दूर मध्य पूर्व में ईरान, इजराइल और अमेरिका का युद्ध चल रहा है। मिसाइलें उड़ रही हैं, जहाज फंस रहे हैं, लेकिन भारत ने न कोई गोली चलाई, न कोई मिसाइल दागी। फिर भी हम सबसे ज्यादा चोट खा रहे हैं। क्यों? क्योंकि हमारी कूटनीति ने एक बड़ा दांव खेला और चूक गई। आज हम बिना लड़े ही युद्ध की कीमत चुका रहे हैं – रसोई से लेकर शेयर बाजार तक।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण गली है। चौड़ाई महज 33 किलोमीटर, लेकिन इसमें से दुनिया का 20 प्रतिशत कच्चा तेल और ढेर सारा लिक्विफाइड नेचुरल गैस के जहाज गुजरते हैं। ईरान ने युद्ध शुरू होते ही इसे लगभग बंद कर दिया। जहाजों का ट्रैफिक 90 प्रतिशत तक गिर गया।
भारत 85-88 प्रतिश तेल बाहर से लाता है। उसमें बड़ा हिस्सा होर्मुज से आता है। एलपीजी यानी रसोई की गैस तो 90 प्रतिशत मध्य पूर्व से आती है। नतीजा? मार्च 2026 में रसोई गैस का आयात तकरीबन आधा रह गया। कमर्शियल सिलेंडर की कीमत बढ़ी, गैस ब्लैक मार्केट में बिकने लगा। कुछ जगह 14 किलो का सिलेंडर 10 किलो भरकर बांट रहे हैं। कच्चा तेल सौ डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। रुपया कमजोर होते होते एक डॉलर के बदले 94 के आसपास पहुँच गया।
विदेशी निवेशक पैसा निकाल रहे हैं। शेयर बाजार में लाखों करोड़ गायब। महंगाई बढ़ रही है। किसान को खाद महंगी। ट्रांसपोर्ट महंगा। आम आदमी की जेब पर बोझ। अमेरिका की इकॉनमी 30 ट्रिलियन डॉलर की है। उनका नुकसान 5-10 बिलियन से ज्यादा नहीं। वे खुद तेल निकालते हैं, तो महंगा तेल उन्हें फायदा भी दे रहा है। लेकिन भारत की इकॉनमी सिर्फ 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास। हमारा नुकसान कहीं ज्यादा भारी है। हम किसी खेमे में नहीं – न अमेरिका-इजरायल के साथ, न ईरान के। फायदा जीरो, नुकसान ढेर सारा।
होर्मुज स्ट्रेट के लगभग बंद होने से दुनिया की ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है। तेल की कीमतें बढ़ गईं। इस संकट से भारत, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश नुकसान उठा रहे हैं , लेकिन कुछ देश फायदा भी उठा रहे हैं। रूस युद्ध का सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला देश माना जा रहा है।भारत में रूसी तेल की बिक्री करीब 50 प्रतिशत बढ़ गई।
अनुमान है कि मार्च के अंत तक रूस को 5 बिलियन डॉलर तक की एडिशनल इनकम हो सकती है। यह 2022 के बाद रूस की सबसे बड़ी फ्यूल रेवेन्यू वाली तिमाही होगी। अमेरिका ने वैश्विक सप्लाई बढ़ाने के लिए रूसी तेल पर कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी है ताकि भारत-चीन को तेल मिल सके।
अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व पर शिफ्ट होने से यूक्रेन को हथियार और मदद कम मिल रही है। इससे रूस को राहत है। रूस को आर्थिक और रणनीतिक दोनों फायदे। है। अगर युद्ध लंबा चला तो और ज्यादा कमाई। रूस और चीन की साझेदारी मजबूत हो रही है। ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ने से दोनों देश और करीब आएंगे। भारत इस सीन से गायब है।
