टकराव की चरम राजनीति: शरजील इमाम, 2014 और भारतीय उदारवाद का बिखराव

आज भारत के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल शायद यह नहीं है कि उदारवाद राष्ट्रवाद को हरा पाएगा या विपक्ष मौजूदा सत्ता को हटा पाएगा। असली सवाल यह है कि क्या भारत की राजनीतिक व्यवस्था ऐसे संघर्ष के बीच टिक पाएगी, जिसमें विरोधी की साख मिटाना उन साझा परिस्थितियों को बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए, जिनके सहारे राजनीतिक विरोधी एक साथ रह सकते हैं।

जेन-ज़ी के नए आंदोलन ने इस सवाल को और प्रासंगिक बना दिया है। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान आरोप लगे कि लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और चुनावी प्रक्रिया में राजनीतिक हेरफेर हो रहा है। चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल ने इन आरोपों को खारिज किया है। प्रदर्शनों के पैमाने और उन पर राज्य की सख्त प्रतिक्रिया ने चुनावी जवाबदेही को व्यापक लोकतांत्रिक वैधता का सवाल बना दिया है।

इसी पृष्ठभूमि में शरजील इमाम से जुड़ा विवाद राजनीतिक महत्व हासिल करता है।

यहां तर्क यह नहीं है कि इमाम के बयानों को माफ कर दिया जाए या उनके राजनीतिक विचारों की आलोचना न की जाए। सवाल यह है कि क्या इस विवाद का इस्तेमाल बयानों की पड़ताल से आगे बढ़कर किसी बड़े राजनीतिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। मसलन, सत्ता की जवाबदेही पर चर्चा करने के बजाय उसके विरोधियों की वैचारिक साख और देशभक्ति पर सवाल खड़े करना।

यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी विवाद का मूल मुद्दा वास्तविक हो सकता है, लेकिन राजनीति में उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया जा सकता है। बयान वास्तविक हो सकते हैं, फिर भी उन्हें लेकर दिखाई जाने वाली राजनीतिक तत्परता चुनिंदा हो सकती है।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इमाम ने क्या कहा। सवाल यह भी है कि उनके बयान वह कसौटी क्यों बन जाते हैं, जिस पर दूसरों के उदारवादी विचारों, देशभक्ति और राजनीतिक वैधता को परखा जाता है।

किसी सुनियोजित राजनीतिक साजिश का दावा करने के लिए सबूत जरूरी हैं। लेकिन विवाद की राजनीतिक भूमिका की पड़ताल उसके पीछे की पूरी योजना का पता चले बिना भी की जा सकती है।

  1. जब विरोधी राजनीतिक हथियार बन जाता है

टकराव की राजनीति में आम तौर पर मुकाबले को इस हद तक बढ़ाया जाता है कि सामने वाला पक्ष पहले पीछे हटने को मजबूर हो जाए। लेकिन टकराव को चरम तक ले जाने की राजनीति इससे आगे जाती है। इसमें साझा आधार को ही दांव पर लगा दिया जाता है। विरोधी को झुकाना उन नियमों और संस्थाओं को बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, जिनके सहारे दोनों पक्ष राजनीतिक मुकाबले में बने रह सकते हैं।

सत्तारूढ़ व्यवस्था की ओर से विपक्ष को दी जाने वाली चुनौती कुछ इस तरह है: आप हम पर संविधान को कमजोर करने का आरोप लगाते हैं। अब देखते हैं कि जब संविधान की रक्षा करना आपके लिए राजनीतिक रूप से महंगा साबित होगा, तब भी आप उसके पक्ष में खड़े रहेंगे या नहीं।

क्या आप उस व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करेंगे, जिसके राजनीतिक विचारों से आप सहमत नहीं हैं? क्या आप अल्पसंख्यक राजनीति के भीतर मौजूद उन विचारों को भी स्वीकार करेंगे, जो उदार लोकतंत्र के खिलाफ जाते हैं? क्या आप ऐसे व्यक्ति के साथ जुड़ने का जोखिम उठाएंगे, जिसके बयानों को राष्ट्र-विरोधी बताकर पेश किया जा सकता है? या फिर अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए राष्ट्रवाद की उस परिभाषा को स्वीकार कर लेंगे, जो राजनीतिक रूप से प्रभावी है?

