Meta-WhatsApp Privacy Case: भारत में डिजिटल प्राइवेसी और बिग टेक कंपनियों की जवाबदेही पर सुप्रीम कोर्ट की नजर टिकी हुई है। Meta की स्वामित्व वाली WhatsApp की 2021 प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर चल रहे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी 2026 को सुनवाई टाल दी है। अब यह मामला 23 फरवरी को आएगा, जहां अंतरिम आदेश पारित किया जाएगा।
कोर्ट ने पहले ही सख्त टिप्पणियां की हैं कि यूजर्स की निजता के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता और कंपनी ‘टेक इट ऑर लीव इट’ पॉलिसी के जरिए यूजर्स को मजबूर नहीं कर सकती। अगर प्राइवेसी उल्लंघन जारी रहा तो WhatsApp को भारत छोड़ना पड़ सकता है।
यह विवाद 2021 की WhatsApp प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़ा है, जिसमें यूजर्स के मेटाडेटा (जैसे फोन नंबर, आईपी एड्रेस, डिवाइस इंफो, लोकेशन आदि) को Meta की अन्य कंपनियों (फेसबुक, इंस्टाग्राम) के साथ शेयर करने की अनुमति मांगी गई थी। कंपनी का दावा है कि मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड हैं और डेटा शेयरिंग सहमति पर आधारित है, लेकिन भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग CCI ने इसे प्रतिस्पर्धा विरोधी माना और 2024 में 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।
NCLAT ने नवंबर 2025 में जुर्माना बरकरार रखा लेकिन डेटा शेयरिंग पर 5 साल की रोक हटा दी। अब दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रहे हैं।चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने 3 फरवरी को कहा कि ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे यूजर्स को पॉलिसी के खतरों की समझ नहीं होती, और यह ‘डेटा चोरी’ जैसा है।
कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को केस में पार्टी बनाने का निर्देश दिया और कहा कि संविधान के तहत प्राइवेसी मौलिक अधिकार है। 9 फरवरी की सुनवाई कपिल सिब्बल की तबीयत खराब होने से टली लेकिन 23 फरवरी को अंतरिम फैसला आ सकता है, जो डेटा शेयरिंग पर रोक या पॉलिसी बदलाव का आदेश दे सकता है।
यह केस सिर्फ WhatsApp का नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम का है। भारत में 50 करोड़ से ज्यादा यूजर्स के साथ WhatsApp का एकाधिकार है और फैसला आने पर गूगल, अमेजन जैसी अन्य कंपनियों पर भी असर पड़ सकता है। DPDP एक्ट 2027 से लागू होगा लेकिन यह केस प्राइवेसी कानूनों के लिए रोडमैप सेट कर सकता है फिलहाल 23 फरवरी की सुनवाई तय करेगी कि WhatsApp भारत में अपनी मौजूदा पॉलिसी के साथ चलेगा या बड़े बदलाव करने पड़ेंगे।