चीन को शॉर्ट-टर्म नुकसान है, लेकिन कई फायदे भी हैं। चीन के पास क्रूड ऑयल का 14 करोड़ बैरल का स्टॉक हैं, जो कई महीनों के लिए काफी हैं। ईरान ने चीनी जहाजों को होर्मुज से गुजरने की अनुमति दी है। चीन ईरानी तेल खरीद रहा है। चीन अब रूस से ज्यादा तेल खरीद रहा है। पाइपलाइन से गैस भी आ रही है, जो समुद्री रूट से सुरक्षित है। अमेरिका का ध्यान मध्य पूर्व पर जाने से अमेरिकी दबाव कम हुआ। चीन को ‘स्ट्रेटेजिक स्पेस’ मिला। ईरान चीनी युआन में तेल ट्रेड की अनुमति दे रहा है, जिससे डॉलर की दबदारी कम हो सकती है। युद्ध के बाद कमजोर ईरान चीन पर ज्यादा निर्भर होगा।
कीमतें बढ़ने से तेल निर्यातक देश नॉर्वे और कनाडा की कमाई बढ़ी। अमेरिका खुद बड़ा तेल उत्पादक है। घरेलू कंपनियां (शेल ऑयल) मुनाफा कमा रही हैं। डिफेंस इंडस्ट्री को नए ऑर्डर मिल रहे हैं। अमेरिका ने वेनेजुएला पर कुछ प्रतिबंध ढीले कर दिए ताकि तेल सप्लाई बढ़े।
भारत इस युद्ध का सबसे बड़ा लूज़र है। ऊर्जा – तेल, गैस, पेट्रोल, डीज़ल महंगे हो गए हैं. महंगाई बढ़ रही है, रुपया कमजोर है, शेयर बाज़ारों का हाल अच्छा नहीं है, बुलियन यानी सोने चांदी का बाज़ार ढीला है, प्रॉपर्टी का लेवल नहीं मिल रहा है। नए रोज़गार नहीं बन रहे हैं। छोटे दुकानदारों के हाल भी अच्छे नहीं। सब तरफ त्राहिमाम त्राहिमाम हो रहा है। सबसे बुरी बात यह है कि देशवासियों का मनोबल नीचे आ रहा है और धुआधार जैसी फ़िल्में भी कुछ कर नहीं पा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कूटनीति की कुछ चूकें जो आज महंगी पड़ रही हैं। भारत लंबे समय से ‘सभी से दोस्ती, किसी से दुश्मनी नहीं’ वाला रास्ता चलता आया है। । ईरान से सस्ता तेल,चाबहार पोर्ट, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (जो भारत, ईरान और रूस को जोड़ने वाला 7,200 किमी लंबा बहु-मोडल (समुद्र, रेल, सड़क) व्यापार मार्ग है। यह मुंबई से शुरू होकर ईरान और कैस्पियन सागर के रास्ते रूस और यूरोप तक माल पहुँचाता है, जिससे समय 40-45 दिन से घटकर 25 दिन और लागत 30% कम हो जाती है। ) इजराइल से डिफेंस और टेक्नोलॉजी। गल्फ देशों से निवेश। लेकिन इस बार संतुलन बिगड़ गया।
पहली बड़ी चूक रही भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का इजरायल दौरा और गैरज़रूरी जुमलेबाज़ी । फरवरी 2026 के आखिर में प्रधानमंत्री मोदी इजरायल गए। वहां उन्होंने इजराइल को ‘फादरलैंड’ और भारत को ‘मदरलैंड’ कहा। खास साझेदारी की घोषणा की। ठीक 48 घंटे बाद अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए। ईरान ने इसे ‘पूर्व जानकारी’ समझ लिया। ईरानी मीडिया और नेता नाराज हुए। भारतीय जलपोतों को को दुश्मन की नजर से देखा गया। कई एलपीजी टैंकर फंस गए। सेफ पैसेज के लिए बाद में कूटनीति करनी पड़ी। पूर्व राजदूतों ने कहा – “टाइमिंग पूरी तरह गलत थी। इससे भारत की तटस्थत खत्म हो गई।
