चार घरानों ने लूट लिया आईडीबीआई बैंक !

चार घरानों ने आईडीबीआई (IDBI) बैंक को ऐसे लूटा कि अब बैंक ही बिक गया। मार्च तक भारत का एक बड़ा ‘सरकारी’ बैंक निजी हाथों में होगा। कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स ने फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स (कनाडा) को 60.72% हिस्सेदारी बेचने की मंजूरी दे दी। कुल सौदा 52,878 करोड़ रुपये में हुआ है। लगभग 81 रुपये प्रति शेयर। इसमें सरकार की 30.48% और एलआईसी की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है। सौदे के बाद सरकार के पास 15% और एलआईसी के पास 19% हिस्सेदारी बचेगी। मैनेजमेंट और कण्ट्रोल फेयरफैक्स का रहेगा। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की अंतिम मंजूरी और अन्य नियामक अनुमोदन बचा है। शेयर ट्रांसफर होना है। कुछ कानूनी औपचारिक प्रक्रियाएं बची हैं। सौदा पूरा होने से पहले सरकार के पास इसकी 45.5 प्रतिशत और एलआईसी के पास 49.2 मिलकियत है। बाकी हिस्से के मालिक सार्वजनिक शेयरधारक लोग है।

बैंक की प्रमुख सम्पत्तियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की हैं वित्तीय संपत्तियाँ,जो बैंक की बैलेंस शीट का बड़ा हिस्सा हैं और ऑफिस की बिल्डिंगें ,जमीन-मकान आदि। , बैंक की ही बैलेंस शीट के अनुसार 31 मार्च 2026 तक बैंक की कुल संपत्तियाँ लगभग 4 लाख 67 हज़ार करोड़ रुपये की थीं। और अब ये ‘बिक’ रही हैं केवल 52,878 करोड़ रुपये में। सरकार थोड़ा तो वाजिब भाव लगा लेती।

खरबों की प्रॉपर्टी सस्ते में :
आईडीबीआई बैंक के पास सबसे ज्यादा रियल एस्टेट प्रॉपर्टी मुंबई में है। 68 प्रॉपर्टी मुंबई में सबसे प्राइम इलाकों में हैं। कफ परेड, नई बॉम्बे में विशाल लैंडमार्क बिल्डिंग्स है। पुणे में 20, चेन्नई में 9 , अहमदाबाद में 7, कोलकाता में 6, दिल्ली में 5, हैदराबाद में 5 भव्य कार्यालयों की इमारतें हैं। हज़ारो एटीएम, 2100 ब्रांच हैं। हैदराबाद में गच्चिबोवली फाइनेंशियल डिस्ट्रिक्ट क्षेत्र में लगभग 50 एकड़ से ज्यादा जमीन है । आस-पास की सरकारी नीलामी के आधार पर इसकी बाजार कीमत 250 करोड़ प्रति एकड़ के आसपास हो सकती है, जिससे सिर्फ इस एक जमीन का अनुमानित मूल्य 12,500–13,450 करोड़ रूपये बताया जाता है।

पूरा बैंक ही बेचने का मामला :
आईडीबीआई बैंक के अलावा पिछले वर्षों में कोई बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक पूरी तरह नहीं बेचा गया है। कई सार्वजनिक बैंकों का विलय कर उनकी संख्या घटाकर 12 कर दी गई। जैसे एसबीआई में सहयोगी बैंक, बैंक ऑफ़ बड़ौदा में देना बैंक और विजया बैंक का विलय किया गया। पर ये बैंक बेचे नहीं गए। यहाँ तो पूरा बैंक ही बिक रहा है।

बेचने की नौबत गंभीर वित्तीय संकट और सरकार की रणनीतिक विनिवेश नीति के कारण पड़ी। गंभीर एनपीए संकट पैदा हो गया था। बैंक ने कई बड़े कॉरपोरेट उधारकर्ताओं (किंगफिशर एयरलाइंस, एबीजी शिपयार्ड, वीडियोकॉन, विनसोम डायमंड्स ) को भारी ऋण दिए, जो बाद में डिफॉल्ट हो गए। सितंबर 2018 में ग्रॉस एनपीए 31.78% तक पहुंच गया था। नेट एनपीए भी बहुत ऊंचा था और पूंजी पर्याप्तता अनुपात 6.22% पर गिर गया था।

भगोड़े विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस का कुल बकाया लगभग 9,000 से 10,000 करोड़ (ब्याज सहित और भी अधिक) के आसपास बताया गया था जो रूप से बैंकों के एक कंसोर्टियम का मामला था। यहाँ आईडीबीआई के करीब 1000 करोड़ डूबे। एबीजी शिपयार्ड भारत का सबसे बड़ा बैंक घोटाला मामलों में से एक माना जाता है। कुल बैंक धोखाधड़ी का आंकड़ा ₹22,000–23,000 करोड़ के आसपास बताया गया (यह सबसे बड़े बैंक धोखाधड़ी मामलों में से एक है)। यहाँ आईडीबीआई के करीब 3700 करोड़ रुपये लुटे, वीडियोकोन वाला वेणुगोपाल धूत भारतीय बैंकों के 70,000 से 90,000 करोड़ ले डूबा, जिसमें आईडीबीआई के करीब 10,000 करोड़ रुपये थे। विनसम डायमंड्स वाला भी करीब 1,147 करोड़ का चूना लगा गया।

