दिल्ली दंगे मामले में न्याय की धूमिल उम्मीदें

Delhi

27 फरवरी 2020 को भागीरथ विहार के बड़े नाले से मुशर्रफ की अधजली लाश मिली थी। इस मामले में 29 अप्रैल को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने सभी 12 मुजरिमों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष और दिल्ली पुलिस आरोप साबित करने में असफल रहा और गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास है। 

इस मामले में मुशर्रफ की पत्नी और बेटी गवाह थे, जिनके सामने घर में घुस आकर उसे मारा गया, फिर पैर पकड़ कर घसीटते हुए तीसरी मंजिल से नीचे ले जा कर जलती मोटर साइकिल में फूंकने के बाद नाले में फेंक दिया गया। इन दोनों ने अदालत में कम से कम छह लोगों को पहचाना भी था। 

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से मृतक की पत्नी और बेटी के बयानों पर आधारित था, लेकिन उनके बयानों में कई गंभीर विरोधाभास पाए गए।

याद होगा कि इस मामले के सभी अभियुक्त लोकेश सोलंकी, पंकज शर्मा, सुमीत चौधरी, अंकित चौधरी, प्रिंस, रिषभ, जतिन शर्मा, विवेक, हिमांशु ठाकुर, साहिल, टिंकू अरोड़ा व संदीप उस व्हाट्सएप ग्रुप ‘कट्टर हिन्दू एकता’ के सदस्य थे, जिस पर बहुत सी हत्या, लूट, हथियार एकत्र करने का आरोप है। इसके बावजूद अदालत ने इस समूह की गतिविधियों को संगठित और नियोजित अपराध नहीं माना था।

आज मुशर्रफ की पत्नी गाजियाबाद के लोनी के स्लम में कबाड़  का काम कर परिवार चला रही है और इस फैसले से निराश और हताश है।

अदालत और पुलिस से नाउम्मीदी और निराश  केवल मुशर्रफ का परिवार ही नहीं हैं। 

छह साल और तीन महीने बीतने के बाद भी दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से में चार दिन चले दंगे की दिल्ली पुलिस की गहरी साजिश वाला आरोप पत्र  किसी अंजाम तक पहुंचा ही नहीं है और उमर  खालिद- शरजील  इमाम, बगैर किसी  सुनवाई के जेल में हैं।

उधर इस दंगे के आरोप में दर्ज  हत्या, लूट, आगजनी जैसे अपराधों के मुजरिम एक एक कर निचली अदालतों से बरी हो रहे हैं। जाहिर है कि जिला अदालत में चल रहे मामलों में पुलिस की जांचें  कमजोर हो रही हैं और आए दिन अभियुक्त बेदाग हो रहे है।

एक मामला तो ऐसा भी सामने आया जिसमें जिसके घर में आग लगी, पुलिस ने उसी को उसी मामले में अभियुक्त बना दिया।

फरवरी-2020 में चार दिनों तक नॉर्थ-पूर्वी दिल्ली सुलगती रही। 53 लोग मारे गये, कई सौ घायल हुए। हजार से  अधिक घर-मकान फूंक दिए गये।

देश में सबसे अधिक सुरक्षित कहे जाने वाले महानगर में घटित ऐसे भयानक घटनाक्रम से जुड़े मसले जैसे-जैसे अदालत में आ रहे हैं। साफ हो रहा है कि न तो पुलिस ने सही तरीके से जांच की और न ही इसकी गहरी साजिश के असली सूत्र उजागर हुए। 

आए दिन जज जांच अधिकारियों को फटकार रहे हैं। आरोपी, माकूल साक्ष्य के अभाव में बरी हो रहे हैं। हर मामले में दिल्ली पुलिस की अधकचरी जांच, पूर्वाग्रही पड़ताल और साक्ष्यों के अभाव व सही गवाह न होने के चलते आरोपी बरी हो रहे हैं।

