रायपुर। जिस टाटा पावर समूह (Tata Power) की एक कंपनी ने छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण के लिए पैरलल लाइसेंस मांगा है, उसी टाटा पावर के बारे में एक बड़ा खुलासा हम यहां करने जा रहे हैं। पैरलल लाइसेंस मांगने वाले टाटा पावर की दिल्ली की एक कंपनी ने बंद हो चुके पावर प्लांट की बची हुई पूंजीगत लागत बिजली उपभोक्ताओं से टैरिफ के जरिए वसूलने की कोशिश की थी। उसकी इस कोशिश को सुप्रीम कोर्ट से इसी साल झटका भी लगा है। उसके बाद ही टाटा पावर समूह की एक और कंपनी ने छत्तीसगढ़ में बिजली सप्लाई के लिए पैरलल लाइसेंस का आवेदन किया है।
दरअसल, दिल्ली के रिठाला पावर प्लांट से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई 2026 को अपिलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी (APTEL) के टाटा पावर के पक्ष में दिए फैसले को पलटते हुए दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (DERC) का पुराना आदेश बहाल कर दिया था।
इसी बीच द लेंस ने छत्तीसगढ़ में टाटा पावर की पैरलल बिजली वितरण की कोशिश का खुलासा किया है। टाटा पावर समूह की कंपनी TP पॉवर प्लस ने रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसीलों में बिजली वितरण के लिए पैरलल लाइसेंस मांगा है।
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कंपनी ने 15 जून 2026 को छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग यानी CSERC में आवेदन किया है। 15 जुलाई को इस पर पहली सुनवाई भी हुई। अब 1 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:30 बजे जनसुनवाई होगी। द लेंस के खुलासे के बाद अब बिजली इंजीनियरों और कर्मचारी संगठनों ने भी इस आवेदन का विरोध शुरू कर दिया है।
DERC के फैसले को APTEL ने पलटा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रखा बरकरार
मामला दिल्ली के रिठाला स्थित एक पावर प्लांट की पूंजीगत लागत से जुड़ा था। इस प्लांट से मार्च 2018 के बाद उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई बंद हो चुकी थी। लेकिन, टाटा की दिल्ली कंपनी ने प्लांट की बची हुई पूंजीगत लागत को डेप्रिसिएशन के जरिए टैरिफ में वसूलने की कोशिश की।
रिठाला पावर प्लांट को दिल्ली में 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर तैयार किया गया था। इसके संचालन की अवधि शुरू से ही करीब 5 से 6 साल रखने की योजना थी। प्लांट ने फरवरी 2011 में ओपन साइकिल मोड और सितंबर 2011 में कंबाइंड साइकिल मोड में व्यावसायिक संचालन शुरू किया था।
आयोग ने प्लांट की तकनीकी उपयोगी उम्र 15 साल रखी, लेकिन दिल्ली सरकार ने इस प्लांट को अस्थायी तौर पर केवल 5-6 साल के लिए मंजूरी दी थी। इसलिए DERC ने प्लांट की बिजली उत्पादन और टैरिफ रिकवरी की अवधि को मार्च 2018 तक सीमित कर दिया।
इसके बाद जब TPDDL ने प्लांट के खर्च का ट्रू-अप मांगा, तो DERC ने कहा कि मार्च 2018 के बाद जब प्लांट से बिजली की सप्लाई बंद हो गई, तब उसके बाद की लागत को उपभोक्ताओं के टैरिफ में नहीं डाला जा सकता।
TPDDL इस फैसले से संतुष्ट नहीं था और उसने APTEL में अपील की। 2025 में APTEL ने TPDDL के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि 15 साल की उपयोगी उम्र के आधार पर पूरी पूंजीगत लागत को डिप्रिसिऐशन के जरिए वसूलने की अनुमति दी जानी चाहिए।
APTEL के फैसले के खिलाफ DERC सुप्रीम कोर्ट पहुंची। 7 मई 2026 को हुई सुनवाई में शीर्ष कोर्ट ने APTEL का फैसला पलट दिया और DERC का 11 नवंबर 2019 वाला आदेश बहाल कर दिया। यानी कंपनी की लागत को टैरिफ के जरिए उपभोक्ताओं से वसूलने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर नहीं किया।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने टाटा पावर को लाइसेंस देने का किया विरोध
