अनहोनी की आशंका मई महीने की 27 तारीख से मंडराने लगी थी जब उन्हें रायपुर एम्स में लाया गया था। लगभग सवा दो महीने गुजारने के बाद अंततः उनका ‘जीवन अध्याय’ समाप्त हो गया। इसी के साथ वह सवाल भी सामने आ खड़ा हुआ कि ‘तीजन बाई के बाद पंडवानी’ को यह प्रदेश कैसे अपने सर्वांग में देख पाएगा। यद्यपि उनकी शारीरिक अवस्था जिन व्याधियों से घिर गई थी उसमें स्वस्थ आदमी भी हार मान लेता है। फिर वे तो उम्रगत चुनौतियों से घिर चुकी थीं ! अंततः सिमटटी हुई देह ने जैसे — ‘भोले बाबा ला परनाम गंगा मइया ला परनाम’ कहते हुए लौकिक मंच से विदा ले ही ली।
कहने को तो इस राज्य की, लेकिन देश – दुनिया में फैली सांस्कृतिक बिरादरी की अपनी तीजन बाई का निधन संपूर्ण कला जगत के लिए और प्रदेश की खातिर गहरी उदासी दे गया है। आमतौर पर किसी भी लोकप्रिय शख्सियत के लिए जैसा कि सामान्यतः होता है प्रतिक्रियाओं, संवेदनाओं की आवाजाही दिखाया देती है। फिर वे तो शिखर पर विराजित व्यक्तित्व थीं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनका समरण किया। तीजन बाई को लेकर जितना विचार करें वे अपने प्रसंगों के वैभव की तरह विस्तारित होती दिखाई देती हैं। उनपर आई डॉक्यूमेंट्री और किताब ( लेखक – निरंजन महावर) का तो मैं स्वयं साक्षी हूँ। जो उन्हें कुछ अतिरिक्त गहराई से हमारे सामने स्थापित करते हैं।
बीती रात सहसा नींद खुलने पर देखा कि मानसून की भीषण बारिश जारी है। सुबह से कुछ पहले का प्रहर रहा होगा। आदतन मोबाइल की ओर हाथ बढ़ गया। स्क्रीन की लाइट चमकी तो स्क्रॉल करने पर पहली जानकारी तीजन बाई को लेकर सामने उभरी। उनके जाने की सूचना देती हुई उस फोटो क्लिप ने एक बारगी तेज़ बारिश की गर्जना और रह-रह कर कौंधती बिजली की गड़गड़ाहट के डरावने स्वरों को भुला दिया। इधर यही कोई सप्ताह भर पहले उनके मानस पुत्र से पता लग चुका था कि ‘वह दारुण समाचार’ कभी भी आ सकता है! और आज वे चली गईं।
तीजन बाई के जाने की सूचना ने मन विचलित तो किया, लेकिन कहीं भीतर से एक आवाज़ भी अपनी मद्धम स्वरावली में बारम्बार सुनाई दी कि अन्ततः उन्हें कष्ट से मुक्ति मिल गई। वैसे भी भारतीय मानस अपने किसी भी आत्मीय जन की परेशानी और शारीरिक कष्टों को आत्मसात कर उनके प्रति प्रगतिशील दृष्टिकोण नहीं अपना पाता। जबकि ऐसे लोग जिनका समूचा जीवन प्रशंसा, सराहना या प्रकाश की परिधि में झूलता रहा हो उनके लिए एकाएक सब कुछ थम जाना सबसे अधिक कष्ट प्रद होता है। फिर वे तो दुनिया की आवाजाही करने वाली महिला थीं। याद है उनसे उनके ही घर में उनके जन्म दिन के दिन यह सुनना कि –“अब मोर जीए के मन नईए!” अपनी शारीरिक सीमाओं के समक्ष हार मान लेने का संकेत जैसा सुनाई दिया था। लेकिन जब हमने घंटों बैठकर बातें की तो उनके चेहरे की चमक लौट आई थीं।