दिल्ली दंगों से संबंधित सूचना के लिए जब एक पत्रकार ने दिल्ली पुलिस से सूचना के अधिकार के अंतर्गत जानकारी मांगी तो टालने के अंदाज में पहले जबाव दे दिया कि चूंकि इसमें किसी समय-विशेष का उल्लेख नहीं हैं, इसलिए जानकारी नहीं दे सकते।

फिर अपीलीय अधिकारी के पास अर्जी भेजने पर 10 मार्च 2026 को दिए गए उत्तर में दिल्ली पुलिस ने बताया कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा के मामले में पुलिस ने कुल 757 मुकदमे दर्ज किए थे। इनमें से 249 मुकदमे ऐसे हैं  जिनकी जांच चल रही है और इनमें कोई आरोप पत्र दाखिल किया ही नहीं गया। अर्थात एक तिहाई मामलों में 2265 दिन बाद भी पुलिस खाली हाथ है।

आरटीआई 938/दंगा अनुभाग/ एनईडी बताती है कि इन 249 मामलों की जांच अभी भी पुलिस कर रही है। 75 मामले ऐसे हैं जिनमें पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट लगा दी। अंतिम रिपोर्ट अर्थात एफआर उन मामलों में लगाई जाती है जिनमें पुलिस को कोई पुख्ता तथ्य-साक्ष्य नहीं मिलते तो वह सक्षम जज के सामने इस बात के आधार पर मामला सदा के लिए बंद करने का आदेश ले लेते हैं।

पुलिस इस बात को स्वीकार करती है कि अभी तक 109 मामलों में 386 लोग बरी हो चुके हैं जबकि 22 मुकदमों में  मात्र 51 लोगों को सजा हुई है।

विदित हो चार दिनों तक दिल्ली में दंगे हुए, जिसमें एक पुलिसकर्मी रतनलाल और एक आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा की मौत भी हुई थी। दर्ज किए गए मामलों में से एक स्पेशल सेल, 62 क्राइम ब्रांच और 695 उत्तर पूर्वी दिल्ली के विभिन्न थानों में पंजीकृत हैं।

दिल्ली पुलिस में सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 758 एफआईआर में 2619 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, इनमें से 2094 लोग जमानत पर बाहर हैं।

दंगे की साजिश रचने के मामले की जांच स्पेशल सेल कर रही है। इसमें दो आरोपी गिरफ्त के बाहर हैं। साजिश के केस में भी आरोपियों को जमानत देते समय अदालत ने जांच पर सवाल खड़े किए। वह तो पुलिस ने कतिपय लोगों को जेल में रखने के इरादे से UAPA का इस्तेमाल किया है, वरना सारी जांच के चिथड़े उड़ गए होते। 

कई प्रकरण तो ऐसे सामने आये जिनमें जांच ही अधूरी थी या गलत दस्तावेज लगाए गए थे। इस पर न्याययिक अधिकारी कड़ी टिपण्णी करते रहे, लेकिन दिल्ली पुलिस ने किसी भी अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की।

बारी हुए अधिकांश मामलों में जिला अदालत के निर्णय के विरुद्ध दिल्ली पुलिस उच्च नयायाली अपील करने भी नहीं गई।

सबसे शर्मनाक मामला ‘कट्टर हिन्दू एकता’ व्हाट्सऐप ग्रुप वाला था, जिसमें पुलिस ने 24 फरवरी से आठ मार्च के बीच हुई तमाम बातचीत को भी कोर्ट में जमा किया।

इस ग्रुप में हुई बातचीत आरएसएस, कपिल मिश्रा, मस्जिदों में आग लगाने और मूर्तियां स्थापित करने, बंदूक, पिस्टल और गोली के लेन-देन करने और मुसलमानों को मारने की साजिश के इर्द-गिर्द रही है। इतना ही नहीं इस ग्रुप में मुस्लिम महिलाओं का दुर्व्यवहार करने की भी बात की गई है। 

दुर्भाग्य से यह मामला जब अदालत में गया तो पुलिस यह सिद्ध नहीं कर पाई कि सवा सौ लोगों का समूह साजिश रच कर यह उपद्रव कर रहा था। 