यह चुनौती इसलिए असरदार है, क्योंकि इसके पीछे एक वास्तविक समस्या भी है। इमाम के राजनीतिक विचारों की उनके गुण-दोष के आधार पर जांच होनी चाहिए। संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने का मतलब यह नहीं हो सकता कि धार्मिक अनन्यतावाद, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के प्रति शत्रुता या व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामूहिक धार्मिक पहचान के अधीन रखने जैसे विचारों पर चुप्पी साध ली जाए।

लेकिन इन विचारों की आलोचना को अपने आप इस दलील में नहीं बदला जा सकता कि उन्हें संवैधानिक संरक्षण भी नहीं मिलना चाहिए।

मेरे विचार में, राजनीतिक चाल इसी अंतर को मिटाने में है। इमाम एक बड़े राजनीतिक संघर्ष में मोहरा बन जाते हैं, जिसमें सत्ता का विश्वसनीय विरोध करने से पहले विपक्ष को अपनी राष्ट्रवादी साख साबित करनी पड़ती है।

इस तरह विपक्ष दो मुश्किल स्थितियों के बीच फंस जाता है। अगर वह संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है, तो उस पर इमाम की विचारधारा का समर्थन करने का आरोप लग सकता है। अगर वह इस आरोप से बचने के लिए इमाम से दूरी बना लेता है, तो वह अनजाने में इस धारणा को स्वीकार कर सकता है कि संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को पहले राजनीतिक रूप से स्वीकार्य साबित होना होगा।

सत्ता को यह जरूरी नहीं कि विपक्ष इमाम का समर्थन करे। उसके लिए इतना ही पर्याप्त है कि विपक्ष ऐसे मुद्दे पर लड़ने लगे, जहां उसकी संवैधानिक प्रतिबद्धताएं ही उसके लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन जाएं।

  1. कैदी की दुविधा और साझा हितों का विनाश

इस समस्या का गहरा संबंध राजनीतिक समाज की प्रकृति से है।

सभ्य समाज इस बात की पहचान पर टिका होता है कि बुनियादी मुद्दों पर असहमत होने के बावजूद लोगों के कुछ हित साझा होते हैं। इसके लिए जरूरी नहीं कि वे एक ही धर्म को मानें, एक जैसी ऐतिहासिक स्मृतियां रखें, अच्छे जीवन की एक ही परिभाषा स्वीकार करें या राष्ट्र को एक ही नजरिए से देखें। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि कुछ साझा हित ऐसे हैं, जिन्हें कोई एक पक्ष दूसरे पर स्थायी वर्चस्व कायम करके सुरक्षित नहीं कर सकता।

इसे समझने के लिए ‘कैदी की दुविधा’ का उदाहरण उपयोगी है। जब दोनों पक्षों को डर हो कि दूसरा उनकी सहयोग की भावना का फायदा उठा लेगा, तो वे अपनी सुरक्षा के लिए ऐसे फैसले कर सकते हैं, जिनसे अंततः दोनों को नुकसान हो। राजनीतिक भरोसा घटता है, समझौता करना जोखिम भरा हो जाता है और सबके लिए बेहतर नतीजे तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

लेकिन जब टकराव को चरम तक ले जाने की रणनीति का इस्तेमाल जानबूझकर विरोधी के संयम का फायदा उठाने के लिए किया जाता है, तो समस्या और गंभीर हो जाती है। सहयोग केवल कठिन नहीं रह जाता, बल्कि कमजोरी का कारण बन सकता है। नियमों का पालन करने वाला पक्ष इसलिए नुकसान में पड़ सकता है, क्योंकि दूसरा पक्ष खुद को उन्हीं नियमों से बंधा हुआ नहीं मानता।

