चुनावी चंदे से बिगड़ता असंतुलन

December 22, 2025 7:36 PM
electoral bonds

अपारदर्शी इलेक्टोरल बांड पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद राजनीतिक दलों को मिलने वाले चुनावी चंदे की विसंगतियां कम नहीं हुई हैं और 2024-25 में कॉरर्पोर्ट्स से जुड़े चुनावी ट्रस्ट से राजनीतिक दलों को दिए गए करीब 4000 करोड़ रुपये के चंदे का 85 फीसदी अकेले भारतीय जनता पार्टी के खाते में गया है। वहीं देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस को भाजपा की तुलना में 12 गुना कम केवल 522 करोड़ रुपये मिले हैं।

इस आंकड़े पर गौर करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसके एक साल पहले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 56 फीसदी चंदा मिला था। दरअसल लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिली सीटों की तुलना करें तो यह तस्वीर और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। 2024 में भाजपा ने 240 सीटें जीती थीं और कांग्रेस ने 99 सीटें।

इलेक्टोरल बांड्स को लेकर तो शुरू से सवाल थे और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उसे गैरकानूनी ही करार दिया था। लेकिन उसके बाद कॉर्पोरेट्स ने ट्रस्ट के जरिये राजनीतिक दलों को चुनावी चंदा देने का रास्ता अपनाया है। आंकड़ों के मुताबिक कुल नौ ट्रस्टों ने राजनीतिक दलों को 4000 करोड़ रुपये के करीब चंदा दिया है, जिसमें से 3100 करोड़ से अधिक अकेले भाजपा के पास गया है।

ये ट्रस्ट भारती इंटरप्राइजेस, जिंदल स्टील, टाटा समूह, महिंद्रा, अशोक लीलैंड सहित अनेक दिग्गज कंपनियों से जुड़े हैं, जिनके व्यावसायिक हितों को समझना मुश्किल नहीं है। बेशक, पश्चिम बंगाल और पंजाब में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को भी तुलनात्मक रूप से अधिक चंदा मिला है, लेकिन बड़ा मुद्दा व्यापक असंतुलन का है।

हालांकि भाजपा की देश के 21 राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में अपने दम पर या गठबंधन के दम पर सरकारें हैं। सत्तारूढ़ दल को सर्वाधिक चंदा मिलना भी अनहोना नहीं है, लेकिन विपक्षी दलों की तुलना में अकेले भाजपा को मिलने वाला चंदा जिस तरह से एकाधिकार की तरह बढ़ रहा है, वह देश की चुनावी राजनीति में बढ़ते असंतुलन को ही दिखा रहा है।

यह दुखद है कि हाल ही में संपन्न संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्ष की मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की विसंगतियों और वोट चोरी की चर्चा की मांग पर सरकार ने चुनाव सुधारों पर चर्चा तो करवा ली, लेकिन उसमें चुनावी चंदे की पारदर्शिता का लोकर कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई।

यह तो अब किसी से छिपा नहीं है कि भारत में लोकसभा और विधानसभा तो छोड़ें, पार्षद और पंचायत के चुनाव में बेमुशार धन खर्च किया जाता है। भारत में चुनाव लड़ना किसी वित्तीय प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने से कम नहीं है, बावजूद इसके कि चुनाव आयोग ने खर्च की सीमा तय कर रखी है।

कहने की जरूरत नहीं कि चुनावी चंदे में बढ़ता असंतुलन लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now