इसी तरह दिलबर नेगी हत्या काण्ड में 12 में से 11 आरोपी बरी हो गये। आरोप मुक्त किए गए लोगों के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं थे। न ही इस मामले में दंगाई के रूप में उनकी पहचान कराने संबंधी किसी गवाह के बयान थे। जबकि शर्जील इमाम जो कि दंगे से डेढ़ महीने पहले गिरफ्तार किया गया और असम की जेल में था, उसे दंगे की साजिश में रखा गया है। 

अदालत के कटघरे में दिल्ली पुलिस की जांच

02 सितंबर 2021: एक ही मामले में पांच एफआईआर। घटना एक रिपोर्टकर्ता पांच। गवाह भी समान और मुजरिम भी समान। दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को खरी-खरी सुनाई व चार एफआईआर रद्द कर दीं।

03 सितंबर 2021: दिल्ली हाईकोर्ट ने फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा के दौरान हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले के साथ-साथ एक डीसीपी को घायल करने के मामले में 5 आरोपियों को जमानत दे दी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने आदेश पारित करते हुए कहा कि अदालत की राय है कि याचिकाकर्ताओं को लंबे समय तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की सत्यता का परीक्षण ट्रायल के दौरान भी किया जा सकता है। पुलिस ने फुरकान, आरिफ, अहमद, सुवलीन और तबस्सुम को पिछले साल क्रमशः 11 मार्च, एक अप्रैल, छह अप्रैल, 17 मई और तीन अक्तूबर 2020 को गिरफ्तार किया था।

हाईकोर्ट ने महिला सहित पांच आरोपियों को जमानत देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति जताने का अधिकार मौलिक है। कोर्ट ने कहा कि विरोध करने के अधिकार का इस्तेमाल करने वालों को कैद करने के लिए इस कृत्य का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित करना अदालत का संवैधानिक कर्तव्य है कि राज्य की अतिरिक्त शक्ति की स्थिति में लोगों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जाए।

04 सितंबर 2021 : दिल्ली की विशेष जज की अदालत में पता चला कि दंगे के दौरान शीरपुर में जीशान की दुकान जलाने के मामले में पुलिस ने दयालपुर थाने में ही दो एफआईआर दर्ज कर ली थी – एक 109/2020 और दूसरी 117/2020।

20 जून, 2020: दिल्ली की एक अदालत में फैसल को जमानत देने वाले जज विनोद यादव ने कहा कि इस मामले के गवाहों के बयानों में अंतर है और मामले में नियुक्त जांच अधिकारी ने खामियों को पूरा करने के लिए पूरक बयान दर्ज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘जांच अधिकारी ने इन लोगों में से किसी से भी बात नहीं की और सिर्फ आरोपों के अलावा कोई भी ठोस सबूत नहीं है, जिसके दम पर यह साबित किया जा सके कि फैसल ने इन लोगों से दिल्ली दंगों के बारे में बात की थी।’

29 मई 2020: दिल्ली हाई कोर्ट ने फिराज खान नामक एक अभियुक्त को जमानत देते हुए पुलिस से पूछा कि आपकी प्रथम सूचना रिपोर्ट में तो 250 से 300 की गैरकानूनी भीड का उल्लेख है। अपने उसमें से केवल फिरोज व एक अन्य अभियुक्त को ही कैसे पहचाना? पुलिस के पास इसका जवाब नहीं था और फिरोज को जमानत दे दी गई।

27 मई 2020: दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने साकेत कोर्ट में जज धर्मेन्द्र राणा के सामने जामिया के छात्र आसिफ इकबाल तनहा को पेश किया था। इस ममले में भी आसिफ को न्यायिक हिरासत में भेजते हुए जज ने कहा कि दिल्ली दंगों की जांच दिशाहीन है। मामले की विवेचन एकतरफा है। कोर्ट ने पुलिस उपायुक्त को भी निर्देश दिया कि वे इस जांच का अवलोकन करें।