टकराव की चरम राजनीति इसी तर्क पर काम करती है। संवैधानिक मर्यादा को कमजोरी बताया जाता है। समझौते को आत्मसमर्पण कहा जाता है। साझा संस्थाओं को बचाने की इच्छा को विरोधी से और रियायतें हासिल करने का मौका समझा जाता है।

इसके तात्कालिक राजनीतिक फायदे हो सकते हैं। सरकार विपक्ष को बांट सकती है, अपने समर्थकों को एकजुट कर सकती है और संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े असुविधाजनक सवालों को राष्ट्रीय पहचान के अधिक भावनात्मक विवाद से पीछे धकेल सकती है।

लेकिन इसकी दीर्घकालिक कीमत कहीं ज्यादा हो सकती है। विपक्ष का निष्पक्ष राजनीतिक मुकाबले पर भरोसा घटता है। नागरिक संस्थाओं को निष्पक्ष व्यवस्था के बजाय किसी राजनीतिक गुट के औजार के रूप में देखने लगते हैं। राजनीतिक दल और उनके समर्थक चुनावी हार स्वीकार करने तथा विरोधियों को वैध राजनीतिक पक्ष मानने के प्रति कम इच्छुक होते जाते हैं।

सत्ता तात्कालिक मुकाबला जीत सकती है, लेकिन ऐसा करते हुए वह उस साझा राजनीतिक व्यवस्था को कमजोर कर सकती है, जिस पर उसकी अपनी भविष्य की वैधता भी निर्भर करती है।

इसीलिए इस समस्या को केवल ध्रुवीकरण कहकर नहीं समझा जा सकता। ध्रुवीकरण राजनीति की एक स्थिति है। टकराव की चरम राजनीति में साझा आधार को कमजोर करना ही राजनीतिक लाभ हासिल करने का तरीका बन जाता है।

जब विरोधी के संयम का जानबूझकर फायदा उठाया जाता है, तो केवल साझा हितों की अपील पर्याप्त नहीं होती। इसके जवाब में प्रतिरोध करने, राजनीतिक कीमत वसूलने और संस्थागत सीमाओं की रक्षा करने की क्षमता भी जरूरी है। अन्यथा लगातार बिना शर्त सहयोग करने वाला पक्ष उसी व्यवस्था को नष्ट करने में मदद कर सकता है, जिसे वह बचाना चाहता है।

चुनौती यह है कि प्रतिरोध करते हुए उसी राजनीति की नकल न की जाए, जिसका विरोध किया जा रहा है। उदारवाद को अपनी रक्षा करने में सक्षम होना चाहिए, लेकिन उन सिद्धांतों को छोड़े बिना, जो उसे अपने विरोधियों की राजनीति से अलग करते हैं।

  1. विपक्ष अपने अतीत से नहीं बच सकता

फिर भी विपक्ष के सामने कोई आसान रास्ता नहीं है। यहीं से इस तर्क को विपक्ष के अपने इतिहास की ओर मुड़ना होगा।

मौजूदा संकट को केवल सत्तारूढ़ व्यवस्था के आचरण से नहीं समझा जा सकता। विपक्ष को 2014 से पहले की राजनीतिक व्यवस्था की विफलताओं, चुप्पियों और अनसुलझे अंतर्विरोधों की विरासत भी मिली है।

उसकी मुश्किल सिर्फ यह नहीं है कि उसे प्रतिकूल परिस्थितियों में उदारवाद की रक्षा करनी पड़ रही है। मुश्किल यह भी है कि उसे उन सवालों का सामना करते हुए उदारवाद की रक्षा करनी है, जिन्हें वह अक्सर टालता रहा।

