रुपये ने फिर बनाया गिरावट का रिकॉर्ड, हुआ 91 पार- जानिए कहां तक लुढ़केगा?

December 16, 2025 9:07 PM
Rupee sets record low

नई दिल्‍ली। अमेरिकी डॉलर के सामने भारतीय रुपया मंगलवार को 23 पैसे की गिरावट के साथ ऐतिहासिक निचले स्तर 91.01 पर बंद हुआ। भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ताओं में प्रगति न होने और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली से रुपये पर दबाव बढ़ा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर की कमजोरी और कच्चे तेल के दामों में बड़ी गिरावट के बावजूद घरेलू मुद्रा को संभालना मुश्किल हो रहा है। इस वर्ष अब तक रुपया डॉलर के मुकाबले छह फीसदी से अधिक कमजोर पड़ चुका है। डॉलर इंडेक्स में मामूली 0.03 प्रतिशत की कमी के साथ यह 98.27 पर पहुंच गया।

दूसरी ओर, कमजोर रुपये से निर्यात को बल मिलता दिख रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ के बावजूद नवंबर में भारत का निर्यात 19.37 फीसदी उछलकर 38.13 अरब डॉलर हो गया, जिससे व्यापार घाटा पांच महीने के न्यूनतम स्तर 24.53 अरब डॉलर पर आ गया। कमजोर रुपया भारतीय उत्पादों को विदेशी बाजारों में सस्ता बनाता है, जो निर्यात और स्थानीय मुद्रा के बीच सकारात्मक संबंध को दर्शाता है।

दुनिया की प्रमुख 31 मुद्राओं में रुपया तीसरे सबसे खराब प्रदर्शन वाली मुद्रा बन गया है, जिसमें तुर्की की लीरा और अर्जेंटीना के पेसो से ही ज्यादा गिरावट दर्ज हुई है। दिलचस्प बात यह है कि डॉलर इंडेक्स खुद सात फीसदी से ज्यादा कमजोर हुआ है।

पिछले वर्षों में रुपये को एशिया की सबसे स्थिर मुद्राओं में गिना जाता था, जहां औसतन सालाना चार फीसदी की ही कमजोरी आती थी, मुख्यतः भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप की वजह से। 2017 से अब तक औसत सालाना गिरावट भी इसी स्तर पर रही। लेकिन सिस्टमैटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के विश्लेषकों के अनुसार, इस साल की 6.6 फीसदी गिरावट कोई चक्रीय नहीं, बल्कि दस साल से ज्यादा पुराने संरचनात्मक दबावों का परिणाम है।

पिछले दस कारोबारी दिनों में रुपया 90 से फिसलकर 91 के पार चला गया, जबकि सिर्फ पिछले पांच सत्रों में ही इसमें एक फीसदी की कमी आई। विदेशी मुद्रा विशेषज्ञों की राय है कि इस महीने रुपया 92 का आंकड़ा छू सकता है। कारोबार के दौरान यह पहले 36 पैसे लुढ़ककर 91.14 के सबसे कम स्तर पर पहुंचा, लेकिन सत्र के अंत में थोड़ी रिकवरी दिखी।

2012 से रुपया 90 फीसदी से अधिक अवमूल्यन हो चुका है, जिससे आरबीआई की मुद्रा स्थिरता की क्षमता पर भी असर पड़ा है। आने वाले 12-14 महीनों में इसमें आगे छह-सात फीसदी की और कमी आ सकती है, जिससे शेयर बाजार से मिलने वाले लाभ पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

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