अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने शायद वाशिंगटन में सत्ता के संतुलन में बदलाव से कहीं अधिक महत्वपूर्ण परिणाम पैदा किया है। कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमो exक्रेटिक पार्टी की जीत और विभिन्न राज्यों की सरकारों में उसकी उल्लेखनीय बढ़त डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति के प्रति ऐसी अस्वीकृति का संकेत है, जिसकी बहुत कम लोगों ने उम्मीद की थी।
इसके तात्कालिक कारण जाने-पहचाने हैं : महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, युद्ध के परिणाम, आव्रजन और यह बढ़ती धारणा कि प्रशासन ने सार्वजनिक जिम्मेदारियों के मुकाबले निजी हितों को अधिक महत्व दिया है।
लेकिन इस चुनावी नतीजे का गहरा महत्व शायद कहीं और है। संभव है कि इसने उस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के राजनीतिक आत्मविश्वास को कमजोर किया हो, जो सार्वजनिक सत्ता को निजी हितों की पूर्ति का साधन और जवाबदेही को ऐसी बाधा मानता है, जिसे किसी भी तरह दरकिनार किया जा सकता है।
ट्रंपवाद को अक्सर आक्रामकता, सत्तावाद या लोकलुभावनवाद के रूप में परिभाषित किया जाता है। ये विशेषण गलत नहीं हैं, लेकिन इसकी एक बुनियादी विशेषता को नजरअंदाज करते हैं। इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है- निर्लज्जता और दुस्साहस। यह विश्वास कि एक बार सत्ता हासिल हो जाने के बाद व्यक्ति जवाबदेही से मुक्त हो जाता है; सार्वजनिक पद और निजी हितों के बीच का अंतर मनमाने ढंग से तय किया जा सकता है; और संस्थाओं का काम उनके नियमों का पालन करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने हिसाब से संचालित करना, डराना या दरकिनार करना है।
इसके तरीके सरकार की औपचारिक व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। इनमें परिवार के सदस्य, निजी मध्यस्थ, अनौपचारिक दूत, कारोबारी हित और विदेशी सरकारों के साथ संबंध भी शामिल हैं।
इसका परिणाम ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के रूप में सामने आता है, जिसमें व्यापक सार्वजनिक महत्व के फैसले ऐसे माध्यमों से किए जा सकते हैं, जो पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की सामान्य प्रक्रियाओं से बाहर होते हैं।
इसीलिए यह चुनाव विधायी नियंत्रण के सवाल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। कांग्रेस जांच कर सकती है, फैसलों में बाधा डाल सकती है, तथ्यों को उजागर कर सकती है और सरकारी खर्च पर रोक लगा सकती है। वह अधिकारियों को तलब कर सकती है, जानकारियां मांग सकती है और कार्यपालिका के आचरण को राजनीतिक रूप से महंगा बना सकती है।
लेकिन वह राष्ट्रपति के विवेकाधिकार, अनौपचारिक कूटनीति या उन निजी संबंधों पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख सकती, जिनके माध्यम से प्रभाव का इस्तेमाल किया जाता है।
इसलिए ट्रंप की सत्ता की सबसे तात्कालिक परीक्षा शायद उनकी अपनी पार्टी के भीतर होने वाली है। ट्रंप को अब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में अमेरिकी मतदाताओं के सामने नहीं जाना होगा। लेकिन रिपब्लिकन सांसदों और भविष्य के रिपब्लिकन उम्मीदवारों को चुनाव लड़ना होगा।