अतीत में किए गए फैसलों और उनसे पैदा हुई समस्याओं का हिसाब अब सामने आ रहा है।

भारत की संवैधानिक व्यवस्था राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक असमानता, धार्मिक विविधता और राष्ट्रीय पहचान के परस्पर विरोधी दावों के साथ जोड़ने का एक असाधारण प्रयास थी। इसने समान नागरिकता का ढांचा तैयार किया, लेकिन समुदाय, व्यक्ति और राज्य के बीच हर टकराव का समाधान नहीं किया। इसने संवैधानिक संरक्षण दिए, लेकिन उन सामाजिक ताकतों को खत्म नहीं किया, जिनके कारण इन अधिकारों का इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता था।

नेहरू की राजनीतिक परियोजना ने साझा राष्ट्रीय पहचान के जरिए भारत को एकजुट रखने की कोशिश की। उसने इस विचार को खारिज किया कि राष्ट्र की पहचान केवल धर्म के आधार पर तय होनी चाहिए। लेकिन इस सोच में कभी-कभी यह मान लिया गया कि भारतीय पहचान का सही रूप पहले ही तय हो चुका है। नागरिकों से अपेक्षा की गई कि वे राजनीतिक नेताओं और बौद्धिक अभिजनों द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के मेल में अपनी पहचान तलाशें।

समस्या यह नहीं थी कि साझा राष्ट्रीय पहचान का विचार मूल रूप से गलत था। समस्या यह थी कि कभी-कभी इसे भारतीय पहचान का पहले से तय जवाब मान लिया गया। इससे उन लोगों के लिए पर्याप्त जगह नहीं बची, जो इस विचार या उसकी शर्तों को स्वीकार नहीं करते थे।

इसी तरह, संवैधानिक व्यवस्था जातिगत ऊंच-नीच और राजनीतिक समानता के बीच के विरोधाभासों को भी पूरी तरह दूर नहीं कर सकी। व्यक्ति के अधिकारों और धार्मिक समुदायों द्वारा अपने सदस्यों पर जताए जाने वाले अधिकार के बीच का तनाव भी बना रहा।

आज अगर उदारवाद केवल यह कहकर जवाब देता है कि संविधान एक स्थापित उपलब्धि है, तो यह पर्याप्त नहीं होगा। उसे स्वीकार करना होगा कि संविधान ने जिन आदर्शों का वादा किया था, वे हमेशा उन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से आगे रहे हैं, जिनमें उन्हें लागू किया गया।

विपक्ष को यह भी समझना होगा कि बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद को केवल किसी आदर्शीकृत अतीत की ओर लौटकर नहीं हराया जा सकता। अतीत में लोकतांत्रिक बदलाव के लिए उपयोगी विचार और अनुभव मौजूद हैं, लेकिन उसमें समझौते, बहिष्कार और ऐसे सवाल भी हैं, जिनका जवाब अब तक नहीं मिला।

आज की चुनौती उन संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करना है, जो अब भी अनिवार्य हैं। इसके साथ ही उस राजनीतिक परियोजना की सीमाओं को भी स्वीकार करना होगा, जिसके जरिए इन सिद्धांतों को इतिहास में लागू करने की कोशिश की गई थी।

  1. 2014: एक निर्णायक मोड़

2014 का महत्व केवल भाजपा की चुनावी जीत तक सीमित नहीं है। यह भारत की पहचान को लेकर चल रहे राजनीतिक संघर्ष में एक निर्णायक मोड़ था।

आजादी के बाद बनी राजनीतिक व्यवस्था ने राष्ट्र की अलग-अलग अवधारणाओं के बीच के संघर्ष को कभी पूरी तरह समाप्त नहीं किया। धार्मिक राष्ट्रवाद, जाति पर आधारित राजनीतिक दावे, क्षेत्रीय पहचान और इतिहास की अलग-अलग स्मृतियां धर्मनिरपेक्षता तथा साझा नागरिकता की आधिकारिक भाषा के नीचे मौजूद रहीं।

लेकिन उस समय के प्रभावी संवैधानिक ढांचे ने कोशिश की कि इनमें से कोई एक विचार राष्ट्रीय पहचान का एकमात्र आधार न बन जाए।

