बड़ी अदालत ने खड़े किए हाथ, छत्तीसगढ़ में लगी रहेगी पादरियों और ईसाई आदिवासियों के प्रवेश पर रोक वाली होर्डिंग्स

February 16, 2026 6:16 PM
Chhattisgarh Christian tribals

नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका खारिज कर दी है, जिसमें ग्राम सभा द्वारा आदिवासी गांवों में पादरियों और परिवर्तित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले होर्डिंग्स को बरकरार रखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने आज छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें ग्राम सभा द्वारा गांव के प्रवेश द्वारों पर होर्डिंग/नोटिस बोर्ड लगाकर ईसाई पादरियों और परिवर्तित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने को वैध ठहराया गया था। यह कार्रवाई गांव वासियों को जबरदस्ती या प्रलोभन देकर धर्मांतरण से रोकने के उद्देश्य से की गई थी।

याचिका दिग्बल तांडी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य के तहत दायर की गई थी। मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंसाल्वेस और प्रतिवादियों की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश कीं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले के पैरा 34 का हवाला दिया, जिसमें याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारी ग्राम सभा के समक्ष जाने की छूट दी गई थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट में याचिका सीमित थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में कई नई बातें और आयाम जोड़े गए हैं, इसलिए याचिकाकर्ता हाई कोर्ट में दोबारा जा सकते हैं।

कोलिन गोंसाल्वेस ने कहा कि हाई कोर्ट ने ईसाई पादरियों और परिवर्तित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक नहीं घोषित किया। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में मिशनरी गतिविधियों पर हाई कोर्ट की टिप्पणियों पर सवाल उठाया कि वे किसी सामग्री पर आधारित नहीं हैं।

गोंसाल्वेस ने अन्य लंबित मामलों का जिक्र किया जैसे पादरियों पर हमलों, परिवर्तित आदिवासियों को गांव में दफनाने से रोक, और शवों को निकालकर कहीं और ले जाने से संबंधित याचिकाएं।उन्होंने दावा किया कि पिछले 10 वर्षों में छत्तीसगढ़ में किसी भी धार्मिक रूपांतरण मामले में एक भी दोषसिद्धि नहीं हुई है। जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की, “आपको नियमों के तहत उचित प्राधिकारी के पास जाना चाहिए था वे शपथ-पत्रों, सामग्री और सबूतों पर मामले की जांच करते।”

पीठ याचिकाकर्ता की दलीलों से संतुष्ट नहीं हुई और याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने ग्राम सभा की इस कार्रवाई को बरकरार रखा था, जिसमें जबरदस्ती या प्रलोभन से धर्मांतरण रोकने के लिए होर्डिंग्स लगाए गए थे, और इसे असंवैधानिक नहीं माना गया था।

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