भले अब वे नहीं हैं पर उनका जीवन और उनके गाए वे तमाम प्रसंग हैं जिनके प्रस्तुतीकरण से शास्त्रीय और लोक, दोनों दर्शकों के मन में वे अपनी पकड़ बना लेती थीं। इस दिग्गज की अनुपस्थिति तो शाश्वत है। वह स्थान खाली रहेगा ही, अलबत्ता संतोष इस बात का रहेगा कि वे एक बढ़िया जीवन गुजारकर गई हैं। उन्होंने कलात्मक समाज को बहुत कुछ दिया और देश ने भी उन्हें उनके कद के मुताबिक भरपूर दिया। लोक विधाओं के साधकों का रिकॉर्ड खंगाल लें तो पता लगेगा कि भारत के तीनों सर्वोच्च नागरिक अलंकरण से वे सम्मानित हो चुकी थीं। जबकि तीनों पद्म अलंकरण प्रायः शास्त्रीय संगीत के साधकों को मिलते देखे गए हैं। आकाशवाणी की टॉप ग्रेड थीं। अक्षर ज्ञान से आजीवन अनभिज्ञ रहीं तो क्या एकाधिक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डी-लिट प्रदान की थीं। अपने लिए किए जा रहे किसी संबोधन में जब “डॉ. तीजन बाई” यह जुमला सुनती तो मुस्कुरा दिया करती थीं।
कितनी यादें, कितनी मुलाकातें और साथ बिताए हुए चंद मूल्यवान पल। बिताई हुई स्मृतियों का सघन कुंज दिखाई देने लगा है। घर में, भोपाल में और यत्र – तत्र। सवाल-जवाब भी। उनकी मिठास भी देखी और मालवा उत्सव, इंदौर में उनका अपने पति के साथ वह रौद्र रूप भी देखा। ‘तीजन बाई पंडवानी की एक असाधारण कलाकार थीं!’ उनका ऐसा परिचय उनके संबंध में बेशक एक सामान्यीकरण होगा। दरअसल वे अपने इस हुनर के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ थीं। पाकिस्तान की रेशमा और हमारी अपनी तीजन बाई में एक साम्यता दिखाई देती हैं। दोनों खानाबदोश समाज की उपज। दोनों ही दुनियावी ज्ञान से परे लेकिन अपने हुनर की बदौलत जग जीत लेने वाली रहीं। दोनों का गला उनकी पहचान बना।
आज सक्षम समाज भी सुविधाओं से लैस होने के बावजूद अवसरों का रोना रोता है। लेकिन तीजन भाई के दौर को आत्मसात करें तो पता लगेगा कि उसके समय तो परिस्थितियां और भी विपरीत थीं । मात्र तेरह वर्ष की आयु होती क्या है लेकिन उस उम्र में भी उन्होंने अपने भावी जीवन की दिशा का एक संकेत दे दिया था।गौर करें कि तीजनबाई के पहले भी पंडवानी अपने गोंडवानी के रूप में गाती और सुनी जाती रही है। प्रायः परधान , देवार समुदाय या फ़िर पारधियों में इसके कथा रूप, आख्यान परक गायिकी के रूप में चलन में रहे हैं। यह अलग बात रही कि उनके पेशकश के ढंग में वैसी स्फूर्ति, जीवंतता और चुंबकीय बाना नहीं रहा जिसका आरम्भ तीजन बाई ने किया। तीजन बाई पारधी समुदाय से आती थीं। अपने नाना बृजलाल से उन्होंने इसके सूत्र पाए और उन्होंने ही तीजन में ‘ वह देखा’ जिसे बाद में दुनिया ने देखा।
आज एक बात और गौर की जानी चाहिए कि तीजन की विश्व पताका फैलने के पीछे की विश्व दृष्टि किसकी थी। निःसंदेह यदि मध्य प्रदेश आदिवासी लोककला परिषद् ( भोपाल स्थित लोक कलाओं की शासकीय अकादमी ) न होती तो तीजन बाई की ऊँचाई कहां होती कहना मुश्किल है। देश-प्रदेश-विदेश ने तभी कायदे से जाना कि महाभारत कंठस्थ हो देह-भंगिमाओं का सहारा लेता हुआ जब आंचलिक बोली में सामने आता है तो वह “पंडवानी” कहलाता है। आज इसी अकादमी के पास उनके गाए लगभग सभी प्रमुख प्रसंग रिकॉड रूप में मौजूद हैं।