2014 के बाद राजनीतिक वैधता का संतुलन निर्णायक रूप से बदल गया। राष्ट्रीय पहचान की बहुसंख्यकवादी व्याख्या को धीरे-धीरे यह तय करने का अधिक अधिकार मिलने लगा कि कौन-से राजनीतिक दावे वैध हैं और किन पर संदेह किया जाना चाहिए।

इतिहास को लेकर असहमति को राष्ट्र के प्रति शत्रुता के रूप में पेश किया जा सकता था। सरकार की आलोचना को देश के प्रति बेवफाई का प्रमाण बताया जा सकता था। अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वालों से उनकी देशभक्ति साबित करने की मांग की जा सकती थी।

यह बदलाव अचानक पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे ऐतिहासिक स्मृतियां, सामाजिक टकराव और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की वे विफलताएं भी थीं, जिन्हें पिछली सरकारें दूर नहीं कर सकी थीं। लेकिन 2014 ने उस शक्ति-संतुलन को बदल दिया, जिसके भीतर ये संघर्ष सामने आते थे।

इस नजरिए से देखें तो इमाम से जुड़ा मौजूदा विवाद केवल धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक पहचान पर लंबे समय से चल रही बहस का एक और प्रसंग नहीं है। यह उस विपक्ष की मुश्किल को भी सामने लाता है, जिसके संवैधानिक सिद्धांतों को अब राष्ट्रवाद की ऐसी व्याख्या के सामने परखा जा रहा है, जिसे पहले से अधिक राजनीतिक ताकत हासिल है।

विपक्ष के सामने ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें उसे राष्ट्रवादियों का विरोध करने से पहले यह साबित करना पड़ता है कि वह खुद पर्याप्त राष्ट्रवादी है। जितना अधिक वह इस कसौटी को स्वीकार करता है, उतना ही वह अपने विरोधियों की तय की हुई शर्तों पर मुकाबला करने लगता है।

लेकिन इस कसौटी को खारिज करने के लिए केवल संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराना पर्याप्त नहीं है। विपक्ष को समझाना होगा कि संविधान उन लोगों के अधिकारों की रक्षा क्यों करता है, जिनके विचारों को वह खारिज करता है। उसे यह भी बताना होगा कि राज्य किसी एक धार्मिक पहचान का औजार क्यों नहीं बन सकता और राजनीतिक असहमति की वैधता बहुसंख्यकों की मंजूरी पर क्यों निर्भर नहीं होनी चाहिए।

इसके साथ ही उसे अल्पसंख्यक राजनीति के भीतर मौजूद उन विचारों का भी सामना करना होगा, जो उदारवादी मूल्यों के खिलाफ हैं। लेकिन ऐसा करते हुए इन विचारों को बहुसंख्यकवादी वर्चस्व का औचित्य नहीं बनने देना होगा।

इसलिए विपक्ष की मुश्किल बाहर से थोपी गई भी है और उसके अपने अतीत से पैदा हुई भी। सत्ता इन अनसुलझे विरोधाभासों का फायदा उठा सकती है, लेकिन इन सभी विरोधाभासों को उसी ने पैदा नहीं किया है।

  1. विभाजन और वे सवाल, जो अब भी बने हुए हैं

भारतीय राष्ट्रवाद के अनसुलझे सवालों को समझने के लिए देश के विभाजन के इतिहास पर दोबारा नजर डालना जरूरी है।

मुहम्मद अली जिन्ना के 1929 के चौदह सूत्र, द्विराष्ट्र सिद्धांत, 1946 की कैबिनेट मिशन योजना और बी.आर. आंबेडकर की संवैधानिक चिंताएं उस इतिहास का हिस्सा हैं, जिसमें बहुमत के शासन और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के बीच संतुलन का सवाल कभी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया।

