दलितों और आदिवासियों के लिए ‘मुक्ति-पर्व’ थी इमरजेंसी!

पांच दशक बाद भी इमरजेंसी (Emergency) को लेकर विवाद जारी है। खासतौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस को कोसने के लिए इसकी याद दिलायी जाती है। यहां तक कि बीजेपी ने बीते कुछ सालों से 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की है ताकि इस आलोचना को एक संस्थागत स्वरूप दिया जा सके। लेकिन इसी बीच ऐसे भी कुछ अध्ययन सामने आये हैं जो बताते हैं कि इमरजेंसी का दौर ख़ासतौर पर दलितों और आदिवासियों के लिए मुक्ति का द्वार खुलने जैसा था। भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की दिशा में इमरजेंसी ने ‘एक्जीलरेटर’ का काम किया था। साथ ही, इमरजेंसी के लिए सिर्फ़ इंदिरा गांधी को जिम्मेदार ठहराना गलत है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने जो मोड़ लिया था, उसमें कोई भी सरकार इमरजेंसी जैसा फैसला ले सकती थी।

कुछ महीने पहले दिल्ली में ‘फिफ्टी इयर्स ऑफ इंडियन इमरेजंसी: लेसन फॉर डेमोक्रेसी’ शीर्षक की एक किताब का विमोचन हुआ जिसमें 17 लेख छपे हैं। इसमें इमरजेंसी को महज ‘लोकतंत्र का काला अध्याय’ बताने के रिवाज से उलट कुछ जमीनी निष्कर्ष पेश करने वाले लेख हैं। इस सिलसिले में मशहूर राजनीति विज्ञानी और जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर गोपाल गुरु का लेख ख़ास तौर पर ध्यान खींचने वाला था।

‘स्वतंत्रता की अवधारणा पर बहस’ शीर्षक लेख में प्रो. गोपाल गुरु लिखते हैं- ‘ऐसा आपातकाल मुक्ति का काल बन जाता है, क्योंकि वे लोग जो दलितों और शोषित वर्गों को दबाते रहे – जैसे साहूकार, जो उन्हें कर्ज में डालते थे, जो उन्हें खाद्यान्न देने से इनकार करते थे, जो उनके बर्तन-भांडे और सोना-चांदी गिरवी रख लेते थे – वे सभी या तो धमकाए गए थे या जेल में थे।’

यानी इमरजेंसी को देखने का एक दूसरा नज़रिया भी है जो इस काल को वंचित समुदायों के लिए ‘सकारात्मक स्वतंत्रता’ का युग मानता है। आपातकाल ने दलितों को सार्वजनिक जीवन में हस्तक्षेप करने का हौसला दिया। उनके लिए यह एक तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक दावा भी था। यह बताता है कि आज़ादी के बाद भारतीय समाज को समतामूलक बनाने की राह में खड़ी तमाम बाधाओं पर इमरजेंसी ने निर्णायक चोट की गयी जिसका असर देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ा।

इस बात की तस्दीक़ इमरजेंसी के दौरान चलाये गये ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ से भी होती है। इस दौरान सीलिंग के ज़रिए मुक्त की गयी भूमि को भूमिहीनों (खासतौर पर दलितों) को बांटा गया। छोटे किसानों, भूमिहीनों और दस्तकारों के कर्ज की वसूली पर रोक लगी। बंधुआ मजदूरी खत्म करने का अभियान चला। कृषि मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी कानून लागू हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों के लिए मकान बने। महंगाई पर क़ाबू पाया गया और अनाज तथा आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को प्रभावी बनाया गया। अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए स्पेशल कंपोनेंट प्लान की अवधारणा विकसित की गयी जो आबादी के अनुपात में बजट सुनिश्चित करता था। छोटे-सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए ऋण और अन्य सुविधाएँ दी गयीं। यही नहीं, अश्पृश्यता निरोधक कानून को सख्त बनाकर जाति के आधार पर शोषण और दमन करने वालों को सख्त संदेश दिया गया।

निश्चित ही इमरजेंसी में ज्यादतियां हुईं। नागरिक अधिकारों को बाधित किया गया, तमाम नेताओं को जेल हुई और प्रेस को भी सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। लेकिन क्या इसके लिए अकेले इंदिरा गांधी को दोषी ठहराया जा सकता है? पचास साल बाद अगर निष्पक्षता से उस समय की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आख़िर इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी क्यों लगायी।

यह कहना पूरी तरह ग़लत है कि इंदिरा गांधी ने 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के असर से बचने के लिए लगायी थी जिसके तहत रायबरेली से उनके निर्वाचन को रद्द कर दिया गया था। अगर ऐसा होता तो उसी दिन इमरजेंसी लग जाती।

