बंगाल में ईडीः संदेह और सियासत

January 9, 2026 9:27 PM
ED Raid Kolkata

मई, 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से केंद्रीय जांच एजेंसियों, खासतौर से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) पर विपक्ष के नेताओं को सियासी कारणों से परेशान करने के जो आरोप लगते आए हैं, उस क्रम में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति का काम देखने वाली कंपनी आई-पैक पर की गई कार्रवाई ताजा कड़ी है।

ईडी ने यह कार्रवाई कोयला घोटाले के सिलसिले में की है और उसका आरोप है कि आई-पैक से जुड़े लोगों को इसके जरिये फायदा पहुंचाया गया था। बृहस्पतिवार को जैसे ही ईडी की टीम कोलकाता में आई-पैक के ठिकानों पर पहुंची, तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पुलिस बल के साथ न केवल वहां पहुंच गई, बल्कि उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी आगामी विधानसभा चुनाव से संबंधित उनकी पार्टी की रणनीति से जुड़े दस्तावेज लेने आई है। ममता वहां से कुछ फाइलें वगैरह भी अपने साथ लेती गई हैं।

यही नहीं, आई-पैक की ओर से ईडी के खिलाफ चोरी का मामला भी दर्ज करवाया गया है। दूसरी ओर ईडी भी कोलकाता हाई कोर्ट पहुंच गई, जहां कोर्ट ने तुरंत सुनवाई करने से इनकार कर दिया। ईडी की कार्रवाई और उसके बाद के घटनाक्रम को पश्चिम बंगाल में तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखें, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।

ईडी की कार्रवाई का ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल ने कोलकाता से लेकर राजधानी दिल्ली तक जिस तरह से विरोध किया है, वह दिखाता है कि वह सियासी रूप से इसका जवाब देना चाहती हैं। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को सीधे चुनौती दी है और यहां तक दावा किया है कि उनके पास उनके खिलाफ सबूत हैं। उनका दावा है कि कोयला घोटाले से पश्चिम बंगाल में अमित शाह के करीबी भाजपा नेता सुवेंदू अधिकारी को लाभ पहुंचाया गया है।

दरअसल प्रवर्तन निदेशालय जैसी केंद्रीय संस्था संदेह के घेरे में है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि मामलों को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने की उसकी दर बेहद कम है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट तक उसे हिदायत दे चुका है कि वह कानून की हदों में रहकर काम करे। बीते कुछ वर्षों में विपक्ष शासित राज्यों में और विपक्षी नेताओं के खिलाफ जिस तरह से ईडी ने कार्रवाइयां की हैं, उसने उसकी साख को संदेह के घेरे में ला दिया है।

बेशक, यह अदालत में ही तय होना है कि ईडी आईपैक के खिलाफ अपनी जांच को कहां तक ले जा पाती है। लेकिन इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि इसका असर पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है। तृणमूल कांग्रेस ने जिस आक्रामक तरीके से ईडी का विरोध किया है, उससे साफ है कि यह संघर्ष आने वाले समय में और तेज होगा।

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