इस इतिहास को सावधानी से समझने की जरूरत है। जिन्ना की संवैधानिक सुरक्षा की मांगों और बाद में पाकिस्तान की स्थापना के उनके प्रयासों को एक ही, अपरिवर्तित राजनीतिक मंशा के रूप में नहीं देखा जा सकता। कैबिनेट मिशन योजना ने कमजोर केंद्र और प्रांतीय समूहों के जरिए भारत की एकता बनाए रखने का प्रयास किया था। इसकी विफलता के पीछे सत्ता, प्रतिनिधित्व और भविष्य के राज्य की संरचना को लेकर कई जटिल मतभेद थे।

आंबेडकर की चिंताएं भी जिन्ना की मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व संबंधी मांगों से अलग थीं। 1932 के पूना समझौते में गांधी के अनशन के बाद दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचन मंडल की प्रस्तावित व्यवस्था की जगह संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई। बाद में आंबेडकर की आलोचनाओं से स्पष्ट हुआ कि इस समझौते के बाद भी स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर उनकी चिंताएं समाप्त नहीं हुई थीं।

इसके बावजूद इन चिंताओं में एक समान सवाल दिखाई देता है: जब किसी समूह को डर हो कि उसका राजनीतिक भविष्य एक अधिक शक्तिशाली बहुसंख्यक की सद्भावना पर निर्भर करेगा, तो उसके पास क्या विकल्प बचते हैं?

जिन्ना और आंबेडकर ने इस सवाल के अलग-अलग जवाब तलाशे। उनकी चिंताओं को एक जैसा नहीं माना जा सकता और न ही उन्हें इस बात का प्रमाण बनाया जा सकता है कि भारत का विभाजन अपरिहार्य था।

फिर भी उनका सवाल आज भी संवैधानिक लोकतंत्र के केंद्र में है। जो समूह अपने ऊपर वर्चस्व कायम होने से डरते हैं, वे समान नागरिक के रूप में राजनीतिक व्यवस्था में किस तरह भाग ले सकते हैं, जबकि उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए शक्तिशाली बहुसंख्यक की कृपा पर निर्भर न रहना पड़े?

संवैधानिक लोकतंत्र का जवाब लागू किए जा सकने वाले अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संस्थागत सुरक्षा और सत्ता के इस्तेमाल को चुनौती देने की निरंतर संभावना में निहित होना चाहिए। यह मानकर नहीं चला जा सकता कि बहुसंख्यक हमेशा उदार या सहिष्णु ही होगा।

इतिहास भी इस सवाल का जवाब किसी एक निर्णायक राष्ट्रीय कथा के जरिए नहीं दे सकता।

इतिहास झूठ को उजागर कर सकता है, मिथकों को चुनौती दे सकता है और राजनीतिक फैसलों के नतीजों को सामने ला सकता है। लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही किसी व्यक्ति की मान्यताएं बदल जाएं, यह जरूरी नहीं है। लोग अपने सामूहिक अनुभवों, पीढ़ियों से चली आ रही चोटों और अपनी पहचान से जुड़ी कहानियों के जरिए इतिहास को समझते हैं। ये स्मृतियां अधूरी या कल्पित हो सकती हैं, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव बना रहता है।

लोगों के सामने केवल ऐतिहासिक तथ्य रख देने से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उनकी मान्यताएं खत्म हो जाएंगी।

चुनौती यह नहीं है कि सभी लोगों को इतिहास की एक ही व्याख्या स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जाए। चुनौती यह है कि इतिहास की अलग-अलग स्मृतियों को असमान नागरिकता का आधार न बनने दिया जाए।

  1. नेहरूवादी सोच की सीमाएं

यहां उदारवादियों को एक मुश्किल सवाल का ईमानदारी से सामना करना होगा।

नेहरू भारत को विभिन्न ऐतिहासिक विरासतों से बनी ऐसी सभ्यता के रूप में देखते थे, जिसका विकास अलग-अलग संस्कृतियों के संपर्क और मेल से हुआ था, न कि किसी एक धार्मिक पहचान से। यह दृष्टि बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद का एक मजबूत विकल्प थी। इसके अनुसार भारत एक राजनीतिक और ऐतिहासिक समुदाय था, जिसकी एकता को सांस्कृतिक समानता तक सीमित नहीं किया जा सकता था।

