वृंदा करात
एप्सटीन से जुड़ी फाइलों के जारी होने ने केवल एक व्यक्ति की विकृति को ही उजागर नहीं किया है। ये दस्तावेज़ उस नए मॉडल की काली सच्चाइयों को सामने लाते हैं, जिसे सत्ता, कॉरपोरेट जगत, वित्तीय संस्थानों, धनाढ्य वर्ग और प्रभावशाली लोगों के बीच ‘बॉन्डिंग’ (आपसी सांठगांठ) कहा जाता है।
संरचनात्मक वर्ग- आधारित यह सांठगांठ न तो कोई नई बात है और न ही अपराध। न ही इसमें दंडमुक्ति को कुछ असामान्य माना जाता है। लेकिन ये फाइलें दिखाती हैं कि सड़ांध कितनी गहरी है — निजी मुनाफे को समर्पित प्रणालियों में नैतिकता का नामोनिशान तक मिट चुका है।
जेफ्री एप्सटीन एक बाल यौन शोषक और दोषसिद्ध यौन अपराधी था, और उसकी ऐसी “योग्यताओं” की सूची लंबी है। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे व्यक्ति को दंडित कर सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन अमेरिका में — जो खुद को लोकतंत्र का उपदेशक बताता है — वही गुण उसे एक वैश्विक ‘बॉन्डिंग मॉडल’ विकसित करने में सक्षम बनाते हैं, जिसमें व्यापारिक रिश्तों के नाम पर युवतियों और बच्चों का यौन शोषण शामिल था।
अमेरिका के अमीर श्वेत , मौजूदा और पूर्व राष्ट्रपति, रूस और यूरोप के बैंकर, पश्चिम एशिया के शेख और भारत से जुड़े लोग — सभी के नाम इन फाइलों में दर्ज हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि जिनका नाम आया, वे सभी यौन अपराधों में शामिल थे। एप्सटीन द्वारा दी जाने वाली ‘सेवाएं’ कई प्रकार की थीं और सभी यौन नहीं थीं। लेकिन उनका अपराध यह था कि सत्ता के केंद्र में होने के कारण, एप्सटीन के करीब रहना उसके “बॉन्डिंग मॉडल” को सामान्य और स्वीकार्य बनाता गया।
मिलीभगत और विकृति
जिन लोगों के नाम आए हैं, उनमें से कई के लिए इसका अर्थ था उन जगहों में साझा अनुभव, जहां नाबालिगों की तस्करी और शोषण हुआ। इससे उनकी एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ी और उनके बीच गोंद का काम किया गोपनीयता और मिलीभगत ने।
अब इंटरनेट पर उपलब्ध मेल आदान-प्रदान को सरसरी तौर पर देखने से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यौन विकृति, व्यापारिक सौदों और वित्तीय लेन-देन के संदर्भ किस तरह आपस में गुँथे हुए हैं। बैंक चेतावनी संकेतों की अनदेखी करते रहे और एप्सटीन राजनीतिक तथा वित्तीय संपर्कों तक पहुँच दिलाने वाला बिचौलिया बना रहा। महिलाओं और बच्चों का यौन शोषण — नेटवर्क, मुनाफे और सत्ता के संपर्क का जरिया बन गया। एप्सटीन फाइलें पूँजीवाद के नैतिक रूप से दिवालिया संचालन की एक खिड़की खोलती हैं।
अपराध में प्रत्यक्ष भागीदारी और सहयोग के बीच कानूनी अंतर हो सकता है। सहयोग भी अलग-अलग स्तर का होता है। लेकिन 2008 के बाद भी जिसने भी एप्सटीन से संबंध बनाए रखा, उसके लिए ‘जानकारी न होने’ का बचाव टिक नहीं सकता। पहली शिकायत 2005 में दर्ज हुई थी, जब फ्लोरिडा के पाम बीच में एक माँ ने अपनी 14 वर्षीय बेटी के यौन शोषण की शिकायत की थी। पुलिस जाँच में कम से कम एक दर्जन पीड़ित सामने आए।
निर्णायक कार्रवाई के बजाय, राष्ट्रपति बुश के अधीन संघीय सरकार ने एप्सटीन के ताकतवर वकीलों द्वारा तय किए गए एक शर्मनाक और लचर समझौते को स्वीकार कर लिया। नतीजतन एप्सटीन ने ‘वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने और एक नाबालिग’ के मामूली आरोप स्वीकार किए और उसे 13 महीने की सज़ा दी गई, जिसमें उसे रोज अपने दफ्तर जाने और रात में लौटने की अनुमति थी।
लगातार सरकारें, चाहे कोई भी दल सत्ता में रहा हो, पीड़ितों की आवाज़ों की अनदेखी करती रहीं। एप्सटीन बेखौफ होकर अपने अपराध करता रहा। अंततः जुलाई 2019 में, पीड़ितों के साहस और लंबे संघर्ष के कारण, उसे उन आरोपों में गिरफ़्तार किया गया जो 2008 के समझौते में शामिल नहीं थे। अगस्त 2019 में, मुकदमे से पहले, उसकी मृत्यु हो गई — जिसे आधिकारिक रूप से आत्महत्या बताया गया।
अब जारी किए गए ईमेल और दस्तावेज़ (2002 से 2019 तक के) कई लोगों की संलिप्तता के प्रमाण देते हैं। फिर भी, नामों को काला कर (redact कर) अमेरिका के न्याय विभाग ने, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में, शक्तिशाली लोगों की पहचान को सुरक्षित रखा। पीड़ितों ने बार-बार कहा है कि ट्रंप प्रशासन ने इतिहास के सबसे बड़े कवर-अप में से एक को अंजाम दिया।