उन्हें तय करना होगा कि उनका राजनीतिक अस्तित्व ट्रंप के प्रति निरंतर समर्पण में है या वे ऐसे नेता से कुछ स्वतंत्रता हासिल कर सकते हैं, जिसकी चुनावी कमजोरियों को नजरअंदाज करना अब लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
इससे बड़ा सवाल उन संबंधों के नेटवर्क का है, जिसे ट्रंप ने अपने इर्द-गिर्द खड़ा किया है। इसमें राजनीतिक सत्ता, निजी संपत्ति, पारिवारिक हित, विदेशी सरकारें, निरंकुश शासक और युद्ध, कूटनीति तथा व्यापार से पैदा होने वाले व्यावसायिक अवसर शामिल हैं।
यह जरूरी नहीं कि यह किसी केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर संचालित षड्यंत्र हो। ऐसा होना आवश्यक भी नहीं है। आपसी लाभ के नेटवर्क साझा हितों, विशेष पहुंच और पारस्परिक संरक्षण के माध्यम से काम कर सकते हैं। उनकी ताकत अक्सर इसी बात में होती है कि वे किसी औपचारिक जवाबदेही के दायरे में नहीं आते।
संवेदनशील कूटनीतिक वार्ताओं में जेरेड कुशनर की भागीदारी, जबकि वह पर्याप्त विदेशी पूंजी से समर्थित एक बड़े निवेश कोष का प्रबंधन भी कर रहे हैं, इसका एक विशेष रूप से उल्लेखनीय उदाहरण है।
इसी तरह ट्रंप परिवार के अंतरराष्ट्रीय कारोबारी उपक्रमों ने भी व्यावसायिक अवसरों और राजनीतिक सत्ता के बीच निकटता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
ये परिस्थितियां अपने आप में किसी लेन-देन आधारित राजनीतिक सौदे (Quid Pro Quo) को साबित नहीं करतीं। लेकिन वे एक बुनियादी समस्या जरूर उजागर करती हैं : जब राष्ट्रीय सत्ता का इस्तेमाल करने वाले लोगों के निजी हित और राष्ट्रीय हित बार-बार एक ही राजनीतिक दायरे में दिखाई देते हों, तो नागरिक इन दोनों के बीच अंतर कैसे कर सकते हैं?
जेफ्री एपस्टीन से जुड़े खुलासों ने भी इस बात की ओर नए सिरे से ध्यान खींचा है कि प्रभावशाली लोगों को किस तरह की पहुंच हासिल थी और किस प्रकार धन, प्रभाव तथा राजनीतिक विशेषाधिकार के बीच अनौपचारिक नेटवर्क काम करते थे।
ये खुलासे किसी एक राजनीतिक षड्यंत्र को स्थापित नहीं करते। उनका महत्व उस व्यापक सवाल में है, जो वे अभिजात वर्ग की दंडमुक्ति को लेकर उठाते हैं। क्या ऐसे संबंध, जिनके कारण आम नागरिकों को जांच और जवाबदेही का सामना करना पड़ सकता है, प्रभावशाली लोगों के मामले में धन, प्रभाव और संस्थागत संरक्षण के कारण सुरक्षित रह जाते हैं?
और अब बात भारत की।
वर्षों से इस बात को लेकर अटकलें लगती रही हैं कि नरेंद्र मोदी की राजनीतिक परियोजना किस हद तक सत्ता के इस व्यापक अंतरराष्ट्रीय तंत्र से जुड़ी रही है या उसे इससे लाभ मिला है।
मोदी सरकार और इजरायल के बीच संबंधों में विशेष रूप से रक्षा, खुफिया और निगरानी के क्षेत्र में जबरदस्त विस्तार हुआ है। इन संबंधों को अमेरिकी राजनीतिक प्रतिष्ठान के भीतर भी बढ़ावा मिला है, जो चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के नजरिये से भारत को तेजी से देखने लगा है। ट्रंप के कार्यकाल में इस रिश्ते के व्यक्तिगत और राजनीतिक आयाम और अधिक स्पष्ट हो गए।
पेगासस विवाद ने निगरानी तकनीक, राज्य की सत्ता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संबंधों को तीखे ढंग से सामने ला दिया।
मोदी की 2017 की इजरायल यात्रा के बाद एक व्यापक रक्षा खरीद समझौते में पेगासस स्पाइवेयर को कथित रूप से शामिल किए जाने की खबरों ने ऐसे सवाल खड़े किए, जिनका सार्वजनिक रूप से अब तक संतोषजनक समाधान नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट की जांच में यह स्थापित नहीं हुआ कि जिन उपकरणों की जांच की गई, उनमें पेगासस का इस्तेमाल हुआ था। लेकिन सरकार के असहयोग ने भी जनता का विश्वास बहाल करने में कोई मदद नहीं की।
