अमेरिका और इस्राइल द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाकर ईरान पर थोपे गए युद्ध की मार अब आम लोगों पर पड़ रही है।
युद्ध शुरू होने के दौरान एप्सटीन फाइल्स की वजह से चर्चा में आए केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने भले ही यह आश्वासन दिया है कि देश में एलपीजी (LPG) की कमी नहीं है और पेट्रोल तथा डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे, लेकिन जमीन पर हालात उनके दावे से उलट नजर आ रहे हैं।
हालत यह है कि देश के विभिन्न हिस्सों से रसोई गैस सिलेंडर की आपूर्ति में हो रही देरी की खबरें आ रही हैं, तो बंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद से लेकर मुंबई और राजधानी दिल्ली जैसे शहरों में एलपीजी सिलेंडर की कमी का सीधा असर होटलों पर दिख रहा है।
हकीकत यह है कि स्ट्रेट ऑफ होरमुज में आवाजाही बाधित होने से भारत में कच्चे तेल की सप्लाई में रुकावट आई है। भारत में 90 फीसदी कच्चा तेल इसी रास्ते से आता है और खाड़ी से आने वाले क्रूड से ही 60 फीसदी एलपीजी तैयार होती है।
युद्ध शुरू हुए दस दिन हो चुके हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लाख दावों के बावजूद यह युद्ध जल्द खत्म होता नहीं दिख रहा है। अगले कुछ दिनों में युद्ध खत्म भी हो जाए, तो स्थिति को सामान्य होने में कई हफ्ते लग सकते हैं।
यह भी गौर किया जाना चाहिए कि सरकार दावा कर रही है कि पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे। यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि 2022 से ही हमारे यहां दाम पहले की तुलना में अधिक हैं। पिछली यूपीए सरकार के समय जब कच्चे तेल के दाम सौ डॉलर प्रति बैरल को पार कर गए थे और पेट्रोल के दाम जब 70 रुपये प्रति लीटर पहुंच गए थे, तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने सरकार पर तीखे हमले किए थे।
वास्तव में 2014 के चुनाव में पेट्रोल डीजल के दाम भी बड़ा मुददा थे। मगर बीते बारह सालों में मीडिया के लिए मानो यह कोई मुद्दा ही नहीं रहा।
दरअसल बात रणनीतिक और नीतिगत फैसलों की है। वास्तविकता यह है कि मोदी सरकार अपने फैसलों की जानकारी बहुत ही केंद्रीकृत तरीके से लेती है और वह संसद के चलने के बावजूद विपक्ष सहित पूरे देश को विश्वास में लेना जरूरी नहीं समझती।
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