पैरलल बिजली वितरण लाइसेंस को लेकर कर्नाटक का उदाहरण भी अब छत्तीसगढ़ में दिया जा रहा है। टाटा पावर ने कर्नाटक के 19 जिलों में समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। इसके खिलाफ राज्य की बिजली कंपनियों, इंजीनियरों और कर्मचारी संगठनों ने विरोध किया। AIPEF समेत विभिन्न संगठनों ने भी आपत्ति दर्ज कराई थी।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने भी निजी कंपनी को बिजली वितरण के क्षेत्र में प्रवेश देने के प्रस्ताव का विरोध किया। इसके बाद 3 जुलाई 2026 को KERC की सुनवाई के दौरान टाटा पावर ने अपना आवेदन वापस लेने की जानकारी दी।
विरोध करने वाले संगठनों की चिंता थी कि निजी कंपनी अगर ज्यादा भुगतान करने वाले औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं को अपने साथ लेती है तो सरकारी बिजली कंपनियों के पास कम राजस्व वाले और सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं का बोझ बढ़ सकता है।
द लेंस के खुलासे के बाद छत्तीसगढ़ में भी बिजली संगठनों ने इसी तरह के संभावित आर्थिक असर को लेकर सवाल उठाए हैं।
महाराष्ट्र में भी अडानी को अब तक नहीं मिला पैरलल लाइसेंस
महाराष्ट्र में भी निजी कंपनियों के समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस के आवेदन सामने आए हैं।
महाराष्ट्र में अडानी की कंपनी ने 2022 में पैरलल बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। MERC ने आवेदन स्वीकार किया, आपत्तियां और सुझाव मांगे और जुलाई 2025 में सार्वजनिक सुनवाई भी हुई। लेकिन सुनवाई के बाद अब तक लाइसेंस देने का अंतिम आदेश सामने नहीं आया है। ऐसे में आवेदन फिलहाल अंतिम निर्णय के इंतजार में है।
इसके अलावा टाटा पावर और टोरेंट पावर के भी महाराष्ट्र के अलग-अलग क्षेत्रों के लिए समानांतर वितरण लाइसेंस के आवेदन सामने आए हैं।
महाराष्ट्र में अलग-अलग आवेदन नियामक प्रक्रिया और सुनवाई के दौर से गुजरे हैं।
हरियाणा में भी इलेवन पावर ने गुरुग्राम और नूंह के लिए पैरलल वितरण लाइसेंस मांगा है। HERC ने जुलाई में इस मामले में तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई थी। समिति ने अब कुछ शर्तों के साथ लाइसेंस दिए जाने की सिफारिश की है। AIPEF ने समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।
इन उदाहरणों के बीच द लेंस ने छत्तीसगढ़ के मामले को सामने लाकर यह सवाल उठाया है कि राज्य में निजी कंपनी के समानांतर बिजली वितरण की अनुमति का CSPDCL और आम उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?
निजी हाथों में बिजली सप्लाई सौंपने पर CSPDCL पर पड़ेगा असर
द लेंस की खबर सामने आने के बाद छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल अभियंता संघ ने टाटा पावर के आवेदन का विरोध शुरू कर दिया है। संघ ने स्पष्ट किया है कि वह आवेदन निरस्त होने तक विरोध जारी रखेगा।
संघ के महासचिव मनोज वर्मा का कहना है कि यह केवल कर्मचारियों का मुद्दा नहीं है, बल्कि प्रदेश की सार्वजनिक बिजली व्यवस्था और उपभोक्ताओं से जुड़ा विषय है। दशकों से सरकारी निवेश और जनता के पैसे से तैयार बिजली नेटवर्क में निजी कंपनी को प्रवेश मिलने पर इसका आर्थिक असर CSPDCL पर पड़ेगा।
संघ की चिंता है कि अगर निजी कंपनी लाभ वाले उपभोक्ताओं को अपने साथ लेती है तो सरकारी कंपनी के सामने किसानों, घरेलू उपभोक्ताओं और अन्य सब्सिडी वाले वर्गों की जिम्मेदारी बनी रहेगी। ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ने भी इसका विरोध किया और कमीशन को नोट जारी किया है कि वह भी जनसुनवाई के दिन पैरलल लाइसेंस का विरोध करेगी।
अब सभी की नजर 1 अक्टूबर 2026 की CSERC की जनसुनवाई पर है।
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