ब्रिक्स के अहम सदस्य और लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश ब्राज़ील (Brazil)में वर्कर्स पार्टी के 80 वर्षीय नेता लुइज़ इनासियो लूला द सिल्वा की जीत की ख़बर ऐसे समय आयी है जब यूरोप के तमाम देश छात्रों और युवाओं के आक्रोश से तप रहे हैं। इन्हीं युवाओं की पहल ने सर्बिया जैसे देश में दक्षिणपंथी राष्ट्रपति को मध्यावधि चुनाव में पराजित कर दिया है और इधर भारत में वोट-चोरी के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन की केंद्रीय शक्ति भी वही नौजवान हैं जिन्होंने भीषण बेरोज़गारी और भविष्य की निराशा के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरने का फ़ैसला किया है।
तीन महाद्वीपों में पसरी इन अलग-अलग घटनाओं के मूल में पूँजीवाद के संकट से पैदा हुई छटपटाहट है। संसाधनों के निर्बाध दोहन के लिए कॉरपोरेट जगत ने सरकारों को अपना ग़ुलाम बना लिया है और याराना पूँजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज़्म) को ‘सिस्टम’ में बदल दिया है जिसने लोकतांत्रिक संस्थाओं और विचारों के लिए काम करना मुश्किल कर दिया है। इसी के तहत कॉरपोरेट जगत ने मीडिया पर पूरी तरह नियंत्रण करके जनता के मानस को ग़ैरज़रूरी और पारलौकिक मुद्दों में उलझा दिया है। ज़ाहिर है, इसके ख़िलाफ़ लड़ने वालों के लिए ‘रावण रथी, विरथ रघुबीरा’ वाली स्थिति बन गयी है।
ब्राज़ील में भी कमोबेश यही स्थिति है जहाँ लड़ाई बेहद कड़ी हो गयी है। फिर भी वामपंथी नेता लूला का लगातार दूसरी और कुल चौथी बार राष्ट्रपति बनना बताता है कि राज्य के कल्याणकारी स्वरूप का स्वाद चख चुके लोगों को क्रोनी कैपिटलिज्म के साथ जुड़े जोख़िम का अहसास हो रहा है। लूला की जीत में उन लोगों का सबसे बड़ा योगदान है जिन्हें वह ज़माना याद आ रहा था ‘जब पेट भरता था, स्कूल खुलते थे और जंगल काटने वाले थोड़ा डरे रहते थे।’
यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा कि भारत में तमाम लोकतांत्रिक स्वरों और संस्थाओं को बंधक बनाकर अस्सी करोड़ लोगों को ‘पाँच किलो राशन देने’ पर इतराने वाली मोदी सरकार के विज्ञापनों को देखकर लोगों को याद आ रहा है कि एक ज़माने में स्कूली शिक्षा बेहद सस्ती या मुफ़्त थी, अस्पतालों में इलाज होता था, नौकरियों की गुंजाइश काफ़ी थी और किस्तों में सही, मकान और वाहन ख़रीदे जा सकते थे। यही नहीं, यूपीए के दौर में जिन मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत में विशाल मध्यवर्ग बना था, उन्हें जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक कभी न सिद्ध होने वाले आरोपों के लिए गालियाँ दी जा सकती थीं और निर्भया कांड को लेकर राष्ट्रपति भवन को घेरा जा सकता था।
ब्राज़ील में मज़दूर नेता से राष्ट्रपति पद तक सफ़र करने वाले लूला दरअसल पूँजीवादी आक्रमण के सामने समाजवादी सपने की जद्दोजहद का नाम हैं। उन्होंने अमेरिका का पिछलग्गू बनने से इंकार किया और अपनी कल्याणकारी योजनाओं से जनता के दिल में जगह बनायी। लूला के पहले दो कार्यकालों (2003-2010) और 2023 से चल रहे कार्यकाल में सबसे बड़ी नीति रही बोल्सा फ़ामिलिया (Bolsa Família)। यह गरीब परिवारों को नकद सहायता देने वाला कार्यक्रम है, जिसमें शर्तें भी हैं — बच्चों का स्कूल जाना और टीकाकरण।
इन नीतियों के कारण ब्राजील में ‘अत्यधिक गरीबी’ में बड़ी कमी आई। कई रिपोर्टों में कहा गया कि लाखों लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे और देश भूख के नक्शे से बाहर निकला। न्यूनतम मजदूरी में वास्तविक वृद्धि हुई और आवास योजनाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुंच बढ़ाने वाली नीतियाँ ज़मीन पर उतरीं। अपने पिछवाड़े पसरे इस समाजवादी सपने ने अमेरिका को हमेशा परेशान किया है। ख़ासतौर पर लूला की स्वतंत्र विदेशनीति अमेरिका को कभी रास नहीं आयी जिसने चीन को सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार बना दिया है। ऐसे में अमेरिका ने जेयर बोल्सोनारो जैसे दक्षिणपंथी नेता को खुलकर समर्थन दिया। बोल्सोनारो को ब्राज़ील का ट्रम्प कहा जाता है।
