लेंस डेस्क। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया गया है, जिसमें एक मुस्लिम जोड़े के आपसी सहमति से हुए तलाक को मान्यता नहीं दी गई थी।
यह मामला एक सुन्नी मुस्लिम दंपत्ति का है। जिनकी शादी फरवरी 2022 में हुई थी, लेकिन स्वभाव न मिलने और मतभेदों के कारण दोनों अलग होना चाहते थे। पति ने 2024 में तीन अलग-अलग मौकों पर तलाक की घोषणा की, जिसे पत्नी ने स्वीकार कर लिया। बाद में दोनों ने 500 रुपये के स्टांप पेपर पर लिखित समझौता किया, जिसे ‘मुबारत’ कहते हैं। यह आपसी सहमति से तलाक का एक तरीका है।
पत्नी ने फैमिली कोर्ट में अपनी वैवाहिक स्थिति साफ करने के लिए याचिका दाखिल की। लेकिन फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2025 में याचिका खारिज कर दी। उसका कहना था कि तलाक के समय दो पुरुष गवाह मौजूद नहीं थे, इसलिए तलाक वैध नहीं है। साथ ही क्रूरता साबित नहीं हुई।
पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की बेंच ने फैमिली कोर्ट का फैसला गलत बताया। हाईकोर्ट ने कहा कि सुन्नी मुस्लिम कानून में तलाक (चाहे मौखिक हो या लिखित) के लिए दो गवाहों की जरूरत अनिवार्य नहीं है। यह शर्त शिया मुस्लिम कानून में होती है, सुन्नी में नहीं।
‘मुबारत’ मुस्लिम कानून और डिसॉल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 के तहत पूरी तरह वैध आधार है।
दोनों पति-पत्नी अदालत में कह चुके हैं कि वे सहमत हैं और तलाक स्वेच्छा से हुआ है, बिना किसी दबाव के। फिर भी फैमिली कोर्ट ने तकनीकी आधार पर इनकार किया, जो गलत है।
कोर्ट ने पुरानी कहावत का जिक्र किया – “मियां बीवी राजी, नहीं मान रहा काजी” – यानी पति-पत्नी सहमत हैं, लेकिन जज नहीं मान रहा। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और घोषणा की कि दोनों का विवाह खत्म हो चुका है।
कोर्ट ने यह भी देखा कि राजस्थान की कई फैमिली कोर्ट्स ऐसी याचिकाओं को इसी तरह खारिज कर रही हैं। इसलिए सभी फैमिली कोर्ट्स के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए। जिसमें कहा कि अगर याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम कानून के तहत बाहर अदालत से तलाक हो चुका है, तो दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर उनके बयान लेने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि तलाक बिना दबाव के हुआ है।
अगर तलाक लिखित रूप में है (जैसे मुबारतनामा या तलाकनामा), तो वह दस्तावेज कोर्ट में दिखाना चाहिए। सब कुछ ठीक लगने पर कोर्ट को तलाक मान्य मानकर विवाह खत्म होने की घोषणा करनी चाहिए।








