द लेंस की खबर से मचा हड़कंप, छत्तीसगढ़ में टाटा पावर की एंट्री के खिलाफ यूनियनों ने खोला मोर्चा

The Lens

रायपुर। छत्तीसगढ़ में बिजली के बढ़े हुए बिलों ने लोगों के घर का बजट बिगाड़ दिया है। कई उपभोक्ता दो-तीन गुना तो कहीं चार गुना तक बिल आने की शिकायत कर रहे हैं और इसे लेकर जगह-जगह विरोध भी हो रहा है। वहीं, हाफ बिजली बिल योजना का लाभ नहीं मिलने और लगातार बढ़ती बिजली दरों को लेकर भी उपभोक्ताओं में नाराजगी है।

ऐसे समय में अब बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनी की एंट्री का मामला सामने आया है। टाटा पावर की कंपनी टीपी पॉवर प्लस ने रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसील में बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया है।

छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण के क्षेत्र में टाटा पावर की एंट्री की खबर The Lens ने सबसे पहले बताई। इस खबर के बाद प्रदेश की सियासत से लेकर बिजली कर्मचारियों तक हड़कंप मच गया है।

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जिस आवेदन को अब तक एक नियामक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा था… वह अब सरकारी बिजली व्यवस्था के भविष्य, निजीकरण और उपभोक्ताओं की जेब से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।

छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग यानी CSERC ने इस आवेदन को 89/2026 के रूप में दर्ज किया है। 15 जून को दिए गए इस आवेदन पर 15 जुलाई को सुनवाई हो चुकी है और अब 1 अक्टूबर को सुबह 11:30 बजे जनसुनवाई होगी। द लेंस की रिपोर्ट के बाद बिजली इंजीनियरों के संगठन और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए सरकार और आयोग के सामने कई सवाल उठाए हैं।

द लेंस ने अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में बताया था कि टाटा पावर की कंपनी टीपी पॉवर प्लस ने छत्तीसगढ़ विद्युत नियामक आयोग यानी CSERC के सामने बिजली वितरण लाइसेंस के लिए आवेदन किया है।

आवेदन रायपुर, धरसींवा, मंदिर हसौद और अभनपुर तहसील क्षेत्रों के लिए है। CSERC ने इसे आवेदन क्रमांक 89/2026 के तौर पर रजिस्टर किया है।

इसके लिए 1 अक्टूबर को इस आवेदन पर जनसुनवाई होने जा रही है।

द लेंस की खबर सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा। इसके अलावा बिजली इंजीनियरों और कर्मचारियों के संगठन ने विरोध का ऐलान कर दिया।

और अब सवाल उठने लगा है— क्या छत्तीसगढ़ की सरकारी बिजली वितरण व्यवस्था में निजी कंपनी के प्रवेश की तैयारी हो रही है?

द लेंस की रिपोर्ट के बाद ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने टाटा पावर के आवेदन का कड़ा विरोध किया है। फेडरेशन का कहना है कि वह आयोग के सामने इस आवेदन के खिलाफ विस्तृत आपत्ति दाखिल करेगा।

फेडरेशन के चेयरमैन इंजीनियर शैलेन्द्र दुबे ने बिजली वितरण के निजीकरण के किसी भी प्रयास के खिलाफ विरोध की बात कही है। वहीं फेडरेशन के संरक्षक पी.एन. सिंह ने भी कई गंभीर सवाल उठाए हैं।

फेडरेशन चेयरमैन शैलेंद्र दुबे ने कहा कि चैरी पिकिंग यानी निजी कंपनी अगर ज्यादा राजस्व वाले और फायदे वाले उपभोक्ताओं को अपने वितरण क्षेत्र में लेना शुरू करती है, तो सरकारी कंपनी CSPDCL की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ेगा?