2010 में लूला ने चुनाव नहीं लड़ा था। 2018 में मिशेल टेमेर के शासन के दौरान लूला पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर 580 दिन तक जेल में रखा गया। 1 जनवरी 2019 को बोल्सोनारो चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बन गये थे। लेकिन जेल से निकलकर लूला ने शानदार वापसी की और 2022 में बोल्सोनारो को तानाशाह और अमेरिकी पिट्ठू बताते हुए चुनाव जीता और तीसरी बार ब्राज़ील के राष्ट्रपति बने। बोल्सोनारो ने तब तख्तापलट की साज़िश रची थी, लेकिन गिरफ्तार हुए और अब जेल में हैं।
2026 के चुनाव में लूला पूर्व राष्ट्रपति बोल्सोनारो के बेटे और लिबरल पार्टी के नेता फ्लावियो बोल्सोनारो को कड़े मुक़ाबले में पराजित करने में कामयाब हुए। लूला को 51.76 फीसदी वोट मिले जबकि फ्लावियो बोल्सोनारो को 48.24 फीसदी वोट मिले। वोटों का मामूली अंतर बताता है कि लूला विरोधी और अमेरिकापरस्त शक्तियाँ ब्राज़ील ‘पुनर्विजय’ के लिए सारे घोड़े खोले हुए है। देश दो हिस्सों में बंटा हुआ है। दक्षिण और अमीर इलाके बोल्सनारो को, जबकि पूर्वोत्तर और गरीब लूला को वोट देते हैं।
लूला और उनकी वर्कर्स पार्टी को “पिंक टाइड” कहा जाता है। यह शुद्ध समाजवाद नहीं है जहाँ उत्पादन के साधनों पर सरकार का क़ब्ज़ा होता है। यह सामाजिक लोकतंत्र जैसा है यानी बाजार को खुला रखते हुए गरीबों के लिए नकद योजनाएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की नीति अपनायी जाती है। लूला खुद कहते हैं कि वे पूंजीवाद के खिलाफ नहीं, बल्कि पूंजीवाद को गरीबों के लिए काम करने वाला बनाना चाहते हैं। यह भारत में कांग्रेस पार्टी के आर्थिक कार्यक्रमों की तरह लगता है जिसने मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता अपनाया और उदारीकरण के दौर में भी ग़रीबों के लिए रोज़गार और शिक्षा से लेकर भोजन तक की सुरक्षा के लिए क़ानूनी गारंटी दी।
लूला की जीत के आईने में यूरोप में नज़र आ रही युवा विद्रोह की लहर को भी परखा जाना चाहिए। फ्रांस में स्कूल की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और शिक्षा बजट को लेकर बड़े प्रदर्शन हुए, कुछ जगह हिंसा भी। स्पेन और पुर्तगाल में किराए और मकानों की आसमान छूती कीमतें, आवास संकट मुद्दा बनी हुई हैं। इटली में जीवनयापन की लागत, कम वेतन और शिक्षा की हालत को लेकर आक्रोश है। बेल्जियम और ग्रीस में शिक्षा में कटौती और स्कूलों की ख़राब स्थिति तो अल्बानिया में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है। जर्मनी, ऑस्ट्रिया, आयरलैंड आदि में छोटे-बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि जनता कोई नयी माँग लेकर उठ खड़ी हुई है। यह आक्रोश उन सुविधाओं के ख़त्म या कमज़ोर होने के ख़िलाफ़ है जिनके बारे में राज्य ने गारंटी दी थी। लोग कह रहे हैं कि “हमें बेहतर जिंदगी का वादा किया गया था, अब तो स्कूल और घर भी महंगे हो गए।”
वैसे इस बार भारत के युवा बाज़ी मार ले गये हैं जिन्होंने जुलाई में ही डंका बजा दिया था। सोशल मीडिया पर खड़ा किया गया ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ का मंच जिस तरह लोकप्रिय हुआ उससे सरकार घबरा गयी थी। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के पहल से जारी छात्रों की गूँज कार्यक्रम को भी इसने नये सिरे से चमक दी और अब वोटचोरी के मुद्दे ने इंडिया गठबंधन और कॉक्रोचों को एक ही मोर्चे पर खड़ा कर दिया है। ज़ाहिर है, भारत में लड़ाई लोकतंत्र को बचाने की है लेकिन इसके मूल में भी वही याराना पूँजीवाद है जिसने सरकार से संसाधनों की खुली लूट का लाइसेंस हासिल कर लिया है और रोज़गार विहीन अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है। ऐसे में लूला की जीत उन सबको आशा बँधाती है जो इस लूट को रोकना चाहते हैं। जनता के भविष्य को अंधेरे में धकेलकर कोई भी व्यवस्था चमकदार नहीं बनी रह सकती। यूरोप से लेकर भारत और लैटिन अमेरिका तक का सच यही है।









