लखनऊ। राम मंदिर चंदा चोरी पर हंगामे के बीच ही सरकार ने संभल हिंसा पर रिपोर्ट सदन में पेश कर दी। विधान सभा एक दिन पहले ही खत्म हो गई लेकिन प्रेक्षक कहते हैं कि उत्तर प्रदेश BJP संभल रिपोर्ट को एक तरह का सियासी औजार बनाने की तैयारी में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के आरोपों से बने विपक्ष के हमले का जवाब भाजपा सीधे बचाव में जाकर नहीं, बल्कि संभल हिंसा जैसे मुद्दे को प्रमुखता देकर देने की कोशिश कर सकती है।प्रेक्षक कहते हैं कि यह चंदा चोरी के बाद बने नैरेटिव को बदलने की कोशिशों का हिस्सा है।
हालांकि यह केवल राजनीतिक विश्लेषण है। भाजपा का आधिकारिक रुख है कि रिपोर्ट पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और उसे तय समय पर ही सदन में रखा गया।
भाजपा इस दावे को पूरी तरह खारिज करती है कि संभल रिपोर्ट उसके लिए कथित रूप से राजनीतिक औजार है।पार्टी का कहना है कि रिपोर्ट न्यायिक आयोग की है और उसका चुनाव या विधानसभा सत्र की टाइमिंग से कोई संबंध नहीं है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इसे राजनीतिक एजेंडा बताकर सरकार पर जवाबदेही से बचने का आरोप लगा रही है।
सिर्फ 2 घंटे 43 मिनट चला विधानसभा का आखिरी मानसून सत्र
विधानसभा चुनाव से पहले का आखिरी चार दिवसीय मानसून सत्र 3 अगस्त से 6 अगस्त तक प्रस्तावित था, लेकिन सदन महज 2 घंटे 43 मिनट ही चल सका और तीन दिन के भीतर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।
5 अगस्त को जब सदन की कार्यवाही दोपहर में स्थगित हुई, तब समाजवादी पार्टी के विधायक राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांग रहे थे। विपक्ष की मांग थी कि इस मामले पर सदन में विस्तृत चर्चा कराई जाए, लेकिन हंगामे के बीच कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी।
इसी सत्र में बिना चर्चा के लगभग 59 हजार करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट भी पारित हो गया और संभल हिंसा पर न्यायिक आयोग की रिपोर्ट दोनों सदनों के पटल पर रख दी गई।
चुनावी मुद्रा में सत्ता और विपक्ष
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दल पूरी तरह चुनावी तैयारी में उतर चुके हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही अयोध्या से पवन पांडेय को संभावित उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं। इससे यह संकेत भी मिला कि अयोध्या और राम मंदिर का मुद्दा आगामी चुनाव में प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में रहेगा।
ऐसे माहौल में संभल रिपोर्ट की टाइमिंग को राजनीतिक विश्लेषक महज संयोग मानने को तैयार नहीं दिखते।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार भवेशचंद्र, जो लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति और चुनाव कवर करते रहे हैं, मानते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया भाषणों से साफ संकेत मिलता है कि भाजपा समाजवादी पार्टी को मुस्लिम तुष्टिकरण के मुद्दे पर घेरने की रणनीति पर काम कर रही है।
उनके मुताबिक, संभल हिंसा रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक के बेटे सुहेल इकबाल का नाम आने के बाद भाजपा को राजनीतिक हमला करने का नया आधार मिल गया है।
उनका कहना है कि जैसे-जैसे चुनाव करीब आएंगे, भाजपा नेताओं के भाषणों में संभल हिंसा रिपोर्ट का उल्लेख लगातार बढ़ेगा।
इस सवाल पर चुनावी विश्लेषक मोहित पांडेय का कहना है कि यह मुद्दा पूरे उत्तर प्रदेश में समान प्रभाव नहीं डालेगा, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका असर दिखाई दे सकता है।
मोहित आगे कहते हैं कि संभल के आसपास छह प्रमुख जिले हैं। मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा, बदायूं, अलीगढ़ और बुलंदशहर। संभल समेत इन 7 जिलों में कुल 39 विधानसभा सीटें हैं। जिसमें भाजपा के पास 24, सपा के पास 14, अपना दल (S) के पास 1 रामपुर की स्वार सीट है। अलीगढ़ और बुलंदशहर की सभी 14 सीटें भाजपा के पास हैं, जबकि संभल-मुरादाबाद में सपा का दबदबा है।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है कि पार्टी शुरू से कहती रही है कि संभल हिंसा के पीछे समाजवादी पार्टी से जुड़े लोगों की भूमिका थी और अब न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में भी यही सामने आया है।
उनका कहना है कि संभल हिंसा पूर्व नियोजित साजिश थी। स्थानीय प्रशासन ने बड़ी हिंसा को रोकने का काम किया। रिपोर्ट का चुनाव से कोई संबंध नहीं है। राम मंदिर चढ़ावा चोरी और संभल हिंसा दोनों अपराध हैं तथा दोनों मामलों में कानून अपना काम कर रहा है।
सत्र समय से पहले समाप्त होने पर उन्होंने विपक्ष को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि विपक्ष केवल हंगामा कर रहा था।

समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय का कहना है कि भाजपा सरकार विपक्ष के सवालों से बच रही है।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर से जुड़ी आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल सपा ने कभी नहीं किया। जनता को बताया जाएगा कि चोरी किसने की और उसके तार कहां तक जुड़े हैं। संभल रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है और पार्टी जल्द अपना विस्तृत पक्ष रखेगी।
वहीं सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने भी रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए आयोग की निष्पक्षता पर संदेह जताया है।
संभल रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा में पांच लोगों की मौत हुई थी।
तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग की करीब 450 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा अचानक नहीं बल्कि पूर्व नियोजित थी।
रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, स्थानीय विधायक के बेटे सुहेल इकबाल तथा मस्जिद प्रबंधन समिति के कुछ सदस्यों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। आयोग ने पुलिस को क्लीन चिट दी है। रिपोर्ट के अनुसार मौतें पुलिस फायरिंग से नहीं बल्कि भीड़ में मौजूद अवैध हथियारों से चली गोलियों के कारण हुईं।
योगी आदित्यनाथ का लगातार संभल पर फोकस
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले कुछ समय से संभल को लगातार अपने भाषणों का हिस्सा बना रहे हैं।
उन्होंने संभल को भगवान कल्कि की जन्मभूमि बताते हुए कहा है कि संभल सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। पूर्ववर्ती सरकारों में हिंदुओं के साथ अन्याय हुआ। उन्होंने आगे कहा कि दंगों के जरिए हिंदुओं को वहां से हटाने की कोशिश हुई। संभल के 68 तीर्थ और 19 कुओं का पुनर्जीवन कराया जा रहा है। काशी और अयोध्या की तरह संभल का भी कायाकल्प होगा।
सत्र समाप्त होने के बाद भी मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर हमला करते हुए कहा कि जिनका उद्देश्य केवल शोर-शराबा करना है, वे लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान नहीं करते।
क्या भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलेगा?
यह सवाल अभी पूरी तरह राजनीतिक विश्लेषण का विषय है और इसका उत्तर चुनावी नतीजों में ही मिलेगा।
एक ओर विपक्ष का प्रयास है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मुद्दा चुनाव तक जीवित रखा जाए, वहीं भाजपा कानून-व्यवस्था, संभल हिंसा और हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देती दिखाई दे रही है।
इतना जरूर स्पष्ट है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में राम मंदिर, संभल, कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे फिर से केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले महीनों में भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच यह नैरेटिव की लड़ाई और तेज होने की संभावना है।









