पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजे आने के बाद भड़की हिंसा अप्रत्याशित नहीं है, लेकिन फर्क यह है कि इस बार चुनाव के दौरान अभूतपूर्व तरीके से पूरे राज्य में ढाई लाख सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी और इसके बावजूद नतीजे आने के तुरंत बाद से राज्य के कई हिस्सों से हिंसा की खबरें आने लगीं। खुद तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके साथ हाथापाई का आरोप लगाया ही है।
तृणमूल कांग्रेस के दफ्तरों, उसके नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के घरों को उन्मादी भीड़ द्वारा निशाना बनाने की विचलित करने वाली तस्वीरें आ रही हैं। यह उस उन्माद का ही नतीजा है, जिसने चुनाव से पहले ही राज्य को अपनी जद में लिया था। दूसरी ओर भाजपा ने भी आरोप लगाया है कि उसके समर्थकों और कार्यकर्ताओं को तृणमूल के समर्थकों ने निशाना बनाया है।
बेशक, बंगाल में राजनीतिक हिंसा की संस्कृति नई नहीं है और इसका लंबा इतिहास है। वाम मोर्चा के लंबे शासन के दौरान भी ऐसी हिंसा देखी गई थी और तृणमूल कांग्रेस के डेढ़ दशक के शासन के दौरान भी।
याद दिलाने की जरूरत नहीं कि 2011 में वाम मोर्चा को सत्ता से बेदखल करने के बाद किस तरह से माकपा और अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्तरों और उनसे जुड़े लोगों के घरों पर तृणमूल समर्थकों ने हमले और आगजनी की थी। यहां तक कि 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल की जीत के बाद भी राज्य के विभिन्न हिस्सों से हिंसा की खबरें आई थीं।
बंगाल से अभी ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह से तृणमूल द्वारा कब्जा कर लिए गए माकपा और कांग्रेस के दफ्तरों को अभी कई साल बाद मुक्त कराया गया है।
इस बार देखा जा सकता है कि भाजपा के समर्थक किस तरह से हमलावर हैं। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि किस तरह से ट्रेन के भीतर भगवाधारी भाजपा समर्थक तलवारें लहरा रहे हैं, घरों में आगजनी कर रहे हैं और तृणमूल समर्थक एक अकेली महिला को घेरकर उग्र नारे लगा रहे हैं।
हालत यह है कि जिन शुभेंदु अधिकारी को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार बताया जा रहा है, वह खुलेआम कह रहे हैं कि वे सिर्फ नंदीग्राम के हिंदुओं के लिए काम करेंगे, क्योंकि मुस्लिमों ने तृणमूल को वोट दिए हैं! यही नहीं, पश्चिम बंगाल भाजपा के नेता दिलीप घोष तो प्रधानमंत्री मोदी के नारे ‘सबका साथ सबका विकास’ की धजिज्यां उड़ाते हुए कह रहे हैं, कि अब सबका हिसाब!
ऐसे हालात में पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। यह वाकई चिंता की बात है कि चुनाव के तुरंत बाद भड़की हिंसा में राज्य के विभिन्न हिस्सों में चार लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें तृणमूल और भाजपा दोनो के समर्थक हैं।
दरअसल इस बदतर हालात के लिए खुद चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता, बावजूद इसके कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने हिंसा फैलाने वालों की गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं। उनसे पूछा जा सकता है कि जब पूरे राज्य में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल तैनात थे, तो कैसे उन्माद में डूबे लोग सड़कों पर उतर आए? आखिर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?
अच्छा होता कि खुद सुप्रीम कोर्ट बंगाल के हालात का संज्ञान ले ताकि इस उन्माद को रोका जा सके।
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