25 मई 2020 :  पिंजड़ा तोड़ संगठन की नताशा और देवांगना को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के सामने प्रदर्शन करने के आरोप में गिरफ्तार किया। अदालत ने कहा कि उन्होंने प्रदर्शन करने का कोई गुनाह नहीं किया इसलिए उन्हें जमानत दी जाती है। यही नहीं अदालत ने धारा 353 लगाने को भी अनुचित माना। अदालत ने कहा कि अभियुक्त केवल प्रदर्शन कर रहे थे। उनका इरादा किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक तरीके से उनका काम रोकने का नहीं था। इसलिए धारा 353 स्वीकार्य नहीं है ।

दिल्ली पुलिस की जांच तब और संदिग्घ हो गई जब केस नंबर 65/20 अंकित शर्मा हत्या और केस नंबर 101/20 खजूरी खास की चार्जशीट में कहा गया कि 8 जनवरी को शाहीन बाग में ताहिर हुसैन की मुलाकात खालिद सैफी ने उमर खालिद से करवाई और तय किया गया कि अमेरिका के राष्ट्रपति के आने पर दंगा करेंगे। हकीकत तो यह है कि 12 जनवरी 2020 तक किसी को पता ही नहीं था कि ट्रंप को भारत आना है और 12 जनवरी को भी एक संभावना व्यक्त की गई थी जिसमें तारीख या महीने का जिक्र था ही नहीं। यह तो कुछ ही मामले हैं। दिल्ली पुलिस ने दंगों से संबंधित जांच को एक उपन्यास बना दिया। 

24 फरवरी 2020 को चमन पार्क में मिठाई के गोदाम में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के रोखड़ा गांव निवासी दिलबर नेगी का आधा जला शव बरामद हुआ था। उसके हाथ और पैर भी गायब थे। इस मामले में बुधवार को कड़कड़डूमा कोर्ट ने 12 में से 11 आरोपितों को आरोप मुक्त कर दिया। एक आरोपी मोहम्मद शाहनवाज पर हत्या समेत अन्य आरोप तय किए गए है। आरोप मुक्त किए गए लोगों के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं थे, न ही इस मामले में दंगाई के रूप में उनकी पहचान कराने संबंधी किसी गवाह के बयान थे।

घोंडा के सुभाष विहार निवासी दानिश की करावल नगर रोड पर शेरपुर चौक के पास चंदू नगर ए-97 स्थित कूरियर की दुकान 24 फरवरी 2020 को दंगाइयों ने जला दी थी। इस पर एफआईआर 108/2020, दयालपुर थाना में दर्ज हुई लेकिन जब मामला अदालत में गया तो पुलिस ने 22 अन्य शिकायतें इसमें जोड़ दीं।

इसी साल सात जून को कड़कड़डूमा कोर्ट ने इस केस के तीन लोगों को बरी कर दिया। कोर्ट ने आदेश में लिखा कि इस मामले में जांच अधिकारी ने ढिलाई बरती है। उसने केवल एक शिकायत पर जांच की, जिसमें आरोपियों पर आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। बाकी शिकायतों की जांच के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया है।

ब्रजपुरी में 25 फरवरी 2020 को विक्टोरिया स्कूल के अंदर खड़े वाहन जलाने के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने  16 अगस्त 24 को आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि पुलिस ने रिपोर्ट की गई घटनाओं की पूरी तरह से जांच नहीं की। आरोपपत्र गलत तरीके से दायर किया गया और शुरुआती गलती पर पर्दा डाला गया। इसमें भी कोर्ट ने फिर से जांच करने को कहा है।

