-तुहिन, वामपंथी कार्यकर्ता
हाल ही में जर्मनी के पूर्वांचल के सेक्सोनी उन्हलट प्रदेश में हुए चुनाव ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। प्रादेशिक चुनाव में धुर दक्षिणपंथी नव फासीवादी पार्टी AFD को 43.8% वोट मिले हैं जबकि जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन CDU को 17.2% वोट मिले हैं। 83 सदस्यीय प्रादेशिक असेंबली में AFD को कुल 39 सीट मिले हैं जबकि पूर्ण बहुमत के लिए उसे मात्र 3 सीटों की जरूरत है।
AFD के नेता हैं उलरिश जिग्मुंड जो कि हिटलर के नाजीवाद के कट्टर अनुयायी हैं, के नेतृत्व में AFD एशिया,अफ्रीका,लैटिन अमरीका के अप्रवासियों,विदेशियों, शरणार्थियों और मुसलमानों को जर्मनी से भगाने के अभियान में सक्रिय है। इन जैसे नव फासीवादी ताकतों का कहना है कि सभ्यता के लिए खतरा हिटलर या उसका नाजीवाद नहीं था बल्कि यूरोप और सभ्य दुनिया के लिए खतरा कम्युनिस्ट विचारधारा और समाजवादी सोवियत संघ था।
इसीलिए द्वितीय विश्व युद्ध में फासिस्ट जर्मनी,इटली और जापान के धुरी देशों के खिलाफ अमरीका,ब्रिटेन आदि पूंजीवादी- साम्राज्यवादी ताकतों को समाजवादी सोवियत संघ के साथ फासीवाद विरोधी मोर्चा नहीं बनाना चाहिए था। ऐसा करके पूंजीवादी- साम्राज्यवादी ताकतों ने बड़ी ऐतिहासिक गलती की।
होना ये चाहिए था कि कम्युनिज्म और सोवियत संघ के खिलाफ अमरीका,ब्रिटेन,फ्रांस आदि पूंजीवादी देश , हिटलर के नेतृत्व वाले धुरी देशों के मोर्चे के साथ मिलकर लड़ते और साम्यवाद को दुनिया के नक्शे से मिटा देते।
फरवरी में हुए जर्मनी के पिछ्ले आम चुनाव में AFD ने 20% वोट हासिल कर सबको हैरान कर दिया था। AFD,आम चुनाव में दूसरे नंबर पर रही। यह चांसलर फ्रेडरिक की पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभरी तभी राजनैतिक विश्लेषकों और प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतों ने जर्मनी में नव फासीवाद के उत्थान के बारे में सतर्क किया था।
असल में जर्मनी में सत्ताधारी सीडीयू सहित तमाम पूंजीवादी उदारवादी पार्टियों ने धुर दक्षिणपंथी नव नाजी ताकतों को आगे बढ़ने में मदद किया है।ये रुझान अमरीका,फ्रांस,नीदरलैंड,फिनलैंड,स्वीडन,सहित पूरे यूरोप में प्रबलता से दिख रहे है जिस तरीके से पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के संकट से गरीबी भुखमरी,बेरोजगारी,महंगाई और बदहाली पूरी दुनिया में बढ़ रही है उसका लाभ उठाकर हर देश की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का नया फासीवाद सबसे भ्रष्ट वित्तीय पूंजी-कॉरपोरेट घरानों का लठैत बनकर धार्मिक कट्टरपंथ का सहारा लेकर सत्ता पर काबिज़ हो रहा है।
अगर भारत में RSS का वैचारिक आधार मनुवादी हिंदुत्व है तो श्रीलंका और म्यांमार में राजनैतिक बौद्ध धर्म उनका हथियार है,मध्य एशिया और पश्चिम अफ्रीका में राजनैतिक इस्लाम है तो अमरीका और यूरोप के कई देशों में कट्टर ईसाइयत है। वहीं अफ्रीका में नव आदिवासीवाद है।
इन सब में एक बात गौर करने की है कि सारी नव फासीवादी ताकतें साम्राज्यवादी पूंजीवादी ताकतों की एकनिष्ठ सेवक हैं और सबकी सब घोर कम्युनिस्ट विरोधी हैं। लोकलुभावन नारों ,अतीत के इतिहास का महिमामंडन, पितृसत्तात्मक मिथकों का इस्तेमाल,महिलाओं, LGBTQ समुदाय, गरीब देशों से आए अप्रवासी और मुसलमानों धार्मिक नस्लीय अल्पसंख्यकोंसे नफ़रत और सामाजिक व ऐतिहासिक असमानताओं की पूजा करना हर जगह फासीवाद की आम खासियत है।
इसी तरह भारत में 100 सालों के प्रयास से दुनिया के सबसे बड़ा और सबसे पुराने फासीवादी संगठन RSS ने संसद से सड़क तक की सत्ता पर कब्जा किया है। उसी तरह जर्मनी में हिटलर के नाजीवाद के द्वारा बर्बाद कर दिए गए जर्मनी में 80 सालों में पहली बार खुलकर एडॉल्फ हिटलर के अनुयाई फासिस्ट सत्ता कायम करने की ओर बढ़ रहे हैं।
मौजूदा हालात में सबसे ज्यादा जरूरी है कि पूंजीवादी पार्टियों के भ्रम जाल में न फंसकर मेहनतकशों और उत्पीड़ित वर्गों का एक जबरदस्त फासीवाद कॉरपोरेट गठबंधन विरोधी मोर्चा बना कर लड़ाई को आगे बढ़ाना जो अंततोगत्वा मानवद्रोही पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाड़ कर समाजवादी विश्व व्यवस्था कायम करने का मार्ग प्रशस्त करेगा।