सन् 1976 में भिलाई इस्पात संयंत्र के आयोजन छत्तीसगढ़ लोककला महोत्सव में वे पहली बार दर्ज हुई और अपने प्रदर्शन से पंडवानी की मंचीय कीर्ति का पाट चौड़ा करना आरम्भ किया था। वैसे बीएसपी के साथ उनका कर्मचारी के रूप में जुड़ाव सन् 1988 के दौर का है। इधर, नियमित प्रस्तुतियों से उनका नाता तो कुछ साल पहले ही छूट गया था! न्योते लेकिन बराबर आते थे। कभी निरंतर यात्राएं होती थीं। आवाजाही का आलम जारी रहता था। मंचों में उनसे महाभारत के प्रसंग देख, सुन दर्शक चकित होते थे। महाभारत के पात्रों को तो किसी ने नहीं देखा। लेकिन दुर्योधन, भीम, कुंती,अर्जुन, नकुल, सहदेव या और भी किरदार ; गरजते अथवा करुणा में भीगे कण्ठ का सहारा लेकर जब सामने आते तो लगता वे ऐसे ही रहे होंगे जैसा उन्हें तीजन बाई की पंडवानी बताती हैं। कुछ साल पूर्व रायपुर एयपोर्ट पर एक विशेष पेशकश उनकी हुई थी। ऊपर विमानों की आवाजाही और नीचे उनकी गूँजती पंडवानी। तीजन बाई से पंडवानी सुनने का वह यादगार प्रसंग था।
तीजन की प्रस्तुतियों में उनके संगत कलाकारों की भूमिका को नजअंदाज करके तीजन बाई के कलात्मक वैशिष्ट्य को समझा नहीं जा सकता। महाभारत के प्रसंगों से उठकर आने वाली हर्ष, विषाद, करुणा, विस्मय, शोक आदि के सम्पूर्ण रूपाकार को उनका रागी और उनकी मण्डली सजाते हुए चलते जाते थे। वैसे तीजन बाई में कुछ जन्मजात था। उन्हें मंच पर धारदार प्रसंग प्रक्षेपित करते हुए देखने के बाद जब वे नीचे उतरती तो सामान्य ग्रामीण महिला में तब्दील हो जाती थीं।
आवाज, दैहिक व्यक्तिव और शास्त्रीय कथ्य में कुछ अपनी कल्पनाएं जोड़कर वह उन्हें देसी सौंदर्य में पिरो कर पेश करती थीं। एक प्रकार का वशीकरण उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में चाँदी के वर्क की तरह लिपटा हुआ था। आज गनियारी ग्राम में उमड़ी भीड़ ने अपनी इस तीजन मां को अंतिम बिदाई देते हुए –‘भोले बाबा ला परनाम गंगा मइया ला परनाम!’ इस पंक्ति को भले न दोहराया हो, लेकिन प्रसंग के समाप्ति पर बोली जाने वाली वह पंक्ति अनुगूंज बन शायद लम्बे समय तक वातावरण में तैरती रहेगी।
उनका घर उनकी यादों से उनके न होने पर भी घिरा हुआ रहेगा। कमरे में असंख्य तस्वीरें हैं। एक कमरे में देवी-देवताओं का वास है। पद्म अलंकरण की प्रशस्तियां भी फ्रेम में मढ़ी दीवार पर तंगी हैं। सुर्ख साड़ी वाले आदमकद कटाउट के सम्मुख बैठक में उनका पलंग बिछा है। और, प्रसंग के पात्रों अनुरूप अलग-अलग रूपों में बदल जाने वाला उनका वह तंबूरा भी एक किनारे टंगा हुआ तो है लेकिन अपनी सहोदर सखी तीजन को ढूंढता हुआ। जो अनन्त में विलीन हो चुकी हैं।
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