फेडरेशन के संरक्षक और छत्तीसगढ़ रिटायर्ड पॉवर इंजीनियर्स एंड ऑफिसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष पीएन सिंह ने कहा कि बिजली सप्लाई का काम निजी कंपनियों के हाथों जाने पर क्रॉस-सब्सिडी, सरकारी नेटवर्क के इस्तेमाल, CSPDCL की वित्तीय स्थिति, बिजली दरों और सभी वर्गों को बिजली देने की सरकारी कंपनी की जिम्मेदारी उठाने में दिक्कत होगी।

इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि अगर सरकारी बिजली कंपनी के पास कमाई वाले उपभोक्ता कम होते गए, तो किसानों और कमजोर वर्गों को मिलने वाली क्रॉस-सब्सिडी व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

इस खबर के बाद अब कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनियों को लाने की तैयारी की जा रही है। दीपक बैज का कहना है कि बिजली अतिआवश्यक सार्वजनिक सेवा है और इसका प्रत्यक्ष नियंत्रण सरकार के पास होना चाहिए।

उन्होंने सरकार के बिजली कंपनियों से जुड़े निवेश और बॉन्ड संबंधी फैसलों को भी निजीकरण की दिशा से जोड़ते हुए सवाल उठाए हैं।

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक नहीं… उपभोक्ता का है।

बिजली कंपनी से जुड़े अफसरों का इस मुद्दे पर सवाल है कि अगर निजी कंपनी को बिजली वितरण का लाइसेंस मिलता है तो क्या बिजली सस्ती होगी? क्या सेवा बेहतर होगी? क्या शिकायतों का समाधान तेजी से होगा? क्या आने वाले समय में उपभोक्ताओं के बिजली बिल पर इसका कोई असर पड़ेगा?

अभी इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है। क्योंकि टाटा पावर को अभी लाइसेंस मिला नहीं है। आवेदन CSERC के सामने विचाराधीन है और अंतिम फैसला आयोग को करना है।

अब इस पूरे मामले में अगली बड़ी तारीख है 1 अक्टूबर 2026। सुबह 11:30 बजे CSERC के कार्यालय में जनसुनवाई होगी।

यानी अब उपभोक्ताओं, कर्मचारियों और दूसरे हितधारकों को भी अपनी आपत्ति और सुझाव रखने का मौका मिलेगा।

और यहीं से साफ होगा कि छत्तीसगढ़ में बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनी की एंट्री का रास्ता कितना आसान है।

इस आवेदन, उसके बाद सुनवाई, द लेंस की खबर में इसका खुलासा और फिर जन सुनवाई की तारीख के बाद असली सवाल यही है कि छत्तीसगढ़ की बिजली व्यवस्था किसके हाथ में रहेगी? सरकार के… या निजी कंपनियों के?

और अगर निजी कंपनियां बिजली बांटेंगी… तो उसका फायदा उपभोक्ता को मिलेगा या कंपनी को?

इन सभी सवालों का जवाब अब 1 अक्टूबर की जनसुनवाई और उसके बाद CSERC के फैसले से सामने आएगा।

द लेंस लगातार जनहित में बिजली के सवाल को उठा रहा है। हमारी इस मुद्दे पर नजर बनी रहेगी।

दानिश अनवर

दानिश अनवर, द लेंस में जर्नलिस्‍ट के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्हें पत्रकारिता में करीब 14 वर्षों का अनुभव है। द लेंस से पहले दैनिक भास्‍कर में इन्‍वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग टीम में सीनियर रिपोर्टर, नवभारत में क्राइम रिपोर्टर, नईदुनिया में स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट और पत्रिका अखबार में रिपोर्टर के तौर पर 10 साल काम किया। इन सभी अखबारों में दानिश अनवर ने विभिन्न विषयों जैसे- क्राइम, पॉलिटिकल, एजुकेशन, स्‍पोर्ट्स, कल्‍चरल और स्‍पेशल इन्‍वेस्टिगेशन स्‍टोरीज कवर की हैं। दानिश को प्रिंट का अच्‍छा अनुभव है। वह सेंट्रल इंडिया के कई शहरों में काम कर चुके हैं।

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