सबसे भयानक तो वे दस से अधिक एफआईआर हैं जिनमें कई रसूखदार लोगों के नाम हैं, जिन पर सरेआम दंगा करने, लोगों की हत्या करने, माल-असबाब जलाने के आरोप हैं। यमुना विहार के मोहम्मद इलीयास और मोहम्मद जामी रिजवी, चांदबाग की रुबीना बानो, प्रेम विहार निवासी सलीम सहित कई लोगों की रिपोर्ट पर पुलिस थाने की पावती के ठप्पे तो लगे हैं लेकिन उनकी जांच को लेकर कोई कदम उठाया नहीं गया। इसी तारतम्य में हाई कोर्ट के जज श्री मुरलीधरन द्वारा कुछ वीडियो देख कर दिए गए जांच के आदेश  और फिर जज साहब का तबादला हो जाना और उसके बाद उनके द्वारा दिए गए जांच के आदेश  पर कार्रवाई ना होना वास्तव में न्याय होने पर शक खड़ा करता है।

दिल्ली दंगों को लेकर  दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की एक जांच रिपोर्ट है। यह सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मदन वी लोकुर की अध्यक्षता में गठित एक स्वतंत्र जांच आयोग की रिपोर्ट है। इसके अलावा भी दो अन्य संगठनों की जांच रिपोर्ट है।

इन सभी रिपोर्ट्स के तथ्य और निष्कर्षों को पुलिस ने नजरंदाज किया। यही नहीं उनकी जांच की दिशा जस्टिस लोकुर के निष्कर्षों से बिलकुल विपरीत दिशा में हैं। 

यह एक विचारणीय प्रश्न है कि अमेरिका के राष्ट्रपति के आगमन से कुछ दिन पहले संसद से 13 किलोमीटर दूर चार दिन लगातार दंगा चलता रहा। 

जिस दिल्ली में सभी अर्ध सैनिक बलों की पर्याप्त बटालियन होती है, दिल्ली पुलिस का अपना विशेष बल है। जिस जगह देश और दुनिया की सभी खुफिया एजेंसियां काम करती  हैं।  ऐसे में यदि चार दिन निरंकुश उत्पात होता रहा तो इसमें पुलिस और खुफिया महकमें की जिम्मेदारी कैसे न तय की जाए? उसके बाद जांच के नाम पर अधूरे, फर्जी तथ्य अदालत में जा रहे हैं।  इस मामले में कई लोग साजिश के आरोप में चार साल से अधिक दिनों से जेल में हैं और न्यायिक प्रक्रिया ठिठकी हुई है। 

इसीलिए आज जरूरी हो गया है कि दिल्ली दंगों की जांच की जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से करवाई जाए। यदि हाई कोर्ट के किसी वर्तमान जज इसकी अगुआई करें तो बहुत उम्मीदें बंधती हैं।

बॉक्स

न जांच न  तफतीश न संगठित अपराध (कट्टर हिन्दू  व्हाट्स एप ग्रुप के चेट जो अदालत में रखे  गए  लेकिन जज साहब ने इन्हें संगठित अपराध नहीं माना )

‘भाई आरएसएस के लोग आये हैं यहां सपोर्ट में।

ब्रिजपुरी में।

और नौ मुल्लों को मार दिया गया है ब्रिजपुरी पुलिया पर

हिम्मत बनाये रखो और इनकी बजाये रखो

जय श्रीराम। । ।

यह मैसेज दिल्ली दंगे के दौरान बने एक व्हाट्सऐप ग्रुप का है।  दंगों में हुई आगजनी और कत्लेआम के एक बड़े हिस्से की तैयारी इसी ग्रुप के जरिए हुई थी।

दिल्ली में दंगे भड़के हुए थे और पुलिस इतनी मुस्तैद थी कि तीन दिन तक आगजनी, लूटपाट, हत्सा होती रही।

25 फरवरी 2020 शाम 4 से 4. 30 बजे – मुरसलीन को भीड़ ने घेर कर मारा, उसका स्कूटर जलाया और लाश को भागीरथी विहार नाले में जोहरी पुलिया के पास फेंक दिया।

25 फरवरी 2020 शाम 7  से 7.30 बजे- लोनी की तरफ से पैदल आ रहे आस मुहम्मद को चाकू डंडों से मारा और उसी नाले में फेंक दिया।

