भरोसे का बिखरना: CJI सूर्यकांत और भारतीय न्यायपालिका का संकट

– S.Vikram
Political commentator

NALSAR हैदराबाद और TISS मुंबई के छात्रों द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत(Suryakant) को अपने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में स्वीकार करने पर आपत्ति महज युवाओं की अवज्ञा की कोई अलग-थलग घटना नहीं है। यह एक गंभीर और व्यवस्था-स्तरीय चेतावनी है—एक ऐसा संकेत कि भारतीय न्यायपालिका, जिसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक उम्मीद का आखिरी गढ़ माना जाता रहा है, अपने सबसे युवा और आदर्शवादी नागरिकों का भरोसा खो रही है।

यह घटनाक्रम CJI से जुड़ी विवादित घटनाओं की एक श्रृंखला के बाद सामने आया है। इनमें उनका चर्चित ‘कॉकरोच’ वाला बयान और प्रदर्शनकारी छात्रों से जुड़े मामले में तत्काल सुनवाई न किए जाने की घटना शामिल है।

इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी निष्पक्षता को लेकर युवाओं के बीच सवाल खड़े हुए हैं। जो न्यायपालिका कभी एक स्वतंत्र निर्णायक संस्था के रूप में देखी जाती थी, वह अब एक हिस्से की नजर में सत्ता-प्रतिष्ठान के साथ खड़ी दिखाई दे रही है।

भरोसे का यह क्षरण कानून के शासन और आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

छात्रों का विरोध: संस्थागत उदासीनता के खिलाफ आवाज

छात्रों का विरोध स्पष्ट और सिद्धांत आधारित है। NALSAR में विभिन्न बैचों के लगभग 450 छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर CJI को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर पुनर्विचार की मांग की।

छात्रों ने एक ऐसे गणमान्य व्यक्ति से डिग्री प्राप्त करने को लेकर असहजता जताई, जिसका हालिया सार्वजनिक आचरण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर पुलिस की कथित ज्यादती के आरोपों के संदर्भ में उनके लिए स्वीकार्य नहीं था।

उनकी आपत्ति दो प्रमुख घटनाओं से जुड़ी है।

पहली घटना मई में CJI की “कॉकरोच” वाली मौखिक टिप्पणी की है। इसे व्यापक रूप से बेरोजगार युवाओं के संदर्भ में समझा गया और इस पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।

बाद में CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी या बोगस कानून की डिग्री रखने वाले लोगों के लिए थी, न कि सामान्य बेरोजगार युवाओं के लिए। इसके बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ। इसी टिप्पणी के बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम सामने आया और यह नाम NEET तथा परीक्षा से जुड़े मुद्दों पर चल रहे छात्र आंदोलन से जुड़ गया।

दूसरी और अधिक गंभीर घटना 22 जुलाई की है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के आरोपों को लेकर एक वकील ने CJI की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने तत्काल सुनवाई की मांग की। वकील ने पुलिस की कथित बर्बरता के वीडियो होने का भी उल्लेख किया।

पीठ ने तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की। CJI सूर्यकांत ने कहा, ‘We are not interested in videos; we don’t have time to watch.’ उन्होंने वकील से यह भी कहा कि समय बर्बाद न करें।

हालांकि बाद में CJI ने स्पष्ट किया कि कोई औपचारिक याचिका दाखिल नहीं की गई थी, बल्कि केवल एक प्रतिनिधित्व दिया गया था। उन्होंने कहा कि उचित प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल होने पर अदालत उस पर सुनवाई कर सकती है।

फिर भी छात्रों और उनके समर्थकों के एक हिस्से ने इस घटनाक्रम को उनकी शिकायतों के प्रति असंवेदनशीलता के रूप में देखा।

संवैधानिक जवाबदेही और न्याय तक पहुंच के महत्व की शिक्षा पाने वाले कानून के छात्रों के लिए यह गंभीर चिंता का विषय बना।

2018 के विद्रोह से आज तक: टूटे भरोसे का सिलसिला

मौजूदा संकट 2018 की उस अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस की याद दिलाता है, जिसमें तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा के खिलाफ चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने खुलकर अपनी चिंताएं सामने रखी थीं। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर संस्था को बचाया नहीं गया तो ‘लोकतंत्र जीवित नहीं रहेगा।’

