एक जापानी नेता का गुस्सा भारतीय रेल के बदले हुए मालिकों के बारे में क्या बताता है

पिछले सप्ताह जापान के पूर्व मंत्री हिदेकी माकिहारा ने एक टिप्पणी लिखी, जिसे लगभग पंद्रह लाख लोगों ने पढ़ा। उसमें उन्होंने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर भारतीय पक्ष पर ‘बेहद लापरवाही’, ‘वादे न निभाने’ और ‘पूरी तरह भारतीय पक्ष की वजह से हुई देरी’ जैसे आरोप लगाए।

भारत में इस पर प्रतिक्रियाएं हमेशा की तरह दो ध्रुवों में बंट गईं। एक तरफ आहत राष्ट्रवाद था, दूसरी ओर भारत की विफलता पर प्रसन्न होने वाले आलोचक। लेकिन दोनों ही उस असली बात को समझने से चूक गए, जिसे माकिहारा का यह गुस्सा उजागर करता है।

कर्ज और वित्तीय प्रतिबद्धताओं के मामले में माकिहारा गलत हैं। भारत ने छह दशकों से जापानी येन ऋणों की अदायगी में कभी एक भी किस्त नहीं चूकी। दिल्ली मेट्रो और पश्चिमी समर्पित मालवाहक गलियारे (Western Freight Corridor) जैसी जापान की वैश्विक प्रतिष्ठा वाली परियोजनाएं भी भारत ने सफलतापूर्वक पूरी कीं।

लेकिन वह एक ऐसी बात पर सही हैं, जिसका उन्होंने स्वयं उल्लेख नहीं किया।

भारत ने अनुबंध का पालन तो किया, लेकिन समझौते की आत्मा को धीरे-धीरे बदल दिया। उसने जापान से 0.1 प्रतिशत ब्याज वाला सस्ता ऋण लिया, ऊंचा एलिवेटेड ट्रैक (गाइडवे) बना दिया, लेकिन परियोजना के लगभग हर उस हिस्से को बदलना शुरू कर दिया, जो इसे वास्तव में “जापानी” बनाता था। जापानी ट्रेनसेट्स को भविष्य के लिए टाल दिया गया और उनकी जगह बीईएमएल-आईसीएफ द्वारा विकसित एक अभी तक अप्रयुक्त ट्रेन को प्राथमिकता दी गई। सिग्नलिंग प्रणाली को यूरोपीय मानकों की ओर मोड़ दिया गया और परिचालन दर्शन (ऑपरेटिंग फिलॉसफी) का भी धीरे-धीरे भारतीयकरण कर दिया गया।

परिणाम यह हुआ कि जापान ने घाटे में वित्तपोषित एक ऐसे कॉरिडोर का निर्माण कराया, जिस पर अंततः भारतीय ट्रेनें और संभवतः सीमेंस की इलेक्ट्रॉनिक्स प्रणाली चल सकती है।

कानूनी रूप से इसे अनुबंध का उल्लंघन नहीं कहा जाएगा। लेकिन कोई भी अनुभवी वार्ताकार इसे सद्भावना (Good Faith) नहीं मानेगा।

फिर भी इससे बड़ा विश्वासघात वह नहीं है, जो भारत ने जापान के साथ किया। उससे बड़ा विश्वासघात भारत ने स्वयं अपने रेल तंत्र के साथ किया। और यह केवल तब दिखाई देता है, जब पिछले बारह वर्षों की बुलेट ट्रेन परियोजना को उन्हीं बारह वर्षों में आम भारतीयों की रेलवे के साथ हुए व्यवहार के समानांतर रखकर देखा जाए।

पहले यह देखें कि इन बारह वर्षों में क्या बनाया गया।

इंजीनियरिंग की उपलब्धि वास्तविक है और इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। 352 किलोमीटर का एलिवेटेड मार्ग तैयार हो चुका है। महाराष्ट्र में भूमि अधिग्रहण का चार वर्षों तक चला संघर्ष समाप्त हो चुका है। परियोजना का पहला चरण 15 अगस्त 2027 को शुरू होगा—वही दिन, जो मूल रूप से 2022 में उद्घाटन के लिए तय किया गया था।

भारतीय कंपनियों ने विशाल स्पैन लॉन्चिंग जैसी अत्याधुनिक निर्माण तकनीक में महारत हासिल की। पंद्रह भू-तकनीकी प्रयोगशालाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक उन्नत किया गया। ट्रैक इंजीनियरों की एक नई पीढ़ी जापानी स्लैब ट्रैक तकनीक में प्रशिक्षित हुई।

भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि वह शिंकान्सेन जैसी तकनीक के अनुरूप बुनियादी ढांचा बना सकता है।

लेकिन उसने वह नहीं बनाया, जो वास्तव में किसी भी हाई-स्पीड रेल व्यवस्था की आत्मा होता है।
दुनिया के हर उस देश ने, जिसने सफल हाई-स्पीड रेल प्रणाली विकसित की, पहले या साथ-साथ एक मजबूत संस्थागत ढांचा तैयार किया।

जापान में शिंकान्सेन का जन्म रेलवे टेक्निकल रिसर्च इंस्टीट्यूट से हुआ, जहां विमान उद्योग से आए इंजीनियरों ने पहली ट्रेन चलने से पहले लगभग एक दशक तक कंपन (वाइब्रेशन) और अन्य मूलभूत तकनीकों पर शोध किया।

चीन ने विदेशी तकनीक खरीदी, लेकिन अनुबंधों के माध्यम से उसे सरकारी कारखानों और अनुसंधान प्रयोगशालाओं में स्थानांतरित कराया, जहां हजारों इंजीनियरों ने उस तकनीक को आत्मसात किया।
दक्षिण कोरिया ने भी केटीएक्स परियोजना के माध्यम से विदेशी तकनीक को एक दशक के भीतर स्वदेशी कार्यक्रम में बदल दिया।

हर जगह एक ही सिद्धांत लागू हुआ—तकनीक का हस्तांतरण केवल खरीद से नहीं होता, बल्कि उसे आत्मसात करने वाली संस्थाएं भी चाहिए होती हैं।

भारत ने इस क्रम को उलट दिया।

जापानी ट्रेनसेट्स को महंगा बताकर खरीदने से इनकार कर दिया गया। परिणामस्वरूप ट्रैक्शन सिस्टम, बोगी, ट्रेन कंट्रोल जैसी मूलभूत तकनीकों का वास्तविक हस्तांतरण कभी अनुबंध का हिस्सा ही नहीं बन पाया।

साथ ही भारत ने ऐसी कोई संस्था भी नहीं बनाई, जो उपलब्ध तकनीकी ज्ञान को शोध और डिजाइन क्षमता में बदल सके।

बारह वर्षों तक दिल्ली में जापानी विशेषज्ञ मौजूद रहे, लेकिन उन्होंने भारतीय इंजीनियरों को केवल उस प्रणाली का उपयोग करना सिखाया, उसका निर्माण या विकास करना नहीं।

आईआईटी में स्थापित शोध केंद्र केवल नाममात्र की अकादमिक कुर्सियां बनकर रह गए। न पर्याप्त बजट मिला, न उन्हें किसी औद्योगिक परियोजना से जोड़ा गया।

आरडीएसओ (Research Designs and Standards Organisation) आज भी वैसा ही है जैसा पिछले पचास वर्षों से था—एक मानक निर्धारित करने वाला नौकरशाही संगठन, न कि वास्तविक अनुसंधान संस्था। बिबेक देबरॉय समिति द्वारा सुझाए गए स्वतंत्र शोध संगठन का प्रस्ताव भी फाइलों में दबकर रह गया।

रेल आधुनिकीकरण का पूरा ढांचा विशेष प्रयोजन कंपनियों (SPVs)—जैसे NHSRCL, DFCCIL, NCRTC और विभिन्न मेट्रो निगमों—पर आधारित रहा। इन्हें रेलवे बोर्ड की जड़ता से बचने के लिए बनाया गया। प्रत्येक के पास अपना विदेशी वित्तपोषक और अलग तकनीकी ढांचा था। परियोजना पूरी होने के बाद उनका काम समाप्त हो जाता है।

लेकिन ऐसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं बनाई गई, जिसका कार्य इन सभी परियोजनाओं से मिली तकनीकी सीख को संजोना और आगे बढ़ाना होता।

विशेष प्रयोजन कंपनियों (SPVs) का मॉडल परियोजनाएं तो पूरी कर देता है, लेकिन सीखने की प्रक्रिया को बीच में ही काट देता है।

वंदे भारत ट्रेन इसकी सबसे स्पष्ट मिसाल है।

1988 में भोपाल शताब्दी 150 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलती थी।

आज वंदे भारत की अधिकतम गति 160 किलोमीटर प्रति घंटा है—पैंतीस वर्षों में केवल 10 किलोमीटर प्रति घंटे की वृद्धि।