कॉर्पोरेट ने मोटा लोन लिया और हाथ खड़े कर दिये :
आईडीबीआई बैंक की कहानी भारत के बैंकिंग क्षेत्र के उतार-चढ़ाव का आईना है। 1964 में औद्योगिक विकास बैंक ऑफ इंडिया के रूप में स्थापित यह संस्था शुरू में लांग टर्म इंडस्ट्रियल लोन देने के लिए बनाई गई थी। बाद में यह कॉमर्शियल बैंक बन गई। 2000 के दशक के मध्य से अंत तक, कई अन्य बैंकों की तरह इसने भी बड़े कॉरपोरेट घरानों को भर भर कर मोटे मोटे कर्जे दिये, जो बाद में डिफॉल्ट हो गए।

सरकार ने 2010 से 2020 के बीच लगभग 25,000 करोड़ रुपये की पूंजी डालकर बैंक को सहारा दिया। 2019 में एलआईसी ने 21,624 करोड़ रुपये लगाकर नियंत्रित हिस्सेदारी हासिल की, जिसके बाद आरबीआई ने इसे प्राइवेट सेक्टर बैंक के रूप में वर्गीकृत किया। बाद में बैंक में उल्लेखनीय सुधार हुआ। मार्च 2026 तक ग्रॉस एनपीए घटकर 2.32 प्रतिशत, नेट एनपीए 0.15 प्रतिशत आ गया। कल्पना कीजिए कि जो एनपीए 31 प्रतिशत था, वह कितना कम हो गया। और तो और, वित्त वर्ष 2025-26 में बैंक का रिकॉर्ड शुद्ध लाभ 9,513 करोड़ रुपये रहा।

मुनाफा कमा रहा बैंक बेच रहे :
फिर बेचने की जरूरत क्यों? सरकार का तर्क है कि बैंक अतीत में बार-बार सार्वजनिक पूंजी पर निर्भर रहा। रणनीतिक निवेशक प्रबंधन नियंत्रण लेकर निजी पूंजी, बेहतर तकनीक और पेशेवर प्रबंधन लाएगा। इससे बैंक की वृद्धि क्षमता बढ़ेगी और सरकार व एलआईसी को डिविडेंड या भविष्य की कीमत वृद्धि से लाभ मिल सकता है। यह विनिवेश कार्यक्रम का हिस्सा है, जो गैर-रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की उपस्थिति कम करने और राजकोषीय संसाधन जुटाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा है। फेयरफैक्स सौदे से सरकार को लगभग 26,500 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है। भारत-कनाडा संबंधों में सुधार (मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद) ने भी सौदे को संभव बनाने में भूमिका निभाई। जो कंपनी इसे ले रही है वह भी भारतीय मूल का ही है।

जनता के पैसे से बनी बैंक निजी हाथों में :
राहुल गांधी नेआईडीबीआई के कर्मचारियों को खुले पत्र में लिखा कि बैंक कर्मचारियों ने मेहनत से मुनाफे में आया है। उन्होंने संसद में भी पूछा था कि लाभदायक सार्वजनिक बैंक को बेचने का कारण क्या है ? सरकार ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया। सरकार ने संसद को आश्वासन दिया था कि आईडीबीआई में कम से कम 51% हिस्सेदारी सरकार अपने पास रखेगी। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन जनता से किया गया वादा है। सार्वजनिक पैसे से बनी संस्था जनता की है। सार्वजनिक बैंक राष्ट्र निर्माण के उपकरण हैं, बेचने योग्य संपत्ति नहीं।

पूर्व सचिव ई.ए.एस. शर्मा ने वित्त मंत्री और राष्ट्रपति को कई पत्र लिखकर फैसले को अविवेकी और अनुचित बताया है। उनकी मुख्य आपत्तियां हैं कि 60.72% हिस्सेदारी को ₹52,878 करोड़ में बेचना पिटीएन्स(बहुत कम कीमत) है। जमीन की संपत्तियों का मूल्य बहुत अधिक है। कुछ जमीनों को लैंड एक्विजिशन एक्ट 1894 के तहत सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित किया गया था। निजी हाथों में जाने पर कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। फेयरफैक्स के पास पहले सेसीबीएस बैंक में नियंत्रित हिस्सेदारी है। आरबीआई आमतौर पर एक ही प्रमोटर को दो बैंक नियंत्रित करने की अनुमति नहीं देता। एलआईसी के एक निदेशक के फेयरफैक्स की सहायक कंपनी के बोर्ड में होने के आरोप भी है। यानी बंदा एलआईसी का निदेशक था और फेयरफैक्स से भी जुड़ा था। आपत्तियां बताती हैं कि मामला गंभीर है।

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