छत्तीसगढ़ के स्कूलों से गांधी पर आधारित सहायक वाचन किताब हटाई गई, क्या पाठ्यक्रम का हो रहा भगवाकरण ?

LENS REPORT:छत्तीसगढ़ के बीजेपी सरकार की सहायक वाचन की दो किताबें सामने हैं। एक किताब 25 साल से बच्चों को पढ़ाई जा रही थी। दूसरी इस साल 2026-27 में नई आई है। दोनों में फर्क ये है कि महात्मा गांधी से जुड़ी पुरानी किताब को इसी सत्र से हटा दिया गया है। अब छत्तीसगढ़ के बच्चे बापू और उनसे जुड़ी प्रेरक बातें नहीं पढ़ पाएंगे। इसके अलावा और भी कुछ विषय हैं जिनमें बदलाव हुआ है। पाठ्यक्रम का भगवाकरण किया जा रहा है।

गांधी की किताब बंद

राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी SCERT रायपुर, छत्तीसगढ़ ने डॉक्टर विनय मोहन शर्मा द्वारा लिखी गई “महात्मा गांधी” पर आधारित सहायक वाचन की किताब बनाई थी। छत्तीसगढ़ बनने के बाद से ही ये किताब कक्षा 8 में पढ़ाई जा रही थी। लेकिन वर्तमान भाजपा सरकार ने इस सत्र 2026-27 से इस पूरी किताब को ही बंद कर दिया है। मतलब अब बच्चों को गांधी जी का पूरा जीवन चरित्र सहायक वाचन में नहीं पढ़ाया जाएगा।

गांधी का उद्धरण भी बदला

सिर्फ किताब ही नहीं, गांधी जी के उद्धरण भी बदल दिए गए। कक्षा 6 की नई सहायक वाचन की किताब और इसी सत्र की कक्षा 4 की पर्यावरण की किताब में पहले गांधी जी की लिखी एक पंक्ति थी – ‘विद्यार्थियों को ऐसी तालीम दी जानी चाहिए जिससे वे संसार के सभी धर्मों को आदर के साथ सीख सकें’। मतलब सर्व-धर्म समभाव की बात।

अब 2026-27 की नई किताब में गांधी जी का ही उद्धरण लिखा है – ‘देश प्रेम से बढ़कर कोई सेवा नहीं’। ये लाइन भी गांधी जी की ही है। लेकिन सवाल ये है – 25 साल से चली आ रही ‘सर्व धर्म समभाव’ वाली सोच को अचानक क्यों हटाया गया? क्या अब शिक्षा में ‘देशभक्ति’ के नाम पर धार्मिक सहिष्णुता को पीछे धकेला जा रहा है?

पाठ्यक्रम में और क्या बदला?

बदलाव सिर्फ गांधी तक सीमित नहीं है। पूरी किताबों के syllabus को री-राइट कर दिया गया है और ऐसा सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, ऐसा लगभग हर बीजेपी शासित राज्यों में देखने को मिल रहा है।

NCERT की नई किताबों में अब सामाजिक विज्ञान के 22 पाठ को घटाकर 12 पाठ कर दिया गया है। राज्य से जुड़ी सामग्री जोड़ी जा रही है।

कक्षा 3: ‘होनहार लड़का नरेंद्र’ हटाकर वीर साहबजादे जोड़ा गया है, इसके अलावा चंद्रशेखर आज़ाद और शबरी के बेर भी जोड़े गए हैं।
कक्षा 4: संत रविदास और जगदीश चंद्र बोस हटे। जोड़ा – ठाकुर प्यारेलाल और हीरालाल सोनबोइर।
कक्षा 6: हेलेन केलर की जगह अहिल्याबाई होलकर। साथ में शिवाजी, मदन मोहन मालवीय, शहीद शिरीष कुमार।
कक्षा 7: सबसे ज्यादा बदलाव हुआ है। राजीव गांधी, सुब्रह्मण्य भारती हटे। जोड़ा – विश्वेश्वरैया, बिरजू महाराज, तीजन बाई, गुरु घासीदास, पृथ्वीराज चौहान।
कक्षा 8: गांधी की जगह अब आएंगे – डॉ. कलाम, सरदार पटेल, भगत सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, दीनदयाल उपाध्याय।

