राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की हाल की बंगाल यात्रा के दौरान कथित तौर पर प्रोटोकाल के उल्लंघन को लेकर उठे विवाद में उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के बीच सार्वजनिक रूप से हुए इस विवाद से बचा जाना चाहिए था। इसका सबसे अप्रिय पहलू यह है कि राष्ट्रपति के पद की गरिमा का भी खयाल नहीं रखा गया है।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि केंद्र की मोदी सरकार और पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार के बीच सामान्य औपचारिक संवाद तक की स्थिति नहीं बची है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति जिस अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में आई थीं, वह एक निजी संस्था का कार्यक्रम था और उसकी जानकारी तक राज्य सरकार को नहीं दी गई थी। यदि ऐसा है, तो यह उतना ही गंभीर आरोप है, जितना सामान्य प्रोटोकाल के तहत राष्ट्रपति के कार्यक्रम में राज्य सरकार के किसी मंत्री का न पहुंचना।
खुद राष्ट्रपति ने कार्यक्रम में ममता बनर्जी की अनुपस्थिति का जिक्र किया।
इस घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी से लेकर समूची भाजपा जिस तरह से ममता बनर्जी पर हमलावर है, उसने इसे राजनीतिक रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही चुनाव हैं, तो इस टकराव के राजनीतिक संदेश भी साफ हैं।
दरअसल बात सिर्फ संवैधानिक संस्थानों और चुनी हुई सरकारों के बीच संवादहीनता की नहीं, बल्कि एक दूसरे के सम्मान से जुड़ी है, जिसका क्षऱण लगातार हो रहा है।
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