एसआईआरः अमर्त्य सेन की तो सुन लें

January 24, 2026 9:32 PM
Amartya Sen on SIR

ऐसे समय जब देश 77 वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है, नोबेल विजेता अमर्त्य सेन ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद को लेकर गहरी चिंता जताई है और आगाह किया है कि जिस तरह की हड़बड़ी दिखाई जा रही है, उससे लोकतांत्रिक भागीदारी कम पड़ सकती है।

92 बरस के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खासे सम्मान के साथ देखे जाने वाले अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की इस चिंता में अंतर्निहित चेतावनी को समझने की जरूरत है। उनका कहना है कि चूंकि पश्चिम बंगाल में कुछ महीने बाद ही चुनाव हैं, लिहाजा यह प्रक्रिया और सावधानी से और पर्याप्त समय लेकर की जा सकती थी।

पिछले साल जून में जब केंद्रीय चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बिहार में एसआईआर करवाने का ऐलान किया था, तभी से यह सवाल उठते रहे हैं कि क्या यह कवायद पूरी पारदर्शिता के साथ देश के सारे वैध मतदाताओं को मतदाता सूची में जोड़ने में सफल होगी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी गया और संसद में भी उठा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता लगातार चुनाव आयोग की इस कवायद को लेकर संदेह जताते रहे हैं।

बेशक एसआईआर के बाद बिहार में चुनाव भी हो गए, इसके बावजूद एसआईआर को लेकर उठे सवालों के जवाब नहीं मिले हैं। दरअसल ये सारी चिंताएं लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर ही हैं, जैसा कि अमर्त्य सेन ने कहा है।

हैरत नहीं कि चुनाव आयोग ने जिन लोगों को अपना वजूद साबित करने का नोटिस भेजा उनमें अमर्त्य सेन सभी शामिल हैं! कोलकाता स्थित शांतिनिकेतन के मतदाता हैं और पिछले कुई चुनावों में वहां वोट भी डाल चुके हैं।

बिहार के बाद जिन 12 राज्यों में एसआईआर की कवायद चल रही है, वहां 15 से 17 फीसदी मतदाताओं के नाम कट चुके हैं। इनमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश की है, जहां ड्राफ्ट सूची में करीब करीब 2.89 करोड़ लोगों के नाम कट गए हैं और यह संख्या छत्तीसगढ़ जैसे मझोले राज्य की आबादी के करीब है।

सवाल यह नहीं है कि जिन लोगों के नाम कटे हैं, उनके पास जरूरी कागजात दिखाकर अपने नाम जुड़वाने के मौके हैं। जब इस व्यवस्था ने अमर्त्य सेन तक को नहीं बख्शा तो कल्पना की जा सकती है कि वंचित और हाशिये के लाखों लोगों को कैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होगा, जिनके पास जरूरी कागज नहीं हैं।

चुनाव आयोग से पूछा जाना चाहिए कि ऐसे लोगों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी।

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