बीते कई बरसों से देखा जा रहा है कि लगातार नेहरू और गांधी को रिप्लेस करने का प्रयास हो रहा है। लेकिन गांधी और नेहरू इस देश की आत्मा है। नेहरू जी को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। एम्स, आईआईटी, आधुनिक उद्योग ये सभी उन्हीं की देन है। लेकिन महज राजनीतिक कारणों से आरएसएस समर्थित भाजपा सरकार पाठ्यक्रमों से गांधी जी को हटाती है और अपने प्रेरणा स्रोत दीनदयाल उपाध्याय को पाठ्यक्रम में जोड़ती है। हमें इस बात से ऐतराज नहीं है कि उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय जी को पाठ्यक्रम में जोड़ा। लेकिन क्या ये ऐतराज की बात नहीं है कि कोई सरकार गांधी जी को महज राजनीतिक कारणों से पाठ्यक्रमों से हटा दे।

साथ में “जो जीता वही सिकंदर” ये डायलॉग आपने फिल्मों से लेकर बोलचाल में जरूर इस्तेमाल किया होगा। लेकिन अब इसकी जगह बच्चों को पढ़ाया जाएगा “जो जीता वही होगा बाजीराव”। ये है बदलाव और ये है बच्चों को सिखाया जाने वाला पाठ। सिकंदर नाम से इसलिए दिक्कत है क्योंकि इससे किसी विशेष वर्ग, सीधे तौर पर कहूं तो मुसलमान होने का बोध होता है।

ये बदलाव क्यों? सवाल किससे?

भगत सिंह, पटेल, कलाम, शिवाजी – ये सब हमारे आदर्श हैं। इनके बारे में बच्चों को पढ़ना ही चाहिए। लेकिन सवाल ये है – क्या इसके लिए गांधी को हटाना जरूरी था? भाजपा सरकार कहती है हम ‘राष्ट्रीय चरित्र’ और ‘देशभक्ति’ को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन एक सवाल तो ये है कि – क्या ये “पाठ्यक्रम का भगवाकरण” है? क्या एक विचारधारा को थोपने के लिए बरसों पुराने कोर्स को रातों-रात बदला जा रहा है? सहायक वाचन के नंबर परीक्षा में नहीं जुड़ते। लेकिन ये किताबें बच्चों का चरित्र निर्माण करती हैं। अगर बचपन में ही हमें एकतरफा हीरो पढ़ाए जाएंगे, तो सभी धर्मों का आदर कौन सिखाएगा?

गांधी के साथ कोई कितनी भी नफ़रत का प्रदर्शन कर ले, उनके साथ नापसंदगी का व्यवहार कर ले, लेकिन गांधी इस देश की रगों में बसे हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा कहा था और दुनिया उनके सामने सर झुकाती है। लेकिन उस गांधी को किताबों से हटाया जा सकता है, देशवासियों के दिलों से नहीं। और खबर तो ये भी है कि अगले बरस से वो सावरकर जिनके साथ अंग्रेजों को लिखे माफीनामे दर्ज है, उन्हें अब पाठ्यक्रम में जोड़ा जाएगा।

शिक्षा का मकसद बच्चों को सोचना सिखाना है, एक जैसा सोचना नहीं। सरकार का हक है पाठ्यक्रम बदलने का। लेकिन पारदर्शिता के साथ, बहस के साथ। क्या गांधी को हटाकर और बाजीराव जोड़कर हम बच्चों को बड़ा बना रहे हैं, या उन्हें और उनकी सोच को और छोटा कर रहे हैं? बढ़ते नफरती माहौल में आखिर कैसे कोई सीखेगा समानता का भाव? गांधी को किताबों से हटाकर देशवासियों के दिलों से हटाया जा सकता है।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 6 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, हेल्थ, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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