए और अंततः एक जन-उभार ने संविधान से बाहर की एक सत्ता-परिवर्तन प्रक्रिया को जन्म दिया, जिसका भविष्य अब भी अनिश्चित है।
भारत में ऐसी कोई कार्यवाहक व्यवस्था नहीं है।
इसलिए विपक्ष को अभी से इसका मसौदा तैयार करना चाहिए, सार्वजनिक रूप से इसकी वकालत करनी चाहिए और अपनी मांगों में सत्ता हस्तांतरण की संवैधानिक व्यवस्था को शामिल करना चाहिए।

इसमें पुनर्गठित चुनाव आयोग, सार्वजनिक ऑडिट वाली मतदाता सूचियाँ, सहमति से तय चुनाव कार्यक्रम और जरूरत पड़ने पर चुनावी प्रशासन के लिए अंतरिम व्यवस्था का प्रावधान करने वाला संवैधानिक संशोधन शामिल हो सकता है।
जो आंदोलन यह मांग करता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा दिया जाए लेकिन उसके बाद क्या होगा, इसका कोई रास्ता नहीं बताता, वह बांग्लादेश की ओर ले जाता है।

जो आंदोलन अपना संवैधानिक रास्ता साथ लेकर चलता है, वह 1977 की ओर ले जाता है—उसके बाद हुई टूट-फूट के बिना।
इन चारों के पीछे वह साझा उद्देश्य है, जिसकी कमी अब तक विपक्ष में रही है।
साझी शिकायत, साझा इच्छा नहीं होती।

व्यवस्था में संगठनात्मक एकता है—एक नेतृत्व, एक संगठन, एक कहानी।
विपक्ष को यह एकता खुद बनानी होगी।
भारत के अपने अनुभव बताते हैं कि कैसे।
उसे लगभग एक विलय जैसी एकजुटता की जरूरत है।

उसे शिकायत को इस रूप में रखना होगा कि लोग क्या खो रहे हैं:
पहले वोट,
फिर राशन कार्ड,
और फिर वह नागरिकता, जिसके प्रतीक के रूप में वोट खड़ा था।
और उसे ऐसे नैतिक नेतृत्व की जरूरत है जिसका सत्ता में कोई निजी हित न हो।
उसके पास एक ऐसा लाभ भी है जिसका वह शायद ही कभी इस्तेमाल करता है।
बहुमत का इस पूरी प्रक्रिया के प्रति समर्थन गुप्त मतदान में व्यक्त होता है।
और यह तथ्य कि उसे गुप्त रूप से व्यक्त करना पड़ता है, बताता है कि लोगों ने अभी अपनी शर्म पूरी तरह नहीं खोई है।
कोई भीड़ यह मांग करने के लिए नहीं निकलती कि उसके पड़ोसियों के नाम मतदाता सूची से काट दिए जाएँ।
पिछले सप्ताह व्यवस्था का हर पीछे हटना—फॉर्म वापस लाने से लेकर रोक को सीमित करने और बैठक की कार्यवाही उपलब्ध कराने तक—सार्वजनिक दबाव के सामने हुआ।

जिस समर्थन को सार्वजनिक रूप से अपना बचाव करना मुश्किल हो, वह मतदान केंद्र के भीतर तो बना रह सकता है, लेकिन खुले में चुनौती मिलने पर पीछे हट सकता है।
जिन लोगों को उनके अधिकार से वंचित किया गया है, उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है।
उनकी ताकत उनकी दृश्यता है।
इसीलिए व्यवस्था की जवाबी रणनीति हमेशा उन्हें छिपाने की रही है—उन्हें घुसपैठिया, राष्ट्र-विरोधी और देशद्रोही कहना और हर आलोचक को यह याद दिलाना कि कहीं न कहीं कोई फाइल खोली जा सकती है।

XI. हम कौन-सा बीज बो रहे हैं
कोई भी व्यक्ति विश्वासघाती विजेता की उदारता का इंतजार नहीं करता।
लेकिन जो शिकायत लेकर खड़ा है, उसे यह याद रखना होगा कि उसकी शिकायत को वैध क्या बनाता है।
मांग प्रतिशोध की नहीं, पुनर्स्थापना की है।
यह किसी विरोधी को नष्ट करने की नहीं, एक सौंपे गए भरोसे को वापस पाने की मांग है।
जो आंदोलन व्यवस्था को नष्ट करने की कोशिश करेगा, वह एक और विनाशकारी व्यवस्था का बीज बोएगा।
जो आंदोलन अहिंसक और रचनात्मक तरीकों से, पहले से तैयार संवैधानिक रास्ते के साथ, जन-सहमति को बहाल करने की कोशिश करेगा, वही गणराज्य का बीज बोएगा।

सितंबर 2026 ने दिखा दिया है कि प्रचार के सहारे खड़ी व्यवस्था से क्या पैदा होता है:
एक ऐसा निर्णायक जो अपने ही रिकॉर्ड से इनकार करता है,
एक ऐसी अदालत जो अपनी ही रोस्टर व्यवस्था को मोड़ देती है,
और ऐसे असहमति रखने वाले लोग जो अपनी ही असहमति से हाथ खींच लेते हैं।
अब सवाल यह नहीं है कि भारत उथल-पुथल का सामना करेगा या नहीं।
जिस राजनीतिक व्यवस्था की सभी संस्थाओं ने अपनी विश्वसनीयता खो दी हो, उसमें किसी न किसी रूप में उथल-पुथल होगी ही।

सवाल यह है कि आने वाली उथल-पुथल अपने भीतर क्या लेकर आएगी।
गांधी की बात पहले गणराज्य के समय जितनी सच थी, अगले गणराज्य के लिए भी उतनी ही सच है:
वह उसी बीज से उगेगा, जो आज बोया जा रहा है।

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