सच्चाई यह है कि 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी ( जिसे 7 नवंबर 1975 को पूरी तरह रद्द कर दिया गया।)। यानी इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बने रहने में कोई कानूनी अड़चन नहीं थी। वैसे भी इलाहाबाद होईकोर्ट का तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा था। हाईकोर्ट ने यूपी सरकार द्वारा इंदिरा गांधी के भाषण के लिए ऊँचा मंच बनाने और यशपाल कपूर का सरकारी सेवा से इस्तीफा स्वीकार होने के पहले इलेक्शन एजेंट बनने को ‘भ्रष्टाचार’ करार दिया था। स्वतंत्र स्तंभकारों ने इसे ‘ट्रैफिक लाइट के उल्लंघन के अपराध में प्रधानमंत्री को बर्खास्त करना’ कहा था।

इमरजेंसी लगाने का ऐलान 25 जून की आधी रात के पहले हुई। दिन में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई रैली में जय प्रकाश नारायण ने आह्वान किया था कि सेना और पुलिस सरकार के आदेश को मानने से मना कर दे। यह केंद्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने का खुला आह्वान था। ऐसे में कोई दूसरी सरकार भी क्या करती? ऐसी ही स्थिति के लिए संविधान में अनुच्छेद 352 मौजूद था जिसके तहत आपात्काल लगाने का फ़ैसला किया गया। यानी यह क़दम कहीं से भी असंवैधानिक नहीं था।

इसके अलावा 1974 की रेल हड़ताल ने भी सरकार को गंभीर संकेत दिया था। इस हड़ताल का मकसद देश भर के कारख़ानों में कोयला सप्लाई रोककर उत्पादन ठप कर देना था ताकि जरूरी चीजों की आपूर्ति न हो सके और जनता विद्रोह कर दे। हिंसा और धमाकों का सिलसिला भी जारी था (जिसका प्रमाण बाद में बड़ौदा डायनामाइट कांड के रूप में मिला)। जनवरी 1975 में रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या भी हो गयी थी। ऐसे में इंदिरा गाँधी ने अगर इमरजेंसी लगाने का फैसला किया तो अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ही जिस तरह समाजवादी नीतियां लागू की थीं उससे कांग्रेस के अंदर और बाहर का दक्षिणपंथी ख़ेमा नाराज़ था। पूंजीपति बैंकों के राष्ट्रीयकरण से नाराज़ थे तो पूर्व रियासतदारों का सामंत वर्ग ‘प्रिवीपर्स’ और राजा, महाराजा और हिज हाईनेस जैसे टाइटन खत्म किये जाने से गुस्से में था। नेहरू के समय जमींदारी उन्मूलन रोकने की उसकी तमाम कोशिशें नाकाम हुई थीं और इंदिरा ने उसे जमीन पर उतारने का प्रयास और तेज कर दिया था। ये सारी शक्तियां जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन को ताकत दे रही थीं। जय प्रकाश नारायण ने आरएसएस को भी साथ ले लिया था जिस पर तब तक महात्मा गांधी की हत्या का दाग़ गाढ़ा था और इंदिरा गांधी की नजर में वो एक फ़ासीवादी संगठन था। इन सब चीजों ने इंदिरा गांधी के संदेह को बढ़ा दिया था।

यह भी याद रखने की बात है कि बिना किसी बड़े आंदोलन के दबाव के, उन्नीस महीने बाद इंदिरा गांधी ने खुद ही इमरजेंसी हटा दी। आज के अघोषित आपात्काल में मोदी सरकार और चुनाव आयोग के रिश्तों को देखते हुए यह भी आश्चर्यजनक ही लगता है कि ‘तानाशाह’ इंदिरा गाँधी द्वारा नियुक्त चुनाव आयुक्त टी.स्वामीनाथन ने ऐसा चुनाव कराया कि इंदिरा गांधी चुनाव हार गयीं और बिना किसी ना-नुकुर के सत्ता से हट गयीं।

आरएसएस को साथ लेने के सदैव विरोधी रहे मशहूर समाजवादी चिंतक मधु लिमये ने बाद में लिखा- ‘इंदिरा ने 1977 में चुनाव कराने के जो कारण बताये वह सचमुच व्यक्तित्व की अंतरात्मा को प्रतिबिंबित करता है। …इंदिरा गांधी यह कभी नहीं भूल सकती थीं कि वह जवाहरलाल नेहरू की बेटी हैं और हम सब की तरह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलने वाले स्वतंत्रता संग्राम की संतान हैं।’

1977 के चुनाव में नसबंदी और उससे जुड़ी अफवाहें उत्तर भारत में कांग्रेस के सफ़ाये का सबसे बड़ा कारण बनी थीं। लेकिन ढाई साल में ही संपूर्ण क्रांति का ढोल फट गया। जनता पार्टी ने 1980 में ‘फिर इमरजेंसी’ का डर दिखाकर इंदिरा गांधी को रोकने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस के पक्ष में आँधी चली और उसे लोकसभा में 353 सीटें मिलीं जबकि जनता पार्टी महज 31 सीटों पर सिमट गयी। जनता की अदालत में इमरजेंसी का मुक़दमा इसी चुनाव में निपट गया था जिसे साढ़े चार दशक बाद मोदी सरकार फिर सुनवाई पर लाने की कोशिश करती रहती है। लेकिन दलित-वंचित समाज की ओर से इमरजेंसी को लेकर जो नया नज़रिया सामने आ रहा है, वह इस कोशिश के सामने बड़ी चुनौती साबित होगा।

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