लेकिन यह दृष्टि भी कभी-कभी लोगों से यह अपेक्षा करने लगी कि वे अपनी पहचान को अलग-अलग संस्कृतियों के मेल के रूप में ही देखें। इस तरह साझा पहचान बनाने का विचार भी अपने आप में एक तयशुदा पहचान थोपने की कोशिश बन सकता था। जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति अपनी पहचान को मिली-जुली माने। कुछ लोग उस तरीके को स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं, जिसके जरिए राजनीतिक अभिजन राष्ट्र की पहचान तय करते हैं।

इसलिए संवैधानिक बहुलतावाद का अर्थ केवल यह नहीं हो सकता कि बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद की जगह साझा पहचान की एक दूसरी, तयशुदा परिभाषा रख दी जाए।

संविधान को लोगों को अपनी पहचान तय करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। वे अपनी पहचान को एकल, कई पहचानों का मेल, बदलती हुई या परस्पर विरोधी मान सकते हैं। किसी एक पहचान को नागरिकता की शर्त नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही लोगों को अपनी विरासत में मिली पहचानों और अपने समुदाय के धार्मिक तथा सांस्कृतिक नेतृत्व को चुनौती देने का अधिकार भी मिलना चाहिए।

संविधान को भारत के अर्थ पर सहमति की शर्त नहीं रखनी चाहिए। उसे ऐसी परिस्थितियों की गारंटी देनी चाहिए, जिनमें भारत को लेकर असहमति के बावजूद सभी नागरिक समान अधिकारों के साथ रह सकें।

यह संवैधानिक व्यवस्था की ऐसी समझ है, जो बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद और नेहरूवादी सहमति के आदर्शीकृत रूप, दोनों से आगे जाती है। इसमें नागरिकों से एक साझा राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन अपने अतीत की एक ही व्याख्या मानने की नहीं।

इसके लिए उदारवादियों को अपने राजनीतिक झुकाव के खिलाफ जाने की स्थिति में भी अधिकारों की रक्षा करनी होगी।

  1. वह सवाल, जो बना रहेगा

शरजील इमाम से जुड़ा विवाद समय के साथ कमजोर पड़ सकता है। आज के राजनीतिक किरदारों की जगह नए लोग आ सकते हैं। पुराने विवादों की जगह नए मुद्दे ले सकते हैं। लेकिन मूल सवाल बना रहेगा: क्या भारत राष्ट्रीय पहचान की किसी तयशुदा व्याख्या को नागरिकता की कीमत बनाए बिना एक साझा राजनीतिक जीवन कायम रख सकता है?

अगर इस विवाद का इस्तेमाल विपक्ष को उदारवाद और स्थापित राष्ट्रवाद के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से किया जा रहा है, तो विपक्ष के सामने चुप्पी साधने, चुनिंदा निंदा करने या अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए लगातार सफाई देने का प्रलोभन होगा। इन तरीकों से उसे कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन मूल दुविधा का समाधान नहीं होगा।

विपक्ष को इमाम के विचारों की आलोचना करने में सक्षम होना चाहिए, लेकिन ऐसा करते हुए उनके संवैधानिक अधिकारों को छोड़ना नहीं चाहिए। उसे बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद का विरोध करना चाहिए, लेकिन अल्पसंख्यकों की हर राजनीतिक मांग को उदारवादी मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। उसे संविधान की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन यह दिखावा भी नहीं करना चाहिए कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का इतिहास विरोधाभासों से मुक्त रहा है।

सबसे बढ़कर, उसे इस विचार को फिर से स्थापित करना होगा कि साझा राजनीतिक व्यवस्था को बचाना सभी का साझा हित है, न कि एक राजनीतिक पक्ष की ओर से दूसरे पर की गई कोई रियायत।