यह विवाद केवल एक सॉफ्टवेयर का मामला नहीं था। यह इस आशंका से जुड़ा था कि राज्य की निगरानी करने वाले उपकरणों का इस्तेमाल पर्याप्त लोकतांत्रिक निगरानी के बिना किया जा सकता है।
चुनावी हेरफेर के आरोपों ने भी जनता के संदेह को बढ़ाया है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर दावे और इस तरह की अटकलें शामिल हैं कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले ही प्रभावशाली हितों ने मोदी के सत्ता में आने का समर्थन किया था।
इन आरोपों को स्थापित तथ्यों से अलग करके देखना जरूरी है। ऐसा कोई प्रमाणित साक्ष्य नहीं है कि इजरायल या अमेरिका ने भारत में किसी चुनाव के नतीजे को अपने हिसाब से प्रभावित किया हो।
लेकिन केवल इसलिए इन सवालों के राजनीतिक महत्व को खारिज नहीं किया जा सकता कि सबसे गंभीर आरोप अभी तक साबित नहीं हुए हैं। चुनावों की निष्पक्षता और उन्हें संचालित करने वाली संस्थाओं की स्वतंत्रता ऐसे विषय हैं, जिन पर जनता का विश्वास अनिवार्य है।
इससे अधिक प्रमाणित मुद्दा भारत की घरेलू राजनीतिक परियोजना का ऐसे अंतरराष्ट्रीय माहौल के साथ बढ़ता हुआ जुड़ाव है, जो कार्यपालिका द्वारा असाधारण शक्तियों के इस्तेमाल के प्रति लगातार अधिक सहिष्णु होता जा रहा है।
मोदी को शक्तिशाली सरकारों के साथ अपने संबंधों से मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय वैधता, रणनीतिक सहयोग और कूटनीतिक पहुंच का लाभ मिला है। लेकिन ऐसे संबंधों की कीमत भी चुकानी पड़ती है। वे स्वतंत्र नीतिगत फैसले लेने की गुंजाइश को सीमित कर सकते हैं, निर्भरता पैदा कर सकते हैं और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना कठिन बना सकते हैं।
भारत के इजरायल के साथ संबंधों और फिलिस्तीन के प्रति उसके रुख के बदलते स्वरूप पर गौर कीजिए।
भारत कभी उन देशों में प्रमुख स्थान रखता था, जो इजरायल के साथ संबंध बनाए रखते हुए फिलिस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करते थे। बाद के वर्षों में इस संबंध में व्यापक बदलाव आया है।
इजरायल के साथ भारत का रणनीतिक और रक्षा सहयोग लगातार महत्वपूर्ण होता गया है। दूसरी ओर, गाजा में मानवीय त्रासदी ने फिलिस्तीन के सवाल को अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
इस बदलाव को केवल ट्रंप के कारण नहीं समझा जा सकता। भारत की स्वतंत्र रणनीतिक गणनाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन यह बदलाव राजनीतिक पक्षधरता की कीमत को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है।
यही सवाल अमेरिका के साथ भारत के संबंधों पर भी लागू होता है।
ट्रंप प्रशासन द्वारा घोषित व्यापार ढांचा, जिसमें भारत की ओर से रूसी तेल की खरीद को लेकर बनाया गया दबाव भी शामिल है, यह दिखाता है कि रणनीतिक संबंध किस तरह आर्थिक दबाव का माध्यम बन सकते हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर भारत के दावों की परीक्षा सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि शक्तिशाली साझेदारों के लिए असुविधाजनक होने के बावजूद भारत अपने स्वतंत्र फैसले लेने में कितना सक्षम है।
