प्रधानमंत्री को विपक्ष के नेता के सवालों का जवाब देना चाहिए

February 3, 2026 9:28 PM
Rahul Gandhi

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लगातार दो दिनों से लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को जिस तरह से बोलने से रोका गया है, वह अभूतपूर्व होने के साथ ही संसदीय गरिमा के खिलाफ है। यही नहीं, राहुल गांधी ने अमेरिका के साथ हुए टैरिफ समझौते को लेकर सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर देश के हितों के साथ समझौता करने के गंभीर आरोप लगाए हैं, उस पर स्थिति साफ होना जरूरी है।

राहुल पूर्व जनरल प्रमुख एम एम नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के कारवां पत्रिका में प्रकाशित अंश का जिक्र करना चाहते थे, जिसमें 2020 में गलवान में भारत-चीन टकराव के समय के कुछ घटनाक्रम का उल्लेख है। इसमें प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को लेकर भी कुछ बातें कही गई हैं।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने व्यवस्था दी कि राहुल अप्रकाशित किताब के अंश नहीं पढ़ सकते। जबकि संसदीय चर्चा के दौरान किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों में प्रकाशित सामग्रियों के संदर्भ दिए जाने के ढेरों उदाहरण मौजूद हैं। इनमें से तो एक उदाहरण प्रधानमंत्री मोदी से ही संबंधित है, जब वह खुद अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति कैनेडी से संबंधित किसी किताब का जिक्र करते हैं।

यही नहीं, जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के कारवां में प्रकाशित अंश तो सार्वजनिक मंचों पर उपबल्ध हैं ही!

लोकसभा अध्यक्ष बिरला के मुताबिक भारत और चीन से संबंधित जिस वाकये का जिक्र राहुल करना चाहते हैं, उसका संबंध राष्ट्रपति के अभिभाषण से नहीं है। राहुल का कहना है कि वह राष्ट्रपति के अभिभाषण से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर ही बोल रहे हैं।

आखिरकार भारी शोर-शराबे के बीच राहुल को बोलने की इजाजत न देकर लोकसभा आसंदी ने दूसरे सांसदों को आमंत्रित किया, लेकिन जिस तरह से सपा, द्रमुक और टीएमसी के सांसदों ने राहुल के साथ एकजुटता दिखाते हुए भाषण से इनकार किया, उसने वाकई सत्ता पक्ष को असहज कर दिया होगा। शोर-शराबे के बीच कांग्रेस के आठ सांसदों को सदन के भीतर कुछ परचे वगैरह फाड़ने का कारण निलंबित भी कर दिया गया है।

दरअसल यह पूरा घटनाक्रम मोदी सरकार की कमजोरी को ही उजागर करता है, और साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गहराते अविश्वास को भी। भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छी स्थिति नहीं है।

राहुल का दावा है कि जनरल नरवणे से बड़ा मुद्दा अमेरिका के साथ कल अचानक हुए ट्रेड समझौते और अमेरिकी फाइनेंसर रहे यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन से जुड़ी विवादास्पद फाइलों से जुड़ा है। राहुल ने सवाल किया है कि जो टैरिफ समझौता चार महीने तक लटका हुआ था, उस पर अचानक कल कैसे मुहर लग गई? यही नहीं, उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर गंभीर आरोप लगाया है कि उन्हें उद्योगपति गौतम अडानी को अमेरिका में चल रही कानूनी कार्रवाई के दबाव में इस बेमेल समझौते के लिए मजबूर किया गया?

इसके साथ ही राहुल ने एपस्टीन फाइल का हवाला देकर सीधे प्रधानमंत्री मोदी को घेरा है और कहा है कि अभी इसमें और सामग्री आनी बाकी है। इन फाइलों में कथित रूप से प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी तथा उद्योगपित अनिल अंबानी के नाम सामने आए हैं, जो बेहद गंभीर मामला है।

यह सवाल तो वाजिब है ही कि ऐसे समय जब संसद में विपक्ष और सरकार के बीच भीषण टकराव चल रहा है, जो सौदा कई महीनों से अटका पड़ा था, उसका ऐलान अचानक कैसे हो गया?

क्या यह सच नहीं है कि इसका ऐलान ऐसे समय हुआ है जब प्रधानमंत्री के करीबी माने जाने वाले गौतम अडानी के खिलाफ अमेरिकी में कानूनी कार्रवाई चल रही है?

राहुल गांधी संवैधानिक पद पर हैं और उन्होंने संसद के भीतर और उसके परिसर से प्रधानमंत्री मोदी पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उसका जवाब तो दिया ही जाना चाहिए, क्योंकि यह संसदीय परंपराओं के तकाजे के साथ ही देश की संप्रभुता और साख का सवाल है।

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