कई मार्गों पर इसकी औसत व्यावसायिक गति तो उन शताब्दी ट्रेनों से भी कम है, जिन्हें उसने प्रतिस्थापित किया है।

समस्या ट्रेन में कभी थी ही नहीं। समस्या ट्रैक में थी।

पुरानी रेल लाइनों पर गति बढ़ाने के लिए फेंसिंग, लेवल क्रॉसिंग समाप्त करने और आधुनिक सिग्नलिंग जैसी धीमी लेकिन स्थायी प्रक्रियाओं की आवश्यकता थी। इनसे कोई आकर्षक उद्घाटन समारोह नहीं होता।

मालवाहक कॉरिडोर इसी उद्देश्य से बनाए गए थे कि मुख्य लाइनों पर यात्री ट्रेनों की गति बढ़ाई जा सके।
मालगाड़ियां तो उन कॉरिडोरों पर चली गईं, लेकिन यात्रियों को उसका लाभ कभी नहीं मिला।

प्रणाली ने उस हिस्से को प्राथमिकता दी, जिसकी घोषणा की जा सकती थी—नई ट्रेनें, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से झंडी दिखाना, मीडिया कवरेज—और उस बुनियादी ढांचे को पीछे छोड़ दिया, जो कैमरे में अच्छा नहीं दिखता।

यह अक्षमता नहीं थी।

यह एक सुनियोजित प्राथमिकता थी।

इस प्राथमिकता का एक वर्गीय चरित्र भी है।

रेल मंत्रालय, जो कभी गठबंधन राजनीति का सबसे प्रभावशाली मंत्रालय हुआ करता था—लालू प्रसाद यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं की राजनीतिक शक्ति का केंद्र—उसे धीरे-धीरे महत्वहीन बना दिया गया।

2017 में 92 वर्ष पुरानी अलग रेल बजट की परंपरा समाप्त कर दी गई। इससे संसद में वह वार्षिक अवसर भी समाप्त हो गया, जब रेलवे को एक सामाजिक संस्था के रूप में अपने कामकाज का हिसाब देना पड़ता था।

रेल मंत्रालय अब ऐसे तकनीकी प्रशासकों के पास रहने लगा, जो इसके साथ अन्य मंत्रालय भी संभालते हैं।

जो बदलाव ऊपर से राजनीति से दूरी जैसा दिखता है, वह वास्तव में रेलवे की भूमिका का पुनर्निर्धारण था।रेलवे अब गरीबों और क्षेत्रों में रोजगार तथा सुविधाओं के वितरण का माध्यम नहीं रही। वह सत्ता की छवि निर्माण का माध्यम बन गई।

इसका सबसे बड़ा नुकसान गरीबों को मिलने वाले रोजगार पर पड़ा। रेलवे की भर्तियां इतनी सीमित कर दी गईं कि बिहार जैसे राज्यों में युवाओं के हिंसक प्रदर्शन तक हुए।

फिर महामारी ने इस बदलाव को स्थायी रूप दे दिया।

रेलवे के इतिहास में पहली बार पूरे नेटवर्क को पूरी तरह बंद कर दिया गया—जबकि यह व्यवस्था युद्धों, विभाजन और आपातकाल के दौरान भी चलती रही थी।

मालगाड़ियां कभी नहीं रुकीं।

प्रवासी मजदूरों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें तब शुरू हुईं, जब पैदल पलायन राष्ट्रीय शर्म बन चुका था, और उन ट्रेनों में भी किराया लिया गया।

हवाई सेवाएं पहले बहाल हुईं, जबकि सामान्य यात्री रेल सेवाएं लगभग दो वर्षों तक “स्पेशल ट्रेन” के नाम पर अतिरिक्त किराए के साथ चलती रहीं।

मार्च 2020 में अस्थायी रूप से बंद की गई वरिष्ठ नागरिक किराया छूट आज तक बहाल नहीं हुई। इससे हर वर्ष लगभग दो हजार करोड़ रुपये उन लोगों से वसूले जाते हैं, जो इसका सबसे कम विरोध कर सकते हैं।

आपातकालीन परिस्थितियों की आड़ में सामान्य और स्लीपर डिब्बों की संख्या कम होती गई, जबकि एसी डिब्बे बढ़ते गए।

