देश में सत्ता-प्रेरित जहरीले नारों से ओतप्रोत हिंदू राष्ट्र का अभियान, सांप्रदायिक, भाषायी और नस्लीय नफरत से बनते गृहयुद्ध के हालात, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की आड़ में लोगों की नागरिकता निर्धारित के बेजा अभियान से लोगों में उपजी बेचैनी, शक्तिशाली पड़ोसी देश द्वारा देश की सीमाओं का अतिक्रमण और उस पर हमारी चुप्पी, अर्थव्यवस्था का आधार माने जाने वाली खेती-किसानी पर मंडराता संकट, ध्वस्त हो चुकी अर्थव्यवस्था से मची अफरातफरी के माहौल के बीच अपने गणतंत्र के 77वें वर्ष में प्रवेश करते वक्त हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता की बात क्या हो सकती है या क्या होनी चाहिए?
क्या हमारे वे तमाम मूल्य और प्रेरणाएं सुरक्षित हैं, जिनके आधार पर आजादी की लंबी लड़ाई लड़ी गई थी और जो आजादी के बाद हमारे संविधान का मूल आधार बनी थीं? क्या आजादी हासिल होने और संविधान लागू होने के बाद हमारे व्यवस्था तंत्र और देश के आम आदमी के बीच उस तरह का सहज और संवेदनशील रिश्ता बन पाया है, जैसा कि एक व्यक्ति का अपने परिवार से होता है? आखिर आजादी हासिल करने और फिर संविधान की रचना के पीछे मूल भावना तो यही थी।
भारत के संविधान में राज्य के लिए जो नीति-निर्देशक तत्व हैं, उनमें भारतीय राष्ट्र-राज्य का जो आंतरिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है, वह बिल्कुल महात्मा गांधी के सपनों और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों का दिग्दर्शन कराता है। लेकिन हमारे संविधान और उसके आधार पर कल्पित तथा मौजूदा साकार गणतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो कुछ नीति-निर्देशक तत्व में है, राज्य का आचरण कई मायनों में उसके विपरीत है। मसलन, प्राकृतिक संसाधनों का बंटवारा इस तरह करना था, जिससे स्थानीय लोगों का सामूहिक स्वामित्व बना रहता और किसी का एकाधिकार न होता। इस प्रकार गांवों को धीरे-धीरे स्वावलंबन की ओर अग्रसर किया जाता।
लेकिन हम गणतंत्र की 77वीं सालगिरह मनाते हुए देख सकते हैं कि जल, जंगल, जमीन, आदि तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर से स्थानीय निवासियों का स्वामित्व धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो गया है और सत्ता में बैठे राजनेताओं और नौकरशाहों से साठगांठ कर औद्योगिक घराने उनका मनमाना उपयोग कर रहे हैं…..और यह सब राज्य यानी सरकारों की नीतियों के कारण हो रहा है।
यही नहीं, अब तो देश की जनता की खून-पसीने की कमाई से खड़ी की गई और मुनाफा कमा रही तमाम बड़ी सरकारी कंपनियां देश के बड़े औद्योगिक घरानों को औने-पौने दामों में बेची जा चुकी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में सर्वाधिक रोजगार देने वाली भारतीय रेल का भी तेजी से निजीकरण शुरू हो चुका है। राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्याएं कम की जा चुकी हैं और जो अभी अस्तित्व में हैं उन्हें भी निजी हाथों में सौंपे जाने का खतरा बना हुआ है।
भारत सरकार भले ही मनमाने आंकड़ों के जरिये दावा करे कि आर्थिक तरक्की के मामले में पूरी दुनिया में भारत का डंका बज रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि वैश्विक आर्थिक मामलों के तमाम अध्ययन संस्थान भारत की अर्थव्यवस्था का शोकगीत गा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनडीपी ने तमाम आंकड़ों के आधार पर बताया है कि है भारत टिकाऊ विकास के मामले में दुनिया के 193 देशों में 99वें स्थान पर है।
अमेरिका और जर्मनी की एजेंसियों ने जानकारी दी है कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में दुनिया के 123 देशों में भारत 102वें स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र के प्रसन्नता सूचकांक में भारत के स्थिति में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है। ‘वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक-2025’ में भारत को 118वां स्थान मिला है। 147 देशों में भारत का स्थान इतने नीचे है, जितना कि अफ्रीका के कुछ बेहद पिछड़े देशों का है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस सूचकांक में पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार जैसे छोटे-छोटे पड़ोसी देश भी खुशहाली के मामले में भारत से ऊपर है।
कुछ समय पहले जारी हुई पेंशन सिस्टम की वैश्विक रेटिंग में भी दुनिया के 52 देशों में भारत का पेंशन सिस्टम 45वें स्थान पर आया है। उम्रदराज होती आबादी के लिए पेंशन सिस्टम सबसे जरूरी होता है, ताकि उसकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। भारत इस पैमाने पर सबसे नीचे के आठ देशों में शामिल है। पासपोर्ट रैंकिंग में भारत अभी भी 80वें स्थान पर है। यह स्थिति भी देश की अर्थव्यवस्था के पूरी तरह खोखली हो जाने की गवाही देती है।
