दिल्ली की एक अदालत ने आज कांग्रेस नेता सोनिया गांधी (Sonia Gandhi)के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार करने वाले मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। आरोप है कि उन्होंने भारतीय नागरिकता मिलने से तीन साल पहले 1980 की मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाया था और इसके लिए जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया था।
द्वारका कोर्ट के विशेष न्यायाधीश विशाल गोग्ने ने कहा कि वह आदेश पूरी तरह से तर्कसंगत आदेश नहीं था और उसमें उचित कारण नहीं दिए गए थे।अदालत ने मामला वापस एसीजेएम कोर्ट को भेज दिया और निर्देश दिया कि पक्षों की सुनवाई करने, जांच करने और संबंधित पुलिस अधिकारी की सुनवाई के बाद एक तर्कसंगत आदेश पारित किया जाए।
मामला 29 सितंबर को एसीजेएम के समक्ष सूचीबद्ध होगा
आज आदेश सुनाते हुए न्यायाधीश गोग्ने ने कहा कि कानून किसी भी न्यायिक आदेश का पहला प्रेम होता है और किसी भी आदेश को तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।अदालत ने कहा कि मतदाता या गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में छेड़छाड़ या धोखाधड़ी से शामिल करने का कोई भी आरोप इस बात पर तर्कसंगत आदेश की मांग करता है कि जालसाजी या धोखाधड़ी के आरोप बनते हैं या नहीं।अदालत ने यह भी कहा कि आक्षेपित आदेश में इस बात पर कोई चर्चा नहीं की गई कि गांधी का नाम 1980, 1982 और 1983 की मतदाता सूचियों में किस क्रम में शामिल किया गया, हटाया गया या फिर शामिल किया गया, और शिकायत
को पूरी तरह क्यों खारिज कर दिया गया।
न्यायाधीश ने कहा कि एसीजेएम द्वारा पारित आदेश में संज्ञेय अपराध के प्रकटीकरण पर मन का पूर्ण अनुप्रयोग नहीं किया गया।अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आक्षेपित आदेश कानून में स्पष्ट त्रुटि से ग्रस्त है, क्योंकि संबंधित पुलिस अधिकारी की दलीलें नहीं सुनी गईं और संबंधित पुलिस स्टेशन से स्थिति रिपोर्ट नहीं मंगाई गई।
अदालत ने कहा कि आक्षेपित आदेश तथ्यात्मक आरोपों के संबंध में अपनी प्रकृति के कारण निष्क्रिय हो गया और नागरिकता के संबंध में केंद्र सरकार की शक्तियों तथा मतदाता सूचियों के संबंध में चुनाव आयोग की शक्तियों पर एसीजेएम का तर्क पूरी तरह अनुचित और गलत था।
एसीजेएम के आदेश को रद्द करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि वह बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने की प्रार्थना पर विचार करने के लिए एसीजेएम की जगह नहीं ले सकती।
अदालत ने कहा कि ऐसा कार्य केवल मजिस्ट्रेट ही कर सकता है और पुनरीक्षण न्यायालय न्यायिक मजिस्ट्रेट का स्वरूप धारण नहीं कर सकता।तदनुसार अदालत ने जांच करने के बाद स्पीकिंग आदेश पारित करने के लिए मामला एसीजेएम को वापस भेज दिया।न्यायाधीश ने एसीजेएम को निर्देश दिया कि वह गांधी के खिलाफ शिकायत में लगाए गए आरोपों के प्रकटीकरण या अन्यथा पर स्पीकिंग आदेश दे।
यह आदेश विकास त्रिपाठी द्वारा गांधी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग करते हुए दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर पारित किया गया है। उन्होंने 11 सितंबर 2025 को पारित एसीएमएम आदेश को चुनौती दी थी।त्रिपाठी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बर्मन पेश हुए।त्रिपाठी का मामला यह था कि गांधी का नाम 1980 में नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल किया गया था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 1983 में मिली थी।
उनका कहना था कि गांधी का नाम 1982 में मतदाता सूची से हटा दिया गया और 1983 में फिर शामिल किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता ने मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और उनके खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की।आक्षेपित आदेश में निचली अदालत ने कहा था कि वह गांधी के खिलाफ FIR की मांग वाली याचिका पर विचार करके भारत के चुनाव आयोग के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
अदालत ने कहा था कि धोखाधड़ी या जालसाजी के वैधानिक तत्वों को आकर्षित करने के लिए आवश्यक विशिष्टताओं के बिना केवल खोखले आरोप कानूनी रूप से टिकाऊ आरोप का स्थान नहीं ले सकते, क्योंकि त्रिपाठी केवल 1980 की कथित अनप्रमाणित मतदाता सूची के उद्धरण की फोटोकॉपी पर निर्भर थे।







