नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के सिलसिले में पांच साल से भी लंबे समय से जेल में बंद छात्र नेता पीएचडी स्कॉलर उमर खालिद और दिल्ली आईआईटी के पूर्व छात्र शरजील इमाम को देश की सर्वोच्च अदालत से जमानत न मिलना बेहद तकलीफदेह है। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने हालांकि इस मामले में पांच छात्रों को बेहद कठोर शर्तों के साथ जमानत दी है, लेकिन उमर और शरजील के मामले को अत्यंत गंभीर माना है।
ठीक यही समय है, जब हत्या और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में दोषी ठरहराए जा चुके कथित बाबा राम रहीम को पंद्रहवीं बार पैरोल पर रिहा किया गया है। यह कोई तुलना की बात नहीं है, यह भारत में न्याय व्यवस्था की तस्वीर है।
केंद्र की मोदी सरकार ने 2019 में जब नागरिकता संशोधन कानून लागू कर पड़ोसी देशों के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का विरोध किया था, तो उसके विरोध में दिल्ली सहित देश के कई हिस्से में प्रदर्शन हुए थे। इन्हीं प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली में दंगे भड़क उठे थे, जिसमें अनेक लोग मारे गए थे।
निस्संदेह दंगों और उनमें हुई मौतों के लिए जिम्मेदार लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन इस मामले में अभियोजन जिस तरह से जांच कर रहा है और जिस तरह से गिरफ्तारियां की गई हैं, उन्हें लेकर सवाल उठते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने उमर और शरजील की दंगों में कथित भूमिका को बेहद गंभीर माना है और कहा है कि गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) कानून 1967 यानी यूएपीए के तहत उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। जाहिर है, मामला गंभीर है। लेकिन इसके बावजूद इस मामले में पांच साल से भी अधिक का वक्त हो चुका है और अभी अभियोजन ने आरोप पत्र तक दाखिल नहीं किया है। यानी इस मामले में सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है।
असल में तकलीफ इसी बात की है कि बिना सुनवाई के ही ये दो छात्र नेता पांच साल से भी अधिक समय से जेल में हैं। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि सारी गवाहियां हो जाने या एक साल बाद ही वे जमानत की दोबारा अर्जी दे सकते हैं। यानी छह साल तक इन दोनों को जेल में रहना ही है।
जबकि अतीत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बेल इज रूल, जेल एक्स्पेशन (यानी जमानत नियम है, जेल अपवाद)। उमर और शरजील के साथ जो हो रहा है, उसे भारत की न्याय व्यवस्था के लिए प्रचलित एक और उक्ति से जोड़कर भी देखा जा सकता है, कि प्रक्रिया ही सजा है।
क्या यह सवाल अभियोजन से भी नहीं किया जा सकता कि वह जल्द से जल्द इस मामले में आरोपपत्र दाखिल करे, ताकि मामले की सुनवाई शुरू हो सके? आखिर इस मामले से एक उदार संवैधानिक लोकतंत्र के रूप में देश की साख भी जुड़ी हुई है।