अडानी विवाद इसी समस्या का एक दूसरा पहलू सामने लाता है।
बड़े कारोबारी हितों, राजनीतिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय वित्त के बीच बढ़ता हुआ संबंध गहन जांच-पड़ताल की मांग करता है।
यह दावा करना गैर-जिम्मेदाराना होगा कि अमेरिका में हुई कुछ विशेष कानूनी कार्यवाहियां या समझौते किसी राजनीतिक सौदे को साबित करते हैं। लेकिन निजी संपत्ति के संकेंद्रण और राजनीतिक सत्ता के बीच संबंधों को लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए अप्रासंगिक मानना भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना होगा।
सवाल यह नहीं है कि किसी कारोबारी को अपने व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाने का अधिकार है या नहीं। सवाल यह है कि क्या राज्य की संस्थाएं इतनी स्वतंत्र हैं कि यह सुनिश्चित कर सकें कि सार्वजनिक सत्ता का इस्तेमाल निजी लाभ की रक्षा के लिए न हो।
ऑपरेशन सिंदूर ने एक अलग, लेकिन इससे जुड़ा तनाव पैदा किया।
ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में मदद की थी। नई दिल्ली ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह सहमति दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य संपर्क के माध्यम से बनी थी।
यह असहमति केवल कूटनीतिक श्रेय लेने का मामला नहीं थी। इसका संबंध भारत की अपने रणनीतिक फैसलों की व्याख्या पर नियंत्रण बनाए रखने की क्षमता से था।
संप्रभु स्वायत्तता का दावा करने वाली सरकार को अपने निकटतम साझेदारों तक को अपने फैसलों का श्रेय लेने से रोकने में सक्षम होना चाहिए।
इसलिए ट्रंप और नेतन्याहू की कमजोर होती स्थिति के परिणाम उनकी घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों से कहीं आगे तक जा सकते हैं।
नेतन्याहू की चुनावी स्थिति अनिश्चित हो गई है और उनका गठबंधन संसदीय बहुमत से पीछे रह गया है। दूसरी ओर, ट्रंप को चुनाव में निर्णायक झटका लगा है।
ये दोनों एक तरह की हार नहीं हैं और न ही इनसे उन संबंधों का तंत्र अपने आप समाप्त हो जाता है, जिसने उनके प्रभाव को बनाए रखा है। लेकिन इन दोनों घटनाओं से ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का राजनीतिक आत्मविश्वास कमजोर पड़ सकता है, जो व्यक्तिगत सत्ता, अनौपचारिक नेटवर्क और नियमों के चुनिंदा इस्तेमाल पर निर्भर रही है।
अंतरराष्ट्रीय कानून की वापसी का जश्न मनाना अभी जल्दबाजी होगी।
ट्रंप के आने से बहुत पहले ही अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था कमजोर हो चुकी थी। शक्तिशाली देश अपनी सुविधा के अनुसार अंतरराष्ट्रीय संधियों और परंपराओं का हवाला देते रहे हैं और असुविधा होने पर उनकी अनदेखी करते रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की कमजोरी केवल अमेरिका या इजरायल की देन नहीं है। यह नियमों को चुनिंदा तरीके से लागू करने, बड़ी शक्तियों को विशेष छूट देने और बहुपक्षीय दायित्वों की जगह धीरे-धीरे द्विपक्षीय सौदों को प्राथमिकता देने का संचयी परिणाम है।
फिर भी, ऐसे राजनीतिक नेताओं की हार, जिन्होंने इस तरह के अपवादवादी रवैये को असामान्य रूप से निर्लज्ज बना दिया है, संस्थागत प्रतिरोध की गुंजाइश फिर से खोल सकती है।