भारत का कोण
अपने संस्थानों से जवाबदेही माँगना अमेरिकी जनता का काम है। भारत से हम उन साहसी पीड़ितों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं, जो न्याय और जवाबदेही की माँग कर रहे हैं।
लेकिन मामला यहीं समाप्त नहीं होता। ई मेल्स में दो भारतीय नाम सामने आए हैं। पहला नाम उद्योगपति अनिल अंबानी का है, जिन्हें सत्तारूढ़ व्यवस्था का करीबी माना जाता है — जैसा कि राफेल सौदे में उन्हें भारतीय साझेदार बनाने की आधिकारिक सिफारिश से स्पष्ट है। दूसरा नाम है हरदीप पुरी का।
अंबानी और एप्सटीन के बीच मेल से हुआ आदान प्रदान महिलाओं के प्रति परिचित और यौनिक, अपमानजनक भाषा को दर्शाता है। लेकिन अधिक गंभीर मुद्दा राजनीतिक पहुँच का है। भारत के प्रधानमंत्री की वॉशिंगटन यात्रा के प्रस्ताव से पहले, अंबानी ने लिखा: ‘नेतृत्व हमें जैरेड (ट्रंप के दामाद) और बैनन से मिलने में मदद कर सकता है… संभावना है कि प्रधानमंत्री भी डोनाल्ड से मिलेंगे… इसके लिए भी मदद चाहिए।’
अंबानी खुद को एक प्रमुख मंत्री स्तरीय यात्रा से जुड़ा दिखा रहे थे और अमेरिकी राजनीतिक हस्तियों से मुलाक़ातों की व्यवस्था के लिए एप्सटीन की मदद मांग रहे थे। यदि ये ई-मेल प्रामाणिक हैं — और उन्हें नकारा या जाली नहीं बताया गया है — तो ये गंभीर शासन संबंधी सवाल खड़े करते हैं। भारत का एक व्यवसायी “लीडरशिप” के नाम पर ऐसा प्रभाव कैसे इस्तेमाल कर सकता है?
एप्सटीन जैसे दोषसिद्ध यौन अपराधी के साथ इस तरह का संवाद क्या अधिकृत था? क्या इन दावों की कोई जांच हुई?
भारत के विदेश मंत्रालय ने इन ई-मेल्स में प्रधानमंत्री के संदर्भों को ‘एक दोषसिद्ध अपराधी की बकवास’ बताकर खारिज कर दिया। लेकिन मुद्दा एप्सटीन की विश्वसनीयता का नहीं, बल्कि अंबानी के शब्दों का है। उनके ख़िलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? या क्या वह वास्तव में सरकार की ओर से काम कर रहे थे? सरकार को जवाब देना चाहिए।
पुरी नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं। सरकार ने संसद में एप्सटीन फाइलों पर चर्चा रोकने के लिए हर संभव प्रयास किया। एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पुरी ने कहा कि उन्हें 2014 से पहले एप्सटीन की गतिविधियों की जानकारी नहीं थी। लेकिन सबूतों के अलावा, उन्होंने कई बार एप्सटीन से मिलने की बात स्वीकार की।
एक ई-मेल में उन्होंने लिखा है: ‘प्रिय जेफ, मौसम की शुभकामनाएं। जब आप अपने शानदार द्वीप से लौटें तो मुझे बताइए। मैं आपसे बातचीत करना चाहूंगा।’
और बाद में लिखा: ‘जब लौटें तो कॉल कीजिए। और हां, मजे कीजिए। आपको दूसरों से प्रोत्साहन की जरूरत नहीं है।’
क्या यह अज्ञानता दर्शाता है?
एक संदिग्ध बचाव
उसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पुरी ने एप्सटीन के अपराधों को तुच्छ बताते हुए कहा: ‘वह वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने और एक नाबालिग महिला के मामले में दोषी ठहराया गया था। बस यही।’
वास्तव में, पुरी? नाबालिग महिला? क्या आप बच्चे की बात कर रहे हैं? और क्या यह किसी से संबंध तोड़ने के लिए पर्याप्त कारण नहीं है?
उन्होंने आगे कहा कि ‘एक महिला सांसद ने बताया कि अन्य लोग ईर्ष्या करते थे’, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि यदि कुछ गलत हुआ होता तो वह बोलते। वह महिला सांसद कौन थी? पार्टी के भीतर इस तरह के स्त्री-विरोधी मजाक को हास्य के रूप में कैसे स्वीकार किया जाता है? यह हमारे सांसदों के मानकों के बारे में क्या बताता है?
अपने ही शब्दों में, मंत्री ‘एक शानदार द्वीप’ पर होने वाली गतिविधियों में भागीदारी को ईर्ष्या का कारण बताते हैं। यही उनकी सफाई है — कि उन्होंने ईर्ष्या पैदा करने लायक कुछ नहीं किया। ये कोई भाषाई चूक नहीं हैं। ये उदाहरण हैं कि कैसे बलात्कार-संस्कृति को मजबूती मिलती है।
यह भारत के लिए शर्मनाक है कि एक कैबिनेट मंत्री ने जानबूझकर एक दोषसिद्ध यौन अपराधी से संपर्क बनाए रखा और फिर उस संबंध का बचाव किया। क्या उनका पद पर बने रहना प्रधानमंत्री की स्वीकृति को दर्शाता है?
संसद को एप्सटीन फाइलों पर चर्चा करने की अनुमति नहीं दी गई। भारत के लोगों पर ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।
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