25 फरवरी 2020 शाम 7.30 से 8 बजे– पहले इलाके की बिजली काटी। फिर मुशर्रफ को घर से निकाल आकर काट डाला गया। फिर उसकी लाश को उसी नाले में फैंक दिया गया। 

25 फरवरी 2020 रात 9 बजे- आमीन को मारा और नाले में डाल दिया।

26 फरवरी 2020 सुबह सवा 9 बजे- भूरे अली उर्फ सलमान की हत्या कर नाले में डाला।

26 फरवरी 2020 रात सवा 9 बजे हमजा के हाथ पैर तोड़े और उसे अधमरा ही नाले में फेंक दिया।

26 फरवरी 2020 रात साढ़े 9 बजे अकील अहमद को भी मार कर नाले में डाल दिया।

26 फरवरी 2020 रात 9. 40  बजे- हाशिम अली और उसके भाई आमिर को मारा और नाले में लाश फेंक दी।

यह सब काम करता रहा ‘ कट्टर हिन्दू  एकता’ नामक व्हाट्सएप ग्रुप – जिसके चैट में बात चीत है –

मैं गंगा विहार में हूं , किसी भी हिन्दू को जरूरत हो तो बताना , पूरी तैयारी है सारे हथियार हैं – क्या 315 बोर के कारतूस मिला जायेंगे? क्या एक्स्ट्रा पिस्तौल है? अभी तुम्हारे भाई ने दो मुल्लों को काट कर नाले में फैंक दिया।

‘कट्टर हिन्दू एकता’ नाम का व्हाट्सऐप ग्रुप 24 फरवरी की रात 12 बजकर 49 मिनट पर बनाया गया था।  इस ग्रुप में लगभग 125 लोग जुड़े हुए थे।

पुलिस ने चार्जशीट के साथ ‘कट्टर हिन्दू एकता’ व्हाट्सऐप ग्रुप में 24 फरवरी से आठ मार्च 2020 के बीच हुई तमाम बातचीत को भी कोर्ट में जमा किया है। 

इस ग्रुप में हुई बातचीत आरएसएस, कपिल मिश्रा, मस्जिदों में आग लगाने और मूर्तियां स्थापित करने, बंदूक, पिस्टल और गोली के लेन-देन करने और मुसलमानों को मारने की साजिश के इर्द-गिर्द रही है।  इतना ही नहीं इस ग्रुप में मुस्लिम महिलाओं का दुर्व्यवहार करने की भी बात की गई है।

कूल 125 लोगों का यह ग्रुप दो  दिन तक हत्या कर लाश नाले में फेंकता रहा।  यह मैं नहीं कह रहा हूं – यह गोकुलपुरी थाने द्वारा अदालत में पेश चार्जशीट में कहा गया है —  एफआईआर 104/20 दिनांक 3 मार्च 2020  धारा -147,148, 149, 302,201, 120 बी —

इस मामले में गिरफ्तार 9 में से 8 लड़के महज 19 से 23 साल के हैं – दुखद है कि नफरत का जहर इस आयु वर्ग में भर दिया गया और इन्हें हथियारों से लैस किया गया । 

लोकेश सौलंकी 19 , जतिन शर्मा  उर्फ रोहित 19 , हिमांशु ठाकुर 19, विवेक पांचाल 20, रिषभ चौधरी उर्फ तापस 20, सुमित चौधरी उर्फ बादशाह 23, प्रिंस 22 और पंकज शर्मा 31 साल। 

इस मामले में पुलिस की चार्जशीट कहती है कि यह भीड़ लोगों को पकड़ती— उनसे जय श्री राम के नारे लगवाती- आधार कार्ड देखती और हत्या कर देत।  लगभग 30  घंटे में 9 हत्या करना तो इन्होने कबूला है।  