वैश्विक स्तर पर भारत की साख सिर्फ आर्थिक मामलों में ही नहीं गिर रही है, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी, मानवाधिकार और मीडिया की आजादी में भी भारत की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग इस साल पहले से बहुत नीचे आ गई है। हालांकि भारत सरकार ऐसी रिपोर्टों को तुरंत खारिज कर देती है, जबकि यह रेटिंग किसी सर्वे पर नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित होती है।
बेशक हम इस बात पर गर्व कर सकते हैं कि आजाद भारत का पहला बजट 193 करोड़ रुपए का था और अब हमारा 2025-26 का बजट करीब 50.65 लाख करोड़ रुपए का है। यह एक देश के तौर पर हमारी असाधारण उपलब्धि है। इसी प्रकार और भी कई उपलब्धियों की गुलाबी और चमचमाती तस्वीरें हम दिखा सकते हैं। परमाणु और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी कई कामयाबियां हमारे खाते में दर्ज हैं। यह सब फौरी तौर पर ही हमारे गणतंत्र की सफलता का प्रमाण है।
लेकिन जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि आजाद भारत का हमारा लक्ष्य क्या था तो फिर सतह की इस चमचमाहट के पीछे गहरा स्याह अंधेरा नजर आता है।
देश की 80 फीसदी आबादी को मिल रहा तथाकथित मुफ्त राशन, इस स्थिति पर गर्व करती सत्ता और इसके बावजूद भूख से मरते लोग, भयावह भ्रष्टाचार, पानी को तरसते खेत, काम की तलाश करते करोड़ों हाथ, देश के विभिन्न इलाकों में सामाजिक और जातीय टकराव के चलते गृहयुद्ध जैसे बनते हालात, बेकाबू कानून-व्यवस्था और बढ़ते यौन अपराध, चुनावी धांधली, विभिन्न राज्यों में आए दिन निर्वाचित जनप्रतिधियों की खरीद-फरोख्त के जरिए जनादेश का अपहरण, निर्वाचन आयोग का सत्ता के इशारे पर काम करना, न्यायपालिका के जनविरोधी फैसले और सत्ता की पैरोकारी, सत्ता से असहमति का निर्ममतापूर्वक दमन आदि बातें हमारे गणतंत्र की मजबूती और कामयाबी के दावे को मुंह चिढ़ाती हैं।
यह स्थिति बताती है कि हमारा व्यवस्था तंत्र देश के आम आदमी के प्रति अपनी बुनियादी जिम्मेदारी निभाने और गांव, गरीब तथा किसान को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने में पूरी तरह विफल रहा है।
सवाल है कि क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि हम अपने पडोसी पाकिस्तान की तरह असफल राष्ट्र बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं? समस्याएं और भी कई हैं जो हमें इस सवाल पर सोचने पर मजबूर करती हैं। दरअसल, भारत की वास्तविक आजादी बड़े शहरों तक और उसमें भी सिर्फ उन खाए-अघाए तबकों तक सिमट कर रह गई है जिनके पास कोई राष्ट्रीय परिदृश्य नहीं है। इसीलिए शहरों का गांवों से नाता टूट गया है।
हालांकि इस कमी को दूर करने के लिए साढ़े तीन दशक पहले पंचायती राज प्रणाली लागू की गई, मगर ग्रामीण इलाकों में निवेश नहीं बढ़ने से पंचायतें भी गांवों को कितना खुशहाल बना सकती है? इन्ही सब कारणों के चलते के चलते हमारे संविधान की मंशा के अनुरूप गांव स्वावलंबन की ओर अग्रसर होने की बजाय अति परावलंबी और दुर्दशा के शिकार होते गए। गांव के लोगों को सामान्य जीवनयापन के लिए भी शहरों का रुख करना पड़ रहा है।
खेती की जमीन पर सीमेंट के जंगल उग रहे हैं, जिसकी वजह से गांवों का क्षेत्रफल कितनी तेजी से सिकुड़ रहा है, इसका प्रमाण 2011 की जनगणना है। इसमें पहली बार गांवों की तुलना में शहरों की आबादी बढ़ने की गति अब तक की जनगणनाओं में सबसे ज्यादा है। शहरों की आबादी 2001 के 27.81 फीसदी से बढकर 2011 की जनगणना के मुताबिक 31.16 फीसदी हो गई जबकि गांवों की आबादी 72.19 फीसदी से घट कर 68.84 फीसदी हो गई। अब 2021 में स्थगित हुई जनगणना जब भी होगी, तो उसमें यह अंतर और भी ज्यादा बढ़ कर सामने आना तय है।
इस प्रकार गांवों की कब्रगाह पर विस्तार ले रहे शहरीकरण की प्रवृत्ति हमारे संविधान की मूल भावना के एकदम विपरीत है। हमारा संविधान कहीं भी देहाती आबादी को खत्म करने की बात नहीं करता, पर विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के इशारे पर बनने वाली हमारी आर्थिक नीतियां वही भूमिका निभा रही है और इसी से गण और तंत्र के बीच की खाई लगातार गहरी होती जा रही है।
दरअसल, भारत की आजादी और भारतीय गणतंत्र की मुकम्मल कामयाबी की एक मात्र शर्त यही है कि जी-जान से अखिल भारतीयता की कद्र करने वाले क्षेत्रों और तबकों की अस्मिताओं और संवेदनाओं की कद्र की जाए। आखिर जो तबके हर तरह से वंचित होने के बाद भी शेषनाग की तरह भारत को अपनी पीठ पर टिकाए हुए हैं, उनकी स्वैच्छिक भागीदारी के बगैर क्या हमारे गणतंत्र की कामयाबी मुकम्मल हो सकती है और क्या हमारा गणतंत्र मजबूत हो सकता है? जो समाज स्थायी तौर पर विभाजित, निराश और नाराज हो, वह कैसे एक सफल राष्ट्र बन सकता है?











