प्रियांक खड़गे को चेताने का मतलब आरएसएस के दिल में मनुस्मृति का राज!

कर्नाटक के बीजापुर से बीजेपी सांसद रमेश जिगाजिनगी ने जाने-अनजाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के चरित्र से जुड़े एक महत्वपूर्ण पहलू से पर्दा उठा दिया। कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खड़गे द्वारा आरएसएस की फंडिंग और कानूनी स्थिति पर उठाए गए सवालों पर प्रतिक्रिया जताते हुए जिगाजिनगी ने कहा कि ‘एक दलित व्यक्ति को आरएसएस के मामलों में पड़ने की क्या जरूरत है, उन्हें आराम से रहना चाहिए।…जिसने भी आरएसएस से पंगा लिया, वह कभी बच नहीं पाया।’

2004 से लगातार बीजेपी की ओर से सांसद में भेजे जा रहे पूर्व समाजवादी रमेश जिगाजिनगी खुद दलित समाज से आते हैं। बीजेपी और आरएसएस में उनके निजी अनुभव से निकला यह वाक्य बता रहा है कि ‘आरएसएस के मामले दलितों के मामले से अलग हैं और आरएसएस से पंगा लेकर दलित चैन से नहीं रह पायेंगे, चाहे वह प्रियांक खड़गे जैसे गृहमंत्री पद पर पहुंच चुके दलित क्यों न हों।’

आरएसएस के हिंदू एकता का सच यही है।

प्रियांक खड़गे ने बतौर गृहमंत्री आरएसएस से उसकी स्थिति जाननी चाही है। वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ बता चुके हैं, लेकिन प्रियांक खड़गे चाहते हैं कि आरएसएस संगठन के जिस भी स्वरूप में ख़ुद को निर्धारित करता हो, उसमें ही पंजीकरण करा ले।

प्रियांक खड़गे ने मोहन भागवत को लिखे पत्र में संघ पर कोई भी टिप्पणी किये बिना उन्हें अपनी क़ानूनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा था लेकिन जवाब में भागवत ने हिंदू धर्म के भी रजिस्टर्ड न होने की दलील दे दी। वैसे तो कोई भी धर्म रजिस्टर्ड नहीं है लेकिन आरएसएस को हिंदू धर्म का पर्याय बताना, मोदी के नॉन बायलाजिकल (अवतार) बताने की ही अगली कड़ी है। यह दलील सत्ता के शिखर पर बैठने के अहंकार से उपजी है।

रमेश जिगाजिनगी ने अपनी प्रतिक्रिया से उन तमाम सवालों को फिर से प्रासंगिक बना दिया है जो आरएसएस को लेकर शुरू से ही उठते रहे हैं। ये सवाल उसके मनुवादी सोच और स्वरूप का है। वह बात तो समस्त हिंदू समाज की करता है लेकिन हिंदू संस्कृति की रक्षा का दूसरा मतलब उसके लिए वर्णव्यवस्था यानी ऊंच-नीच के सामाजिक अनुक्रम को दैवीय व्यवस्था बताकर बचाये रखना है। यह संयोग नहीं कि जिस राम मंदिर में चंदा और ज़ेवर की डकैती का मुद्दा आजकल सरगर्म है, उसका संचालन पूरी तरह आरएसएस के हाथ में है और राममंदिर ट्रस्ट के सभी आठ स्थायी सदस्य एक ही जाति (ब्राह्मण) हैं।

यह बात छिपी नहीं है कि आरएसएस भारतीय संविधान को लेकर पहले दिन से असहज है। लेकिन क्यों? आख़िर इस संविधान ने ऐसा क्या किया जो आरएसएस को पचा नहीं? दरअसल, इस संविधान ने हजारों साल से चली आ रही ऊंच-नीच के विधान को वैधानिक रूप से उलट दिया। इसने शूद्रों और स्त्रियों की पांव में पड़ी बेड़ियों को काट दिया। अपमान के पाताल को नियति मान चुके लोगों को पंख दिये और भारतीय आकाश में समता का नया रंग चढ़ा दिया। इस संविधान ने पाँच हज़ार साल के इतिहास में पहली बार वैधानिक रूप से मनुष्य को मनुष्य के बराबर माना चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो। समता, समानता और भ्रातृत्व की भावना पर आधारित संविधान को आरएसएस ने भारतीय संस्कृति पर एक हमले की तरह लिया।

इसीलिए 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंतिम ड्राफ्ट को स्वीकार किये जाने के महज चार दिन बाद आरएसएस के मुखपत्र आर्गेनाइज़र में जो आलोचना छपी उसमें महत्वपूर्ण बिंदु यह भी था कि ‘इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है क्योंकि इसमें मनुस्मृति को स्थान नहीं दिया गया है।’ यह उसी मनुस्मृति के न होने की आलोचना थी जिसे लगभग बीस साल पहले डॉ.आंबेडकर स्त्रियों और शूद्रों की ग़ुलामी का दस्तावेज़ बताते हुए सार्वजनिक रूप से जला चुके थे।

आरएसएस ही क्यों, ‘हिंदू राष्ट्र’ का सपना देखने वाले सभी नेताओं और दलों के लिए मनुस्मृति एक साझा संकल्प की तरह रही है। आरएसएस के प्रेरणास्रोत विनायक दामोदर सावरकर मनुस्मृति को ‘हिंदू लॉ’ बताते थे। बाद में आरएसएस के बनाये जनसंघ में विलय करने वाली रामराज्य परिषद के प्रमुख नेता करपात्री महाराज के सिर पर मनुस्मृति इस कदर सवार थी कि उन्होंने डॉ.आंबेडकर को संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाये जाने का यह कहते हुए विरोध किया था कि “एक महार के हाथों बना संविधान इस देश का सच्चा हिन्दू कभी स्वीकार नहीं करेगा।”

