ईरान पर 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के हमले के बाद शुरू हुआ तीसरा खाड़ी युद्ध लगता है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की गले की फांस बन गया है। हालत यह हो गई है कि जापान, फ्रांस, चीन सहित तमाम देशों ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुलवाने के लिए अपने युद्ध पोत भेजने से इनकार कर दिया है।
यही नहीं, अमेरिका के नेशनल काउंटरटेरेरिज्म सेंटर के डायरेक्टर जोए केंट ने अपने पद से इस्तीफा देते हुए ट्रंप पर आरोप लगाया है कि यह युद्ध उन्होंने इजराइल के कहने पर छेड़ा है, जबकि ईरान से अमेरिका को कोई तुरंत खतरा नहीं था।
मजेदार यह है कि ट्रंप दावा कर रहे हैं कि इजराइल ने ईरान के प्राकृतिक तेल क्षेत्र साउथ पार्स पर हमला उनकी जानकारी के बिना किया! क्या इस पर कोई यकीन कर सकता है?
दरअसल हमले के पहले दिन से ही यह साफ दिख रहा था कि इजराइल और अमेरिका ने जबर्दस्ती ईरान पर हमला किया है। हम यहां लिख चुके हैं कि यह हमला तेईस साल पहले 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन के खिलाफ कथित तौर पर जनसंहारक हथियार होने की आशंका में किए गए जबरिया हमले जैसा ही है।
आज यदि खाड़ी के देश लपटों से घिर गए हैं, तो इसकी प्राथमिक जिम्मेदारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप औऱ इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की है। पहले हफ्ते में डोनाल्ड ट्रंप ने जोरशोर से मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) की तर्ज पर मीका (मेक ईरान ग्रेट अगेन) का नारा दिया था। करीब सवा साल पहले अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करते समय ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट का नारा भी दिया था, आज उनकी जिद के कारण अमेरिका अलोन यानी अलग-थलग पड़ गया है।
वास्तव में नाटो देशों ने ट्रंप का पूरी तरह समर्थन न कर समझदारी का ही काम किया है।
इजराइल के ईरान के साउथ पार्स पर किए गए हमले और जवाब में ईरान के कतर के सबसे बड़े गैस संयंत्र रास लफास में किए गए हमले ने दुनिया के बड़े हिस्से को गंभीर संकट में डाल दिया है।