टकराव की चरम राजनीति का खतरा यहीं सबसे गंभीर हो जाता है। जब राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक मर्यादा का पालन करना महंगा बनाया जाता है, विरोधी के संयम का फायदा उठाया जाता है और राष्ट्रीय पहचान को वैचारिक निष्ठा की कसौटी बना दिया जाता है, तो नुकसान केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहता। इससे राजनीतिक सह-अस्तित्व की बुनियाद कमजोर होती है।

राष्ट्र की उम्र किसी एक सरकार या उसे विरासत में पाने वाली राजनीतिक पीढ़ी से कहीं लंबी होती है। लोग कठिन सवालों से थक सकते हैं। राजनीतिक दल उनका सामना टाल सकते हैं। बुद्धिजीवी भी भरोसा दिलाने वाली कहानियों में शरण ले सकते हैं। लेकिन किसी सवाल से बचना उसका जवाब देना नहीं है। वह सवाल फिर लौटता है, अक्सर पहले से अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में और कहीं ज्यादा विनाशकारी रूप में।

इसलिए भारतीय उदारवाद का संकट केवल यह नहीं है कि सत्ता संविधान पर हमला कर रही है। संकट यह भी है कि संविधान की रक्षा के लिए अब भारत की राष्ट्रीय परियोजना से जुड़े उन सवालों का सामना करना जरूरी हो गया है, जिन्हें लंबे समय से अनसुलझा छोड़ दिया गया है।

विपक्ष इस जवाबदेही से बच नहीं सकता। वह राष्ट्रवादियों से ज्यादा राष्ट्रवादी साबित होकर भी इस चुनौती का सामना नहीं कर सकता। उसे बताना होगा कि भारत ऐसा राजनीतिक समुदाय क्यों बना रहना चाहिए, जिसमें किसी एक धार्मिक, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक पहचान को वैधता पर एकाधिकार हासिल न हो।

इमाम से जुड़ा विवाद इसी मूल सवाल से ध्यान हटाता है। असली चुनाव इमाम और भारत के बीच या अल्पसंख्यक अधिकारों और राष्ट्रीय निष्ठा के बीच नहीं है। असली सवाल दो तरह की राजनीति के बीच है। एक वह, जिसमें विरोधी को हराना साझा संस्थाओं को बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। दूसरी वह संवैधानिक राजनीति, जो राजनीतिक असहमति को संभव बनाए रखने में सभी का साझा हित पहचानती है।

अतीत की अनसुलझी समस्याएं अब राजनीतिक हथियार बनकर लौट आई हैं। संवैधानिक व्यवस्था जिन सवालों का समाधान नहीं कर सकी और बाद की राजनीतिक पीढ़ियां जिनका सामना टालती रहीं, वे आज फिर सामने हैं।

2014 निर्णायक मोड़ इसलिए था, क्योंकि उसने इन सवालों को उठाने और उनका जवाब देने की राजनीतिक शर्तें बदल दीं। अब आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि उदारवाद अपने पुराने मौन और चूकों का सामना करते हुए अपने सिद्धांतों को बचा पाता है या नहीं। यह भी इस पर निर्भर करेगा कि विपक्ष टकराव की चरम राजनीति का विरोध करते हुए खुद उसी राजनीति को दोहराने से बच पाता है या नहीं।

कोई सभ्यता इसलिए नहीं बचती कि उसके लोग आखिरकार अपने इतिहास की एक ही व्याख्या पर सहमत हो जाते हैं। वह इसलिए बचती है, क्योंकि इतिहास के अर्थ पर असहमत होने के बावजूद वे एक-दूसरे को साझा जीवन का बराबर का भागीदार मानते रहते हैं।

जब यह स्वीकार्यता खत्म हो जाती है, तब राजनीतिक जीत तो संभव रहती है, लेकिन राजनीतिक समुदाय का भविष्य अनिश्चित हो जाता है।

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