नई दिल्ली। भारत की अर्थ–व्यवस्था (India’s economy) की बदहाल तस्वीर सामने आई है। भारतीय शेयर और बॉन्ड बाज़ार से मई महीने में विदेशी निवेशकों ने 4.7 अरब डॉलर निकाल लिए — जबकि एक साल पहले इसी महीने वे 1.3 अरब डॉलर लगा रहे थे। यानी सिर्फ एक महीने में करीब 6 अरब डॉलर का उलटफेर।
यह अकेला आंकड़ा बता देता है कि विदेशी निवेशकों का भारतीय बाज़ार पर भरोसा हाल के महीनों में डगमगाया है — और इसी के साथ भारत के पूरे बाहरी हिसाब-किताब पर दबाव बढ़ा है।
रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ही आंकड़ों के मुताबिक, इसी असर से देश का करेंट अकाउंट (व्यापार-सेवाओं का हिसाब) मई में 2 अरब डॉलर के घाटे में चला गया, जबकि पिछले साल यह फ़ायदे में था।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) भी हल्का घटा — 0.9 अरब डॉलर की आमद की जगह 0.1 अरब डॉलर की मामूली निकासी हुई। जोड़ लें तो कुल भुगतान संतुलन (BoP) भी 4.4 अरब डॉलर के घाटे में पहुंच गया, जबकि पिछले साल इतने ही डॉलर का फायदा था।
जून : और गहरा घाव
जून का पूरा आंकड़ा अभी नहीं आया — RBI को यह डेटा जारी करने में डेढ़ महीने लगते हैं, पूरी तस्वीर अगस्त-सितंबर में आएगी। लेकिन शुरुआती संकेत बता रहे हैं कि हालात और बिगड़े हैं। जून में भारत का व्यापार घाटा 30.43 अरब डॉलर तक पहुंच गया — जून महीने के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा घाटा। वजह साफ़ है: पश्चिम एशिया में जंग और रूसी तेल पर अमेरिकी पाबंदियों के चलते भारत को तेल महंगा खरीदना पड़ा, जिससे आयात बिल 31% उछल गया।
जनता पर पड़ेगा भारी असर
▪️रुपया और कमज़ोर हो सकता है — शेयर बाज़ार से निकलने वाला डॉलर सबसे तेज़ी से असर दिखाता है, क्योंकि यह ‘हॉट मनी’ होता है जो जल्दी आता-जाता है। इसकी बड़ी निकासी से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया सस्ता होता है।
▪️महंगाई पर दबाव — कमज़ोर रुपये और महंगे तेल का सीधा असर आयातित सामान — पेट्रोल, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद, दवाइयां — की कीमतों पर पड़ता है, जिसका बोझ आम उपभोक्ता उठाता है।
▪️विदेशी मुद्रा भंडार घट सकता है — रुपये को संभालने के लिए RBI को अपने डॉलर भंडार से पैसा बाज़ार में उतारना पड़ सकता है।
▪️शेयर बाज़ार पर सीधा दबाव — विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली का मतलब है शेयर बाज़ार में उतार-चढ़ाव और सूचकांकों पर दबाव, जिसका असर छोटे निवेशकों की जेब पर भी पड़ता है।
▪️ब्याज दरों पर असर — विदेशी निवेशकों को वापस लुभाने के लिए RBI को ब्याज दरें ऊंची रखने का दबाव झेलना पड़ सकता है, जिसका मतलब है — होम लोन, कार लोन सस्ते होने की उम्मीद फिलहाल धूमिल।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि भरोसे का सवाल है — और शेयर बाज़ार से निकला यह पैसा आने वाले महीनों में रुपये और आम आदमी की जेब, दोनों पर सबसे पहले और सबसे तेज़ असर डाल सकता है।











