वेनेजुएला की विपक्ष की नेता और पिछले साल की शांति के नोबेल की विजेता मारिया कोरिना मचाडो ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना नोबेल पुरस्कार सौंप कर इस सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार की साख को दांव पर लगा दिया है।
नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा है कि मचाडो ट्रंप को अपना पुरस्कार नहीं सौंप सकती, यह उनके नाम पर ही रहेगा। बेशक, मचाडो का यह कदम प्रतीकात्मक है, लेकिन इसने उनकी खुद की प्रतिबद्धता को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
मचाडो वेनेजुएला के अपदस्थ राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष कर रही हैं और इसीलिए नोबेल कमेटी ने उन्हें पुरस्कार के लिए चुना था। यही नहीं, मचाडो ने खुलेआम ट्रंप का समर्थन किया है और उनसे अपने देश में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था।
पिछले महीने दिसंबर में जब डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर अमेरिकी सुरक्षा बलों ने वेनेजुएला के भीतर घुस कर अभियान चलाकर मादुरो और उनकी पत्नी को बंधक बनाया था, तब भी मचाडो ने ट्रप की तारीफ की थी।
1901 से दिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों की विलक्षण हस्तियों को नोबेल पुरस्कार दिए जा रहे हैं और आमतौर पर उनकी साख बनी हुई है।
लेकिन पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से शांति के नोबेल पर दावा कर रहे थे, वह बहुत अजीब था। खुद को शांति का मसीहा बताने वाले डोनाल्ड ट्रंप भारत-पाकिस्तान के बीच हुए तनाव सहित कई युद्धों को रुकवाने का दावा करते हैं। लेकिन उनके शासनकाल में अमेरिकी साम्राज्यवाद ने जिस तरह से निरंकुशता के साथ दूसरे देशों पर दबाव बनाया है, वह किसी से छिपा नहीं है।
वास्तव में मचाडो ने खुलेआम डोनाल्ड ट्रंप का पिछलग्गू बनकर और अपना नोबेल तक उन्हें सौंप कर लोकतांत्रिक तरीके से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे अपने खुद के देश वेनेजुएला के लाखों लोगों के साथ छल किया है।










