सरकार के भोंपू से और क्या उम्मीद करेंगे

DD News Anchor Ashok Srivastava

स्वायत्त संस्था प्रसार भारती के अधीन सरकारी खर्चे से चलने वाले डीडी न्यूज के एक एंकर अशोक श्रीवास्तव का लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला वायरल वीडियो इस सरकारी प्रसारक के संस्थागत क्षरण का ही एक और उदाहरण है।

एक बहस के दौरान इस एंकर ने अंग्रेजों से माफी मांगने वाले हिंदुत्व के वास्तुकार दामोदार विनायक सावरकर के कशीदे पढ़ते हुए बेहद उत्तेजित स्वरों में राहुल गांधी के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस एंकर ने राहुल गांधी के लिए यहां तक कह दिया कि, वह सावरकर की चप्पल में लगी धूल के कण के बराबर भी नहीं हैं!

पूछा जा सकता है कि करदाताओं के पैसे से चलने वाले सरकारी डीडी न्यूज के एक एंकर को यह अधिकार किसने दे दिया कि वे संवैधानिक पद पर बैठे लोकसभा में विपक्ष के नेता पर ऐसी टिप्पणी करने की हिमाकत करें।

दरअसल यह पहला मौका नहीं है, जब अशोक श्रीवास्तव ने कांग्रेस और विपक्ष के नेताओं पर ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणी की हो। इससे पहले पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के समय उन्होंने डीडी न्यूज पर आने वाले अपने कार्यक्रम ‘दो टूक’ में कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और सांसद इमरान मसूद को ‘देश के गद्दार’ तक बता चुके हैं!

जाहिर है, राहुल पर आपत्तिजनक और अस्वीकार्य टिप्पणी करने के बावजूद अशोक श्रीवास्तव पर सरकार और प्रसार भारती की ओर से किसी तरह की कार्रवाई की कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वास्तव में अशोक श्रीवास्तव ने मर्यादा की उस लकीर को लांघ दिया है, जिसकी हिम्मत चौबीस घंटे मोदी सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कीर्तन करने वाले खबरिया चैनलों ने भी नहीं की थी। दरअसल हम जिस दौर में हैं, उसमें सार्वजनिक शुचिता और मर्यादा के मापदंड के उल्लंघन को ही आगे बढ़ने और सत्ता के नजदीक पहुंचने का जरिया मान लिया गया है।

बेशक, दूरदर्शन के जमाने से प्रसार भारती पर सरकार का प्रचार करने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन 1965 में पांच मिनट के बुलेटिन से शुरू हुए इस साठ साल के सफर में ऐसा पतन कभी नहीं देखा गया। सरकारी प्रचारतंत्र और बोझिल प्रस्तुतियों के बावजूद दूरदर्शन या डीडी न्यूज ने कुछ बरस पहले तक संवैधानिक गरिमा और शुचिता के साथ ही देश के धर्मनिरपेक्ष मिजाज को बनाए रखा था। हाल ही में दुनिया से रुखसत करने वाली दूरदर्शन की समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी को लोग उनकी सौम्यता और गरिमापूर्ण समाचार प्रस्तुति के लिए ही याद कर रहे थे।

कहने की जरूरत नहीं कि डीडी न्यूज में बहसों और कार्यक्रम का स्तर लगातार गिरा है और अब यह खुलेआम आरएसएस की हिंदुत्व और बहुसंख्यक राजनीति की विचारधारा का प्रचार करने से गुरेज नहीं करता। प्रसार भारती के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी जवाहर सिरकार ने थोड़े दिनों पहले प्रसार भारती का भयावह चित्रण करते हुए उसे “200 फीसदी सरकारी” करार दिया था और कहा था कि इसने संसद द्वारा प्रदत्त और सुप्रीम कोर्ट से समर्थित स्वायत्तता खो दी है।

बेशक, पहले का दूरदर्शन हो या आज का डीडी न्यूज, ये पूरी तरह से स्वतंत्र कभी नहीं रहे, लेकिन आज वह जिस तरह से सरकार के भोंडे प्रचार का भोंपू बन गया है, यह उसके पतन की पराकाष्ठा ही है। इस क्रम में यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रसार भारती ने 2012 में सौ करोड़ रुपये की कथित वसूली के मामले में जेल जा चुके सुधीर चौधरी को 15 करोड़ रुपये सालाना के पैकेज पर रखा है। आखिर अशोक श्रीवास्तव या सुधीर चौधरी जैसे डीडी न्यूज के कर्मियों की जवाबदेही किसके प्रति है? यह सवाल बार-बार पूछा जाना चाहिए।

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