नई दिल्ली।।भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) में फैसले लेने का अधिकार तीन अधिकारियों के पास है — मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी। चुनाव आयोग में किसी भी फैसले पर मुहर लगने के लिए इन तीनों अधिकारियों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। ECI के नियमों के मुताबिक, अगर तीन में से दो चुनाव आयुक्त किसी मामले पर सहमत होते हैं, तो बहुमत का फैसला ही मान्य होता है।
चुनाव आयोग के फैसलों में मतभेदों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं ECI ने इन आरोपों का जवाब देते हुए बताया कि मतभेदों के बाद भी फैसला तब लिया जाता है, जब चुनाव आयुक्तों के बीच सर्वसम्मति होती है।
चुनाव आयुक्तों के बीच सहमति या असहमति?
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं और विपक्ष इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को घेर रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया कि चुनाव आयोग के अंदर दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी के बिना उन मामलों पर फैसले लिए गए, जिन पर उन दोनों ने आपत्ति जताई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 में भारतीय चुनाव आयोग ने बिहार से SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) की शुरुआत की। इसके बाद 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर हुए। इसी प्रक्रिया के दौरान नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन, पुराने वोटरों के नाम और अपीलों से जुड़े कई सवाल सामने आए। आयोग के भीतर भी इसी दौरान असहमति दर्ज होने लगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। एक ही दिन में अधिकतम चार बार आपत्ति दर्ज की गई। ये आपत्तियां उन फैसलों और निर्देशों को लेकर थीं, जो उनके मुताबिक उनकी सहमति के बिना जारी किए गए।
चुनाव आयोग की सफाई
चुनाव आयोग ने कहा है कि ECI में मतभेदों के बावजूद सर्वसम्मति से फैसले लिए जाते हैं।
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले की सीधी जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि किसी भी चुनाव आयुक्त ने कोई असहमति नहीं जताई। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने केवल कुछ टिप्पणियां की थीं, जिन पर आयोग ने विचार किया।
मामले से जुड़े लोगों ने बताया कि ECI द्वारा लिए गए सभी फैसलों पर तीनों अधिकारियों — मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — के हस्ताक्षर हैं।
विपक्ष का हमला
इस मुद्दे ने विपक्ष और सत्ताधारी भाजपा के बीच SIR प्रक्रिया को लेकर चल रही लड़ाई में नया मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष का आरोप है कि यह भाजपा के फायदे के लिए वोटरों को हटाने की सोची-समझी प्रक्रिया थी।
रिपोर्ट आने के बाद बुधवार सुबह शिवसेना (उद्धव) के संजय राउत, कांग्रेस के मनीष तिवारी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और DMK के प्रवक्ता ने चुनाव आयोग पर निशाना साधा।
संजय राउत ने कहा, “भाजपा की तरफ से वह लोकतंत्र के प्रति किसी मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा किया जा सकने वाला सबसे बड़ा अपराध कर रहे हैं। भाजपा ने उन्हें सुरक्षा दी है, लेकिन उन्हें नहीं पता कि उनका नाम मोटे, काले अक्षरों में लिखा जाएगा। अगर रिपोर्ट किए गए आरोप सच हैं, तो जब तक यह व्यक्ति इस कुर्सी पर बैठे हैं, तब तक कोई निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है।”
कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने एक्स पर रिपोर्ट शेयर करते हुए लिखा, “यह शायद महाभियोग की कार्यवाही पर गंभीरता से विचार करने का सही मामला है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बुनियादी सवाल यह है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को कैसे बहाल किया जाएगा?”
अखिलेश यादव ने लिखा, “सत्ता में बैठे लोगों की कठपुतली बनकर लोकतंत्र के साथ धोखा करना एक गंभीर संवैधानिक अपराध है। यह लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश से कम नहीं है।”
SIR पर मतभेद के आरोपों के बाद चुनाव आयोग की सफाई, सभी फैसले एकमत से
🗓️ Published: September 23, 2026 1:43 pm