आरएसएस की नज़र में भारत एक हिंदू राष्ट्र है और मनुस्मृति ही उसका संविधान हो सकती है। एक समय में आरएसएस ने मनुस्मृति के पक्ष में कैसा अभियान चलाया था, इसकी बानगी 6 फरवरी 1950 को छपे एक लेख के इस शीर्षक से लगाइये — ‘Manu Rules Our Hearts’ यानी मनु हमारे दिलों पर राज करते हैं। यह लेख सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जज शंकर सुब्बा अय्यर ने लिखा था।

उन्होंने तर्क दिया था ‘हिंदुओं के दैनिक जीवन पर मनुस्मृति का प्रभाव है, और लोग इनके नियमों से बंधे हुए महसूस करते हैं।’ बाद में हिंदू कोड बिल के खिलाफ आरएसएस ने जिस तरह पं. नेहरू और डॉ. आंबेडकर के पुतले पूरे देश में फूंके, वह भी मनुस्मृति पर पड़ी चोट का ही प्रतिकार था। हिंदू कोड बिल ने स्त्रियों को जीवनसाथी के चयन का अधिकार, पैतृक संपत्ति में अधिकार, विधवा विवाह और तलाक जैसे अधिकार देकर यह चोट दी थी।

यह नहीं, भारत का संविधान ने संपत्ति के संबंधों पर भी चोट की। जमींदारी खत्म करके कथित ऊंची जातियों के क़ब्ज़े में पड़ी लाखों एकड़ जमीन को मुक्त कराके उस पर श्रम करने वाली शूद्र जातियों के बीच वितरित कर दी। आगे चलकर प्रीवीपर्स और राजा-महाराजा के टाइटल के इस्तेमाल पर रोक लगाकर विशेषाधिकार को नष्ट कर दिया। समाजवाद का लक्ष्य स्वीकारते हुए पूंजीपतियों पर नकेल डालने का प्रयास किया, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, सार्वजनिक उपक्रमों के विकास और आरक्षण जैसी मौनक्रांति के ज़रिए उन करोड़ों लोगों को देश के विकास में भागीदार बनाया जो हमेशा हाशिये पर पड़े रहते थे। यह सब मनुस्मृति की नज़र में अपराध ही है।

बहरहाल, लोकतंत्र में संख्या के महत्व को देखते हुए सत्ता शीर्ष पर पहुँच चुके आरएसएस ने अपनी भाषा बदल ली है। उसके राजनीतिक प्रयोग यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर से मंत्रिमंडल में दलित और पिछड़ी जातियों की भागीदारी के आँकड़े प्रचारित किये जाते हैं और प्रधानमंत्री मोदी की जाति को समय रहते पिछड़ी जाति में डलवाने का काम भी शायद इसी योजना का हिस्सा था लेकिन वह जिस प्राचीन गौरव की बात बार-बार करता है, वह वर्ण-व्यवस्था के शोषण पर चलने वाली सामाजिक आर्थिक व्यवस्था ही थी।

बीजेपी सांसद रमेश जिगाजिनगी ने आरएसएस से पंगा न लेने की चेतावनी देते हुए प्रियांक खड़गे को उनकी हैसियत याद दिलायी है जो हिंदू राष्ट्र में किसी दलित की होनी है। आरएसएस का हर सदस्य हिंदू राष्ट्र को अपना लक्ष्य मानता है जो इस संविधान को नष्ट किये बिना संभव नहीं है। इसीलिए डा.आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘हिंदू राष्ट्र लोकतंत्र के लिए विपत्ति है। उसे हर हाल में रोकना है।’

जो लोग आरएसएस नेताओं की विनम्रता और अनुशासन आदि की दुहाई देते हैं, उन्हें आरएसएस से मोहभंग के बाद इसके प्रचारक रहे देशराज गोयल की इस संगठन पर लिखी किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए। इस किताब के पहले चैप्टर का नाम है ‘अज्ञान का आनंदलोक।’ इसमें दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री रहे चौधरी ब्रह्मप्रकाश के एक जवाबी पत्र का उल्लेख है। साठ के दशक में उन्हें संघ के नेता केदारनाथ साहनी ने एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया था ताकि आरएसएस के बारे उनकी ग़लतफ़हमी दूर हो। स्वतंत्रता सेनानी रहे चौधरी ब्रह्मप्रकाश ने जवाब देते हुए लिखा था- “मेरे जैसे लोग आरएसएस की पाखंडपूर्ण विनम्रता और अनुशासन से धोखा नहीं खा सकते। संघ के लोग अक्सर कहानी सुनाते हैं कि शिवाजी ने विनम्रतापूर्वक आलिंगन करते हुए अफजल खां को मार डाला था। लगता है कि उस पराक्रमी वीर के अन्य पहलुओं को छोड़कर संघियों ने अपने आचरण के लिए शिवाजी की इसी मूर्ति को आदर्श बना रखा है।”

आरएसएस संविधान के साथ भी यही कर रहा है। दिखावे के लिए संविधान को सर माथे लगता है लेकिन इसके मूल संकल्पों को नष्ट करने का हर संभव उपाय करता है। गृहमंत्री प्रियांक खड़गे की हैसियत याद दिलाकर उसने फिर स्पष्ट किया है कि उसके दिल में मनुस्मृति ही राज करती है!

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