बृहनमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) सहित महाराष्ट्र के कुल 29 में से 25 बड़े नगर निगमों और नगर पालिकाओं में राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना (शिंदे) की महायुति को मिली जीत ने जहां गठबंधन में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस का कद और ऊंचा किया है, वहीं ये नतीजे ऐन चुनाव से पहले एक साथ आए चचेरे भाइयों उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के साथ ही विपक्ष के लिए बड़ा सबक हैं।
इन चुनावों में सबकी नजर करीब 75 हजार करोड़ रुपये के सालाना बजट वाली देश के सबसे अमीर शहरी निकाय बीएमसी पर टिकी थी, जहां तीन दशक बाद शिवसेना बेदखल हो गई है। बेशक, भाजपा के साथ शिवसेना (शिंदे) भी गठजोड़ में है, और भाजपा से एक तिहाई कम सीटें पाने के बावजूद खबर है कि मेयर पद पर दावा कर रहे हैं। इसके बावजूद ये नतीजे बाला साहेब ठाकरे द्वारा स्थापित की गई अविभाजित शिवसेना के लिए बड़ा झटका हैं, जिसके एक गुट की कमान उनके बेटे उद्धव के पास है।
दरअसल मुंबई पर दशकों तक शिवसेना का दबदबा बना ही बीएमसी के कारण था, जहां उसकी सत्ता चलती थी। हालांकि यह भी सच है कि 2017 में हुए पिछले चुनाव में भाजपा ने उसे कड़ी टक्कर दी थी। वास्तव में ये चुनाव तो 2022 में हो जाने थे, लेकिन पहले कोविड के असर और फिर अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को लेकर दी गई कानूनी चुनौती के कारण चुनाव तीन साल तक टल गए।
करीब तीन सालों से देश की आर्थिक राजधानी की व्यवस्था गैरनिर्वाचित प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में थी। इस लिहाज से स्लम, सीवेज और बारिश की बदहाली और बेतरतीब विकास से मुश्किलों का सामना कर रहे मुंबईकर के लिए ये चुनाव राहत की बात हैं।
भाजपा-शिवसेना (शिंदे) की महायुति ने बीएमसी के अलावा पुणे, ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, मीरा-भायंदर, पिंपरी-चिंचवाड़, नवी मुंबई, उल्हासनगर और नागपुर जैसे बड़े नगर निगम पर कब्जा किया है।
जाहिर है, महाराष्ट्र के इन नतीजों को व्यापक फलक पर देखा जाए तो ये नतीजे विपक्ष के लिए बड़ा झटका हैं।
बात सिर्फ ठाकरे बंधुओं को मिली हार की नहीं है। उद्धव की शिवसेना ने बीएमसी की 227 में से 65 सीटें जीती हैं और वह भाजपा के बाद दूसरे नंबर पर है, लेकिन राज ठाकरे की मनसे सिर्फ नौ सीटें ही जीत सकी है। इन चुनावों में कांग्रेस और एनसीपी (शरद पवार) दोनों ने अलग अलग चुनाव लड़े थे और उन दोनों का प्रदर्शन तो खराब है ही, यदि महाअघाड़ी के इन तीन दलों की सीटों को मिला भी दिया जाए तो वह महायुति को मिली सीटों से कम है।
यानी अलग-अलग लड़कर महाअघाड़ी के घटक और बुरी स्थिति में पहुंच गए। सबसे बुरा हाल महाराष्ट्र के तीन बार मुख्यमंत्री रहे शरद पवार की एनसीपी का हुआ है, जिसे बीएमसी की सिर्फ एक सीट मिली है। दिलचस्प यह है कि इस चुनाव ने शरद पवार के भजीते और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की एनसीपी को भी जमीन दिखा दी है।
बीएमसी और महाराष्ट्र के प्रमुख नगर निगमों के इन चुनावों को समग्रहता में देखें तो ये विपक्षी इंडिया गठबंधन के लिए सबक के तरह होने चाहिए। बावजूद इसके कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नतीजे आने से पहले ही इन चुनावों में अमिट स्याही के स्थान पर मार्कर के इस्तेमाल किए जाने का मुद्दा उठाते हुए ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया है।
राहुल गांधी और महाअघाड़ी के नेता नवंबर, 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद से वोट चोरी का मुद्दा उठा रहे हैं। यह भी सच है कि राहुल गांधी ने लगातार महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में मतदाता सूची में गड़बड़ी के जो गंभीर आरोप चुनाव आयोग पर लगाए हैं, उसका संतोषजनक उत्तर आयोग ने नहीं दिया है।
इसके बावजूद नगर निकाय चुनावों में मिली पराजय को सिर्फ ‘वोट चोरी’ के आरोपों तक सीमित करना दरअसल महाअघाड़ी या विपक्ष का अपनी कमजोरियों को नकारना ही है।
इन चुनावों की चर्चा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के बिना नहीं हो सकती जिसने महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं में कुल 126 सीटें जीती हैं, जिनमें बीएमसी की 8 सीटें भी शामिल हैं। जाहिर है, इन नतीजों को मुस्लिम राजनीति में आ रहे बदलाव की तरह से भी देखने की जरूरत है।
वास्तव में बीएमसी और महाराष्ट्र में भाजपा-शिवेसना की जीत ने कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के लिए चुनौती और बड़ी कर दी है। यदि इस जीत को हिंदुत्व की जीत के रूप में देखा जा रहा है, तो समझा जा सकता है कि इससे सर्वाधिक खुश आरएसएस होगा।
हिंदुत्व के उभार के इस दौर में अचरज नहीं होना चाहिए कि पत्रकार गौरी लंकेश हत्याकांड के आरोपी श्रीकांत पंगारकर ने जालना नगर निगम चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की है।
बेशक, एकनाथ शिंदे ने बाला साहेब ठाकरे के नाम का झंडा उठा रखा है, लेकिन ये नतीजे बीएमसी पर दशकों तक चले उनके नाम के सिक्के के चलन से बाहर होने का संकेत भी है।