- भारत की दूसरी बड़ी चूक * ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर चुप्पी रही। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई की ‘हत्या’ हुई, भारत ने शुरुआत में साफ निंदा नहीं की। शोक सन्देश पुस्तिका में साइन करने में भी देरी हुई। पहले विदेश सचिव गए, फिर बीजेपी के नेता। ईरान पुराना दोस्त है – तेल, चाबहार , मध्य एशिया तक रास्ता। इस चुप्पी से ईरान को बुरा लगा। ईरान ने कहा – भारत अब अमेरिका-इजराइल के करीब दिख रहा है। नतीजा? होर्मुज में भारतीय जहाजों को रोकना और सेफ पैसेज के लिए शर्तें।
- तीसरी चूक रही चाबहार पोर्ट पर फंडिंग और विश्वास की कमी। चाबहार भारत का रणनीतिक बंदरगाह है। इससे पाकिस्तान को बाईपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनती है। लेकिन अमेरिकी दबाव में 2026 के बजट में फंडिंग कम कर दी गई। ईरान ने उसे विश्वास तोडना माना। युद्ध में पोर्ट के आसपास हमले हुए। अब प्रोजेक्ट खतरे में है।
चौथी चूक ईरान वर्सेस गल्फ और इजराइल में बैलेंस न रख पाना को कहा जा सकता है। हम यूएई से अच्छे संबंध रखते हैं निवेश और व्यापार अच्छा है। इजराइल से डिफेंस डील करते हैं, लेकिन ईरान को दूसरी लुगाई जैसा ट्रीटमेंट मिला। पुरानी नीति में हम दोनों तरफ संतुलन रखते थे। अब इमेज बनी कि हम एक तरफ झुक गए।ब्रिक्स में भी हम अकेले थे जिन्होंने ईरान पर हमले की साफ निंदा नहीं की।
पांचवीं चूक यह रही कि हम हमेशा से ईरान को भरोसे की भैंस मन बैठे थे। जबकि हम अभी भी कच्चा तेल आयात करने पर निर्भर हैं। एलपीजी का भण्डार भी बहुत बड़ा नहीं हिअ। ऐसी स्थिति में संतुलन बनाए रखना जरूरी था लेकिन हमने एक तरफा झुकाव दिखाया। नतीजा? आज रूस से तेल बढ़ाकर राहत लेनी पड़ रही है, लेकिनएलपीजी का संकट बना हुआ है।
सरकार कह रही है कि हम सभी से बात कर रहे हैं। रूस से तेल आयात बढ़ा दिया गया है । कुछ कदम तुरंत राहत देते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि पुरानी ‘गुटनिरपेक्षता’ में हम ईरान से सस्ता तेल लेते थे, इजराइल से टेक, गल्फ से निवेश – बिना किसी को नाराज किए। आज एकतरफा झुकाव ने हमें मुश्किल में डाला।आगे क्या? अगर युद्ध लंबा चला तो महंगाई बढ़ेगी, जीडीपी ग्रोथ घटेगी, होर्मुज में अब फ्री रास्ता नहीं रहेगा – टोल, महंगा इंश्योरेंस या नियंत्रण लगेगा। भारत को सबसे ज्यादा नुकसान क्योंकि हमारी निर्भरता ज्यादा है।
सबक बहुत साफ है. हमें कूटनीति में संतुलन रखना ही होगा। कोई विकल्प नहीं है। इजराइल से दोस्ती अच्छी, लेकिन ईरान जैसे पुराने दोस्त को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और किसी भी महाशक्ति का पिछलग्गू नहीं बनना चाहिए।
दुनिया के बड़े संकटों में अमेरिका नेतृत्व करता है, चीन अपनी चाल चलता है, रूस खुलकर खेलता है और भारत? भारत अक्सर बयान देता है -“हम शांति चाहते हैं।” यह अच्छी बात है, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
एक उभरती महाशक्ति से दुनिया ज्यादा उम्मीद करती है।











