गंगा की सूखती नसें: 50 साल में गायब हुईं 18 लाख जलधाराएं, क्या ‘मां गंगा’ को बचाने की लड़ाई हार रहे हैं हम?

Ganga

भारत में Ganga सिर्फ एक नदी नहीं है। वह आस्था है, संस्कृति है, सभ्यता है और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार भी। सदियों से गंगा को ‘पतित पावनी’ और ‘मोक्षदायिनी’ कहकर पूजा जाता रहा है। लेकिन जिस गंगा को देश की आत्मा माना जाता है, उसके अस्तित्व पर अब एक गंभीर संकट मंडरा रहा है।

यह संकट केवल प्रदूषण का नहीं है। यह संकट गंगा की उन छोटी-छोटी जलधाराओं के खत्म होने का है, जो इस विशाल नदी को जीवित रखती हैं। हाल ही में आई एक शोध रिपोर्ट ने इस खतरे को बेहद स्पष्ट और चिंताजनक तरीके से सामने रखा है।

देखें वीडियो रिपोर्ट

आईआईटी-आईएसएम धनबाद के पर्यावरण विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में गंगा बेसिन की लगभग 18 लाख प्राकृतिक जलधाराएं समाप्त हो चुकी हैं। शोध के मुताबिक हर दिन औसतन 99 प्राकृतिक जलधाराएं खत्म हो रही हैं।

ये जलधाराएं सिर्फ छोटे नाले या बरसाती रास्ते नहीं हैं। ये गंगा की जीवन रेखाएं हैं, जो वर्षा के पानी को मुख्य नदी तक पहुंचाती हैं, भूजल को रिचार्ज करती हैं और पूरे नदी तंत्र को जीवित रखती हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गंगा को मानव शरीर माना जाए तो ये जलधाराएं उसकी नसों की तरह हैं। पिछले पांच दशकों में गंगा की लाखों नसें कट चुकी हैं।

जल निकास घनत्व में भारी गिरावट

रिसर्च में सामने आया है कि गंगा बेसिन का ड्रेनेज डेंसिटी यानी जल निकास घनत्व 2 किलोमीटर प्रति वर्ग किलोमीटर से घटकर मात्र 0.9 किलोमीटर प्रति वर्ग किलोमीटर रह गया है।

इसका सीधा अर्थ है कि प्राकृतिक जल प्रवाह के रास्ते तेजी से समाप्त हो रहे हैं। नतीजतन बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बह जाता है। इससे एक तरफ बाढ़ का खतरा बढ़ता है तो दूसरी ओर भूजल स्तर लगातार नीचे जाता है।

दामोदर बेसिन की हालत सबसे ज्यादा खराब

शोध के अनुसार दामोदर नदी बेसिन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका है। झारखंड और पश्चिम बंगाल के बड़े भूभाग में प्राकृतिक जलधाराएं या तो सूख चुकी हैं या मानव गतिविधियों के कारण समाप्त कर दी गई हैं।

इसका असर केवल नदी तक सीमित नहीं है। इससे पूरे क्षेत्र में जल संकट, सूखे और बाढ़ जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।

आखिर कौन है जिम्मेदार?

शोधकर्ताओं ने इस संकट के पीछे कई कारण गिनाए हैं।

इनमें बड़े पैमाने पर कोयला और खनिज खनन, अवैध रेत खनन, जंगलों की कटाई, सड़क और बुनियादी ढांचे का अनियोजित विस्तार, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और कृषि विस्तार के नाम पर प्राकृतिक क्षेत्रों का विनाश प्रमुख हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन गतिविधियों ने प्राकृतिक जलमार्गों को बाधित किया है, जिसके कारण हजारों छोटी नदियां और जलधाराएं धीरे-धीरे समाप्त होती चली गईं।

नमामि गंगे: उपलब्धियां और सवाल

साल 2014 में केंद्र सरकार ने ‘नमामि गंगे’ परियोजना की शुरुआत की थी। इसे गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाने की सबसे बड़ी राष्ट्रीय परियोजना बताया गया।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस परियोजना पर अब तक 26 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं, जबकि विभिन्न रिपोर्टों में इसकी कुल लागत 42 हजार करोड़ रुपये के आसपास बताई जाती है।

इस दौरान सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने, घाटों का सौंदर्यीकरण हुआ और कई विकास परियोजनाएं शुरू की गईं। लेकिन आईआईटी-आईएसएम की यह रिसर्च एक नया सवाल खड़ा करती है।

यदि गंगा की सहायक जलधाराएं लगातार समाप्त हो रही हैं, तो क्या गंगा संरक्षण की रणनीति अधूरी नहीं है?

क्या मुख्य नदी की सफाई पर ध्यान केंद्रित करते हुए उन छोटी नदियों और प्राकृतिक जलमार्गों की अनदेखी कर दी गई, जो वास्तव में गंगा को जीवित रखती हैं?

गंगा को बचाना है तो उसकी जलधाराओं को बचाना होगा

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा को बचाने का मतलब सिर्फ प्रदूषण कम करना नहीं है। गंगा को बचाने का अर्थ है उसके पूरे नदी तंत्र को बचाना।

जब तक छोटी नदियां, बरसाती धाराएं, जंगल और प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक गंगा के भविष्य को सुरक्षित नहीं किया जा सकता।

गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की धुरी है। लेकिन यदि उसकी जीवनदायिनी जलधाराएं इसी गति से समाप्त होती रहीं, तो आने वाले वर्षों में गंगा का अस्तित्व भी गंभीर चुनौती का सामना कर सकता है।

सवाल केवल सरकारों से नहीं, समाज से भी है। क्या हम गंगा को सिर्फ धार्मिक प्रतीक मानकर संतुष्ट रहेंगे, या उसके वास्तविक पर्यावरणीय संकट को समझकर उसे बचाने की दिशा में गंभीर प्रयास करेंगे? क्योंकि गंगा का भविष्य केवल एक नदी का भविष्य नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जल, पर्यावरण और जीवन का भविष्य भी है।

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पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 6 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, हेल्थ, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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