रायपुर। ‘मैं सूदखोरों से परेशान हूं… अब और नहीं सह सकती’…
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की मौदहापारा निवासी रजिया बेगम (Razia Begum) के हाथ से लिखे इस नोट की शुरुआत ही राजधानी में चल रहे कथित सूदखोरी के उस खेल की तरफ इशारा करती है, जिसमें जरूरत के वक्त कुछ हजार या कुछ लाख रुपये लेने वाला व्यक्ति बाद में ब्याज के ऐसे जाल में फंस जाता है कि मूल रकम चुकाने के बाद भी हिसाब खत्म नहीं होता।
रजिया ने कथित तौर पर कई लोगों से लिए गए कर्ज, ब्याज और लेन-देन का हिसाब अपनी कॉपी में लिखा। फिर जहर खाकर जान देने की कोशिश कर ली। गंभीर हालत में उसका मेकाहारा में इलाज चल रहा है। परिजनों का आरोप है कि कई साल तक ब्याज चुकाने और करीब 6 तोला सोना देने के बावजूद उस पर पैसों के लिए दबाव बनाया जा रहा था।
उसके लिखे नोट में शहजादा, आमीन, गुड्डन दादी और पापा भाई समेत कुछ अन्य नामों का जिक्र बताया जा रहा है। इन नामों के पीछे की वास्तविक भूमिका पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
डीसीपी सेंट्रल तारकेश्वर पटेल ने कहा कि रजिया बेगम की शिकायत पर पुलिस जांच कर रही है। एफआईआर दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
करीब तीन हफ्ते पहले रायपुर के ही संजय नगर में एक मकान में पांच लोगों की लाश मिलने से हड़कंप मच गया था।
शुरुआती जांच में यह पता चला कि परिवार के मुखिया साजिद अली ने पहले अपनी पत्नी और 3 बच्चों को जहरीला पदार्थ दिया, जिसके बाद खुद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
इस घटना के पीछे भी सूदखोरी से परेशान होने की बात सामने आई, लेकिन अभी तक पुलिस जांच में इसकी पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस एफएसएल रिपोर्ट का इंतजार कर रही है।
ऐसे फंसते है सूदखोरों के चंगुल में
रजिया के मामले में पुलिस जांच कर उन सूदखोरों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, लेकिन रजिया की कहानी सूदखोर से परेशान सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है। यह सवाल है कि रायपुर की गलियों में आखिर ब्याज का ऐसा कौन सा नेटवर्क चल रहा है, जिसमें जरूरतमंद एक बार पैसा लेने के बाद निकल नहीं पाता?
अक्सर यह देखने और सुनने में आता है कि रकम छोटी होती है, लेकिन ब्याज का हिसाब कभी छोटा नहीं होता।
शहर की घनी बस्तियों में सूदखोरी का तरीका अक्सर बेहद साधारण नजर आता है।
किसी को अचानक घर में बीमारी के इलाज के लिए पैसे चाहिए। किसी मजदूर को गांव पैसा भेजना है। किसी छोटे दुकानदार को माल खरीदना है। किसी परिवार को बेटी की शादी करनी है। बैंक से तत्काल लोन नहीं मिलता, दस्तावेज पूरे नहीं हैं या बैंक तक पहुंच नहीं है।
ऐसे में आसपास मौजूद एक व्यक्ति कहता है
‘पैसे चाहिए तो ले जाओ… महीने का ब्याज दे देना।’
जरूरतमंद पैसा ले लेता है।
इसके बाद शुरू होता है असली खेल।
हर महीने ब्याज पहुंचता है। कई बार ब्याज इतना ज्यादा होता है कि कमाई का बड़ा हिस्सा वहीं चला जाता है। मूल रकम जस की तस बनी रहती है।
एक समय ऐसा आता है कि कर्जदार मूल रकम से कई गुना ज्यादा ब्याज अदा कर चुका होता है, लेकिन साहूकार की डायरी में कर्ज खत्म नहीं होता।
यही वह चक्र है, जिससे निकलना सबसे मुश्किल होता है।
रायपुर में सूदखोरी का सबसे चर्चित नाम ‘तोमर बंधु‘
रायपुर में अवैध सूदखोरी की बात हो और तोमर बंधुओं का नाम सामने न आए, ऐसा संभव नहीं है। रोहित तोमर और वीरेंद्र सिंह तोमर उर्फ रूबी तोमर के पिछले वर्षों में सूदखोरी, जबरन वसूली, धमकी और ब्लैकमेलिंग से जुड़े कई मामले सामने आए हैं।
पुलिस कार्रवाई में उनके ठिकानों से बड़ी मात्रा में नकदी, सोना, संपत्ति के दस्तावेज और अन्य सामान जब्त किए जाने की खबरें भी सामने आईं।
एक मामले में पुलिस के सामने आए शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि कर्ज के बदले उससे चेक और स्टांप पेपर लिए गए और रकम वसूली के लिए धमकाया गया।
एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस के सामने आए एक मामले में 5 लाख रुपये के कर्ज के बदले 30 लाख रुपये वसूलने और जमीन हड़पने के आरोप भी सामने आए थे।
तोमर बंधुओं के भाटागांव स्थित कथित कार्यालय पर जुलाई 2025 में नगर निगम की कार्रवाई और बुलडोजर चलाने की खबर भी सामने आई थी।
वीरेंद्र उर्फ रूबी तोमर को नवंबर 2025 में ग्वालियर से गिरफ्तार किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी, जबकि रोहित तोमर के खिलाफ भी पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी की खबरें प्रकाशित हुई हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप और अदालत में दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं।
मजदूर, छोटे दुकानदार से लेकर रेलवे कर्मचारी भी इस जाल में
सूदखोरी का दिहाड़ी मजदूर, ऑटो चालक, छोटे दुकानदार, कारखाने में काम करने वाले कर्मचारी और कम आय वाले परिवार जरूरत के वक्त ऐसे कर्ज में फंस जाते हैं।
मान लीजिए उसने 20 या 30 हजार रुपये लिए। हर सप्ताह या महीने ब्याज देना शुरू कर दिया। मजदूरी से घर का खर्च निकले या ब्याज दिया जाए- यह सवाल सामने खड़ा हो जाता है।
कई बार पुराने ब्याज को चुकाने के लिए नया कर्ज लिया जाता है।
एक सूदखोर का कर्ज चुकाने के लिए दूसरे से पैसा। फिर दूसरे का ब्याज चुकाने के लिए तीसरे से कर्ज। और देखते ही देखते छोटा सा कर्ज परिवार की कई साल की कमाई को निगलने लगता है।
रायपुर की घनी आबादी वाले इलाकों में ब्याज पर पैसे देने का यह नेटवर्क किसी एक मोहल्ले तक सीमित होने का दावा नहीं किया जा सकता। अलग-अलग इलाकों से समय-समय पर ऐसे आरोप और शिकायतें सामने आती रही हैं।
रेलवे कॉलोनियों और कर्मचारियों के बीच भी कर्ज और ब्याज को लेकर विवादों की घटनाएं सामने आती रही हैं।








