लेंस डेस्क। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जोधपुर सेंट्रल जेल में अंटार्कटिका से भी ज्यादा बेरहम सर्दी का सामना करना पड़ा। यह दावा उनकी पत्नीक गीतांजलि आंगमो ने किया है। जब हाल ही में वह सोनम वांगचुक से मुलाकत कर लौटी थीं।
वांगचुक 26 सितंबर से एनएसए के तहत बंद हैं और उनकी रिहाई की अर्जी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
हाल ही में जेल में हुई मुलाकात के बाद गीतांजलि ने सोशल मीडिया पर बताया कि सोनम ने उनसे कहा कि यह उनकी जिंदगी की अब तक की सबसे कष्टदायक और ठिठुरन भरी सर्दी रही। लोग हैरान होते हैं कि लद्दाख जैसे ठंडे इलाके से आने वाले व्यक्ति को यह शिकायत कैसे हो सकती है?
इस सवाल पर सोनम का जवाब था कि लद्दाख में हमारे घर पैसिव सोलर तकनीक से +18 डिग्री तक गर्म रहते हैं, बुखारी जलाते हैं, कपड़े कई परतों वाले पहनते हैं। मैंने तो खुले आसमान के नीचे -25 डिग्री में भी भूख हड़ताल की है, अंटार्कटिका भी गया हूं वहां हम पूरी तैयारी के साथ जाते हैं। लेकिन जोधपुर जेल की उस कोठरी में जो ठंड महसूस हुई, उसकी कोई तुलना नहीं।
गीतांजलि के हवाले से सोनम कहते हैं कि जेल के बाहर तापमान 6 डिग्री था, अंदर भी ठीक वैसा ही। विशाल हॉलनुमा कोठरी सीमेंट-पत्थर की बनी थी, जिसमें लोहे की जाली वाली दस खिड़कियां थीं। बिना शटर, बिना किसी रोक-टोक के। तेज हवाएं चलतीं तो ठंड हड्डियों में चुभती थी, ऐसा लगता जैसे दिल्ली के किसी फ्लाईओवर के नीचे बिना छत सो रहे हों।
सोनम ने बताया कि वहां न गद्दा है, न तकिया, न बिस्तर। कंक्रीट की बर्फ-सी ठंडी फर्श पर दो-तीन कंबल डालकर किसी तरह रात काटी जाती है। जेल प्रशासन ने अतिरिक्त कंबल जरूर दे दिए, लेकिन उन खुले झरोखों से आती बर्फीली हवा को रोकने का कोई इंतजाम नहीं।
सोनम ने गीतांजलि से कहा कि जेल के ठीक बाहर बोरवेल का पानी 25 डिग्री पर बह रहा है एक मुफ्त और भरपूर संसाधन। उस पानी से वे एक जीरो-कॉस्ट, जीरो-कार्बन फ्लोर हीटिंग सिस्टम बना सकते हैं, जो सर्दियों में गर्मी और गर्मियों में ठंडक देगा। ऐसा सिस्टम पूरे देश की जेलों में लगाया जा सकता है।
वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि जेल प्रशासन उन्हें एक साधारण थर्मामीटर उपलब्ध कराए या कोर्ट से इस प्रोजेक्ट पर काम करने की अनुमति मिल जाए।