यदि कांग्रेस कार्यपालिका के आचरण की जांच के लिए अधिक इच्छुक होती है, इजरायल में राजनीतिक समीकरण बदलते हैं और अंतरराष्ट्रीय माहौल कम अनिश्चित होता है, तो सरकारों के लिए इस धारणा के आधार पर काम करना अधिक कठिन हो सकता है कि शक्तिशाली मित्र उनके कामों को संरक्षण देते रहेंगे।
इसके परिणाम भारत में भी महसूस किए जा सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि वाशिंगटन अचानक भारतीय लोकतंत्र का संरक्षक बन जाएगा या मोदी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कमजोर होने से भारतीय संस्थाओं की स्वतंत्रता अपने आप बहाल हो जाएगी।
ऐसा मानना अंतरराष्ट्रीय दबाव को घरेलू संवैधानिक पुनरुत्थान समझने की भूल होगी। भारत का लोकतंत्र किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी सफलता या विफलता पर निर्भर नहीं हो सकता। भारत की संस्थाओं को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के माध्यम से ही अपना अधिकार और प्रतिष्ठा फिर से हासिल करनी होगी।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां मायने रखती हैं।
कूटनीतिक वैधता, रणनीतिक सहयोग और शक्तिशाली संबंधों से मिलने वाला संरक्षण घरेलू राजनीतिक आचरण की बाहरी कीमत को कम कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय माहौल में कम होती सहनशीलता इस संरक्षण को कमजोर कर सकती है। इससे जवाबदेही के बिना निगरानी को सामान्य बनाना, संवैधानिक संस्थाओं को कार्यपालिका के औजार की तरह इस्तेमाल करना या सार्वजनिक हित और निजी पूंजी के बीच की सीमा को धुंधला करना अधिक कठिन हो सकता है।
इसलिए सबसे बुनियादी सवाल यह नहीं है कि मोदी किसी सिंडिकेट का हिस्सा हैं या नहीं, अथवा ट्रंप ने उस सिंडिकेट के मुखिया के रूप में अपना स्थान खो दिया है या नहीं।
सवाल यह है कि क्या आपसी संरक्षण और दंडमुक्ति पर आधारित राजनीतिक व्यवस्था तब भी कायम रह सकती है, जब उसके सबसे शक्तिशाली संरक्षक खुद जवाबदेही के दायरे में आने लगें?
कोई गणराज्य अनिश्चितकाल तक शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय मित्रों के नेटवर्क से अपनी दंडमुक्ति हासिल नहीं कर सकता और साथ ही अपनी संप्रभुता का दावा भी नहीं कर सकता।
इसी तरह, कोई गणराज्य उन संस्थाओं को बाधा मानकर उनकी अनदेखी करते हुए संवैधानिक वैधता का दावा नहीं कर सकता, जिनका काम कार्यपालिका की सत्ता पर अंकुश लगाना है।
अमेरिका के चुनाव ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दंडमुक्ति की राजनीति को भले ही समाप्त न किया हो, लेकिन उसने उसके सबसे शक्तिशाली केंद्र में अनिश्चितता जरूर पैदा कर दी है।
भारत के लिए यह अनिश्चितता एक अवसर बन सकती है। किसी एक संरक्षक की जगह दूसरे संरक्षक को लाने का अवसर नहीं, बल्कि इससे कहीं अधिक बुनियादी चीज को फिर से हासिल करने का अवसर- अपने संविधान का अधिकार और उसकी सर्वोच्चता।
अंतरराष्ट्रीय कानून की वापसी और देश के भीतर संवैधानिक जवाबदेही की बहाली अंततः एक ही संघर्ष के दो हिस्से हैं।
ऐसी दुनिया, जिसमें शक्तिशाली लोगों को भी नियमों के प्रति जवाबदेह होना पड़े, तभी संभव है जब देश अपने भीतर के शक्तिशाली लोगों को भी जवाबदेह ठहराने के लिए तैयार हों।
लोकतंत्र केवल सरकार चुनने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र इस बात पर जोर देना है कि कोई भी सरकार, चाहे वह कितनी ही लोकप्रिय क्यों न हो, बिना किसी संवैधानिक अंकुश के शासन करने की अधिकारी नहीं है।