इसका परिणाम हर त्योहार पर एक जैसा दिखाई देता है—अनारक्षित डिब्बों में ठसाठस भीड़ और प्रीमियम ट्रेनों के महंगे एसी डिब्बों में खाली बर्थ।

इस नई व्यवस्था का सबसे स्पष्ट उदाहरण छत्तीसगढ़ है।

2022 में रेलवे ने कोयला ढुलाई को प्राथमिकता देने के लिए पूरे देश में 753 यात्री ट्रेनों के फेरे रद्द किए, जिनमें सबसे अधिक दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे क्षेत्र की ट्रेनें थीं।

एक अधिकारी ने कहा कि केवल “गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों” की ट्रेनों को रद्द किया गया है।

गरीबों की रेल सेवाओं के लिए इससे अधिक अपमानजनक परिभाषा शायद ही हो सकती है।

आपातकाल समाप्त हो गया, लेकिन ट्रेनों की कटौती समाप्त नहीं हुई।

पिछले पांच वर्षों से कोरबा-बिलासपुर क्षेत्र में ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर कार्य’ के नाम पर यात्री और मेमू सेवाएं महीनों तक बंद रहती हैं, जबकि एसईसीएल और हसदेव क्षेत्र से निकलने वाला कोयला लगातार चलता रहता है।
ऐसा होना आवश्यक नहीं था।

यदि मालवाहक कॉरिडोर समय पर पूरे किए गए होते, तो कोयले और यात्री ट्रेनों के बीच यह टकराव पैदा ही नहीं होता।

लेकिन निर्णय हर दिन एक ही दिशा में लिया गया—खनन उद्योग के पक्ष में।

जिस व्यवस्था ने आदिवासी की ट्रेन रद्द की, वही व्यवस्था उसके जंगल को भी कोयला खनन के लिए साफ कर रही है।

जब इन बारह वर्षों का पूरा लेखा-जोखा सामने रखा जाता है, तो तस्वीर स्पष्ट हो जाती है।

एक तरफ ऐसा राज्य है, जो जापानी ऋण से विश्वस्तरीय बुलेट ट्रेन कॉरिडोर बना सकता है, दो प्रधानमंत्रियों की संयुक्त यात्रा का भव्य आयोजन कर सकता है और उद्घाटन को स्वतंत्रता दिवस जैसे प्रतीकात्मक अवसर से जोड़ सकता है।

दूसरी ओर वही राज्य एक राष्ट्रीय रेल अनुसंधान संस्थान नहीं बना पाया, वरिष्ठ नागरिकों की रियायत बहाल नहीं कर पाया, प्रस्तावित सात मालवाहक गलियारों में से दूसरे किसी एक को भी मंजूरी नहीं दिला पाया और कोरबा स्टेशन पर यात्री ट्रेन उपलब्ध नहीं करा पाया।

इन सबके पीछे एक ही सिद्धांत काम करता है— उन सभी चीज़ों के प्रति उपेक्षा, जो धीरे-धीरे विकसित होती हैं और कैमरे पर प्रभावशाली नहीं दिखतीं—संस्थाएं, रेल पटरियों का स्थायी विकास, अनारक्षित यात्री और ऋणदाता का विश्वास।

जापान के साथ संबंधों की कहानी भी अंततः इसी तर्क पर समाप्त होती है।

भारत ने साझेदारी को केवल एक लेन-देन की तरह चलाया।

ट्रेनसेट्स पर कुछ हजार करोड़ रुपये बचा लिए गए—जो पूरी परियोजना लागत का शायद दो प्रतिशत भी नहीं थे।

लेकिन इसके बदले भारत ने अपने सबसे धैर्यवान और विश्वसनीय ऋणदाता की सद्भावना खो दी।

उसकी वास्तविक कीमत आने वाले हर रेल कॉरिडोर, सेमीकंडक्टर संयंत्र और भविष्य की तकनीकी साझेदारियों में चुकानी पड़ सकती है।

बुलेट ट्रेन अवश्य चलेगी।

और अपने तरीके से वह निश्चित ही शानदार होगी।

लेकिन रेलवे, ठीक एक गणराज्य की तरह, केवल उद्घाटन समारोहों का नाम नहीं है।

वह उन शांत, स्थायी और साधारण संस्थाओं का नाम है, जो चमकदार परियोजनाओं से उत्पन्न ज्ञान, विश्वास और क्षमता को संभालकर आगे बढ़ाती हैं।

और बारह वर्षों के बाद भी, भारत ने वह पात्र (वेसल) कभी बनाया ही नहीं।

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