लेंस रिपोर्ट। भारत सरकार ने देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी LIC में अपनी हिस्सेदारी बेचकर हालिया ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए करीब 31,552 करोड़ रुपये जुटाए हैं। LIC की कुल संपत्ति आज लगभग 57 लाख करोड़ रुपये है, जबकि 1956 में इसे सिर्फ 5 करोड़ रुपये की पूंजी से शुरू किया गया था। 2022 के IPO में सरकार ने 3.5% शेयर बेचे थे, जिससे 20,516 करोड़ मिले थे और हिस्सेदारी 96.5% रह गई थी।
SEBI नियमों के तहत लिस्टेड कंपनी में सरकारी हिस्सेदारी 75% से ज्यादा नहीं रह सकती। LIC को रिलैक्सेशन मिला था – मई 2027 तक 10% और 2032 तक 25% शेयर बेचने हैं। हालिया OFS में 2.5% बेस ऑफर के साथ ग्रीनशू ऑप्शन मिलाकर कुल 6.5% शेयर बेचे गए। इससे पब्लिक शेयरहोल्डिंग 10% हो गई और 2027 का लक्ष्य समय से पहले पूरा हो गया। अब सरकार के पास 90% हिस्सेदारी बची है।

विरोध क्यों?
LIC कर्मचारियों और पॉलिसीधारकों ने विरोध जताया है। ऑल इंडिया इंश्योरेंस एम्प्लॉयीज एसोसिएशन के महासचिव श्रीकांत मिश्रा का कहना है कि LIC करोड़ों लोगों की बचत और भरोसे से बनी है। इसमें सरकार का अतिरिक्त पैसा नहीं लगा, इसलिए असली मालिक पॉलिसीधारक हैं। कर्मचारियों ने 4 अगस्त को देशभर में प्रदर्शन भी किया और 100% सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने की मांग की।सरकार को मिला पैसा सीधे सरकारी खजाने में जाएगा, LIC को नहीं। कंपनी वित्तीय रूप से मजबूत है और उसे फंड की जरूरत नहीं।
जानकारों का मानना है कि सरकार अपने डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट (इस साल 80,000 करोड़, अब तक करीब 52,700 करोड़ जुटाए) और अन्य खर्चों के लिए नॉन-टैक्स रेवेन्यू जुटा रही है। SEBI नियम मानने के लिए 2032 तक 25% हिस्सेदारी बेचनी होगी, लेकिन सवाल मंशा का है – क्या यह सुधार है या जनता की बचत से घाटा भरने की कोशिश? LIC देश की सुरक्षा कवच मानी जाती है। इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है?











