सर्वोच्च अदालत के जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन ने एक हादसे के बाद बीते 12 साल से कोमा में चले गए एक युवक के अभिभावकों की याचिका को मंजूर करते हुए देश में पहली बार इच्छा मृत्यु की इजाजत दी है, जो देश के न्यायिक इतिहास में निश्चिय ही एक मील का पत्थर है।
गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा बी टेक की पढ़ाई के दौरान 12 साल पहले चंडीगढ़ में एक चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिनसे उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट आई थी। तबसे वह कोमा में थे और जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर थे। 31 वर्षीय हरीश के बुजुर्ग माता पिता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्त्वपूर्ण फैसला दिया है। फैसले के मुताबिक एम्स का मेडिकल बोर्ड आगे की प्रक्रिया पूरी करेगा।
निश्चय ही इस फैसले से हरीश के माता-पिता को थोड़ी राहत मिलेगी और उनकी पीड़ा कुछ कम होगी। उन्हें पता था कि उनका बेटा मृत्यु से एक अंतहीन लड़ाई लड़ रहा है, जहां से उसका लौटना असंभव है।
दरअसल ऐसे मामलों में जब पीड़ित व्यक्ति अपनी पूरी चेतना खो दे और सिर्फ जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर हो जाए, तो परिवार को भावनात्मक और आर्थिक दोनों ही स्तरों पर लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
इस फैसले तक पहुंचना सचमुच आसान नहीं था। इसकी बुनियाद मुंबई की दिवंगत नर्स अरुणा शानबाग के मामले में देखी जा सकती है। 1973 में अरुणा शानबाग के साथ अस्पताल में एक सफाई कर्मी ने बर्बर तरीके से दुष्कर्म किया था और उसके बाद से वह कोमा में चली गई थीं। उन्हें उनके अस्पताल के सहयोगियों ने जीवन रक्षक प्रणाली के जरिये बचाए रखा था।
पत्रकार पिंकी विरानी ने उनकी इच्छा मृत्यु के लिए याचिका लगाई थी, जिसे 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि कोई अन्य व्यक्ति इच्छा मृत्यु की मांग नहीं कर सकता।
हालांकि हमारे देश में यह एक नैतिक और संवैधानिक दोनों तरह का सवाल रहा है कि क्या किसी व्यक्ति को जो ऐसी स्थिति में हो, जहां से उसके चेतना में लौटने की कोई संभावना नहीं है, जीवन रक्षक प्रणाली से मुक्त कर दिया जाए।
असल में इसी सवाल के साथ सामने आमने वाले कॉमन कॉज की याचिका पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण मृत्यि के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया।
हरीश राणा के मामले में आए फैसले से उन परिवारों को निश्चिय ही राहत मिलेगी, किसी हादसे में जिनके परिजन कोमा में चले जाते हैं और पूरी तरह से जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर हो जाते हैं। इस फैसले को अपराधबोध की मुक्ति की तरह भी देखना चाहिए; आखिर किसी भी माता-पिता के लिए अपने बेटे के लिए ऐसा कदम उठाना कितना कठिन है, यह बताने की जरूरत नहीं है।











