राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा की फैक्टरियों में सोमवार को अपनी मांगों को लेकर श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा को टाला जा सकता था, बशर्ते कि प्रशासन समय रहते उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर लेता। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उग्र प्रदर्शन, हिंसा और आगजनी से श्रमिकों की वाजिब मांगें ही कमजोर पड़ती हैं। वास्तव में इस पूरे घटनाक्रम को समग्रता में देखने की जरूरत है, जिससे धुंध छंट सके। दिल्ली-एनसीआर के आकाश पर छाई धुंध ने यहां बहुत कुछ ढंक रखा है; श्रमिकों की दुश्वारियों को भी।
दिल्ली-एनसीआर में शामिल नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गांव और गाजियाबाद जैसे शहरों में गारमेंट्स एक्सपोर्ट से लेकर पैकेजिंग, आटोमोबाइल और इलेक्ट्रानिक फैक्टरियों में लाखों मजदूर काम कर रहे हैं, उनमें बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की भी है। यहां की चमचमाती बहुमंजिला इमारतें विकास की नई पटकथा के विरोधाभास को ही दिखा रही हैं, जिनकी ऊंची चारदीवारी के पीछे महिला-पुरुष दोनों तरह के श्रमिकों को 10 से 12 घंटे काम करना पड़ता है, वह भी अक्सर बिना साप्ताहिक अवकाश के। दरअसल श्रमिकों का यह प्रदर्शन वेतन में बढ़ोतरी और काम के तय घंटों की मांग से ही उपजा था। इसकी शुरुआत फरीदाबाद से बताई जाती है, जहां पिछले हफ्ते फैक्टरी मजदूरों के आंदोलन के बाद हरियाणा की राज्य सरकार ने श्रमिकों के न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया।
नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी न्यूनतम वेतन में 21 फीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान जरूर किया है, लेकिन इससे श्रमिकों को अधिकतम 3000 रुपये का ही लाभ होना है।
दरअसल पूरे देश में श्रमिकों के वेतन और उनकी सामाजिक सुरक्षा में भारी विसंगतियां हैं, जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है। संविधान की सातवीं अनुसूची के मुताबिक श्रम समवर्ती सूची में है। यानी उनके वेतन इत्यादि का फैसला करने में राज्य सरकारें स्वतंत्र हैं, लेकिन संविधान सरकारों को श्रमिकों के लिए सम्मानजनक और गरिमापूर्ण तरीके से जीवनयापन के लायक वेतन तय करने से कहां रोक रहा है? आखिर निजी फैक्टरियों को श्रमिकों के प्रति मनमानी का अधिकार किसने दिया है?
यह विडंबना ही है कि श्रमिक जब सड़कों पर उतरते हैं, तभी उनकी दुश्वारियों की ओर ध्यान जाता है। आज भी कुशल, अर्ध कुशल और अकुशल श्रमिकों का वेतन बेहद कम है, जिसमें महंगाई की मौजूदा दरों के हिसाब से गुजर-बसर बेहद मुश्किल है। वास्तविकता यह है कि पिछले साल नवंबर में चार श्रम संहिताओं को मंजूर करने के बाद से श्रमिकों में अपने भविष्य को लेकर आशंकाएं बढ़ती जा रही हैं। इसके बरक्स उनके वेतन में वृद्धि बेहद मामूली या फिर नहीं के बराबर है।
नोटबंदी हो या कोरोना और लॉकडाउन या फिर पश्चिम एशिया का ताजा युद्ध, इसकी सर्वाधिक मार महानगरों के श्रमिकों पर पड़ रही है। ईरान पर इस्राइल और अमेरिका के हमले से पैदा हुए युद्ध से उपजे गैस संकट ने प्रवासी मजदूरों को बुरी तरह से प्रभावित किया है, जिसकी वजह से दिल्ली-एनसीआर से लेकर सूरत और अन्य महानगरों से प्रवासी मजदूरों को अपने गांवों की ओर लौटना पड़ा है।
वहीं, नोएडा की फैक्टरियों में स्थानीय लोग भी बहुत हैं, जिनमें
हजारों महिलाएं और पुरुष कामगार दिल्ली एनसीआर से सटे अर्ध शहरी इलाकों से रोजाना काम पर आते हैं। ये दिल्ली-एनसीआर में बनते नए उपनिवेश के बाशिंदे हैं, जिनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की जरूरत है, मगर पुलिस प्रशासन उन्हें संदेह से देख रहा है। बेशक कानून और जांच एजेंसियां वहां अपना काम करें, लेकिन इसकी आड़ में हजारों निर्दोष श्रमिकों के साथ अन्याय न हो, यह भी सुनिश्चित किया जाए।