दुर्भाग्य है कि दिल्ली के नागरिक अधिकार समूह के लोगों को बगैर किसी पुख्ता प्रमाण के दंगा भड़काने की साजिश का दोषी बता कर युएपीए में फंसाया गया लेकिन इतने सुनियोजित तरीके से कई हत्या करने, प्रॉपर्टी जलाने वालों पर कोई संगठित अपराध या दंगा भड़काने की साजिश की धाराएं नहीं लगाई गई। 

एक अन्य एफआईआर में तो दंगे में आरएसएस की भागीदारी उजागर हो गई। 

साहिल ने पुलिस को बताया कि – ‘25 फरवरी को तकरीबन शाम के 7 बजे होंगे। मैं और मेरे पिता नमाज अदा करने निकले ही थे।  बाहर हमारे सामने की गली में सुशील, जयवीर, देवेश मिश्रा (गली 8) और नरेश त्यागी हाथों में तलवार, बंदूकें और डंडे लेकर खड़े थे। जब सुशील ने मेरे पिता को देखा तो हमारी तरफ गोली चला दी।  मेरे पिता वहीं जमीन पर गिर पड़े और मैं अपनी जान बचाने के लिए भागा। साहिल ने अपनी शिकायत में दावा किया- उसने कुछ दूरी से देखा कि देवेश और जयवीर उसके पिता के पास पहुंचे और उन्हें लात मारी।  फिर उनकी जेब से कुछ चीजें निकाली।  वो लोग चिल्ला रहे थे कि आज वो उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे।‘

साहिल परवेज की शिकायत में देवेश मिश्रा का नाम था।  लेकिन उसे अब तक ना गिरफ्तार किया गया ना उसका नाम चार्जशीट में है।  वह 1996 से संघ के साथ जुड़ा हुआ है और बीते आठ सालों से आरएसएस का यमुना विहार डिस्ट्रिक्ट प्रभारी है।  हाल ही में वह विश्व हिंदू परिषद से जुड़ गया है।

उत्तम लंबे समय तक संघ का प्रचारक रहा है और उनकी कई गतिविधियों में शामिल रहा है। दूसरा भाई नरेश त्यागी भी संघ का नियमित और सक्रिय सदस्य था। एक अन्य आरोपी हरिओम मिश्रा है। उसकी जिम्मेदारी उत्तरी घोड़ा में रोज सुबह शाखा लगाने की थी।

राजपाल त्यागी एक गणित टीचर है। वह भी शहीद भगत सिंह पार्क में रोज सुबह शाखा जाता है।
अन्य नामों में दो भाई अतुल चौहान और वीरेंद्र चौहान, दीपक कुमार, सुशील और उत्तम मिश्रा हैं, जो आरएसएस की शाखा में जाते थे।

इस सारे मामले में मीडिया की भूमिका भी संदिग्ध रही है। दिनांक 4 जुलाई के ‘हिंदुस्तान’ ने इस खबर का एक हिस्सा छापा लेकिन किसी का नाम नहीं लिखा, साथ में टिप्पणी है – सौहार्द कायम रहे इसलिए हम किसी का नाम नहीं ले रहे। लेकिन इसके एक दिन पहले ही पहले पन्ने पर इसी अखबार ने मुस्लिम पक्ष के नाम सहित पुलिस  के बयान को खबर बना कर छाप दिया था।  

इन दिनों दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल अपने वकील के जरिएजो जवाब या बयान या सामग्री कोर्ट में पेश करती है उसे प्रेस को दे देती है और इसे खास विचारधार के पत्रकार इसे अपनी इन्वेस्टिगेशन के रूप में छापते हैं।  

पुलिस का इतना सांप्रदायिक, एकपक्षीय और झूठा स्वरुप तो उत्तर प्रदेश में भी देखने को नहीं मिला। स्पेशल सेल में पूछताछ के लिए बुलाये जा रहे अधिकांश लोग यह कहते पाए जाते हैं कि लगता ही नहीं कि उनसे कोई पुलिस वाला सवाल जवाब कर रहा है- लगता है कि संघ के कार्यालय में कोई तफ्तीश हो रही है।

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