हालांकि उस घटनाक्रम के बाद कुछ सुधारात्मक कदम उठे, लेकिन उससे जुड़े संस्थागत सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।

इसके बाद न्यायमूर्ति रंजन गोगोई का कार्यकाल भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संस्थागत नैतिकता को लेकर बहस का विषय बना।

उन्होंने दीपक मिश्रा के बाद CJI का पद संभाला। बाद में उन पर सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए।

इन आरोपों की जांच सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों वाली इन-हाउस कमेटी ने की। इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे ने की और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी तथा न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा भी समिति में थीं। समिति ने आरोपों में ‘कोई तथ्य नहीं’ पाया।

हालांकि शिकायतकर्ता ने जांच प्रक्रिया से असहमति जताते हुए उसमें आगे भाग लेने से इनकार कर दिया था और प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे।

इसके कुछ ही महीनों बाद, नवंबर 2019 में CJI पद से सेवानिवृत्त होने वाले रंजन गोगोई को मार्च 2020 में केंद्र सरकार की सिफारिश पर राज्यसभा के लिए नामित किया गया।

इस नियुक्ति ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों को मिलने वाले राजनीतिक पदों को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी।

जिस व्यक्ति ने कभी न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता के क्षरण को लेकर चिंता जताई थी, उनके सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक पद स्वीकार करने को आलोचकों ने उसी संस्थागत समस्या के संदर्भ में देखा।

संरचनात्मक संकट: कानून का शासन और लोकतांत्रिक क्षरण

छात्रों का विरोध न्यायपालिका और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच कथित निकटता को लेकर उठ रहे सवालों को सामने लाता है। यह सवाल कानून के शासन और लोकतंत्र के मूल स्वभाव से जुड़े हैं।

डाइसी की अवधारणा के अनुसार, कानून का शासन इस बात पर आधारित है कि राज्य और व्यक्ति के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है और एक स्वतंत्र न्यायपालिका व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षक के रूप में खड़ी होती है।

जब न्यायपालिका पर यह भरोसा कमजोर पड़ता है, खासकर उसके सबसे युवा नागरिकों के बीच, तो कानून के शासन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

आधुनिक लोकतंत्र की नींव नागरिक की संप्रभुता पर टिकी है। अगर व्यक्ति को शक्तिशाली राज्य को चुनौती देने के लिए न्यायपालिका पर भरोसा नहीं रहता, तो राज्य को जवाबदेह ठहराने की लोकतांत्रिक क्षमता कमजोर पड़ती है।

यही कारण है कि छात्रों का विरोध न्यायपालिका को उसके मूल संवैधानिक दायित्व की याद दिलाने वाली कार्रवाई के रूप में देखा जा सकता है।

NALSAR के छात्रों ने अपने पत्र में कहा कि ऐसे गणमान्य व्यक्ति से अपनी डिग्री प्राप्त करना, जिनका हालिया सार्वजनिक आचरण, उनके अनुसार, विश्वविद्यालय में सिखाए गए मूल्यों के साथ असहज रूप से टकराता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि इन घटनाओं से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि न्यायपालिका ने कानून का शासन समाप्त कर दिया है। लेकिन इतना जरूर है कि इन घटनाओं ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और नागरिकों के भरोसे को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

यही भरोसा कानून के शासन की वास्तविक ताकत है।

निष्कर्ष: संकट की कगार से वापस लौटना

युवाओं के बीच CJI सूर्यकांत की प्रतिष्ठा को लेकर उठे सवाल न्यायपालिका के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यह दिखाता है कि भरोसे का संकट केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है; यह उस पीढ़ी के बीच भी दिखाई दे रहा है जो आने वाले समय में लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी संभालेगी।

2018 के घटनाक्रम और उसके बाद की बहस ने दिखाया कि व्यक्तिगत साहस, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, संस्थागत समस्याओं का लंबे समय तक सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

NALSAR और TISS के छात्रों की प्रतिक्रिया इस बात का संकेत है कि अब न्यायपालिका के बाहर से भी संस्थागत जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग बढ़ रही है।

अब जिम्मेदारी केवल CJI की नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका की है कि वह समय रहते इस भरोसे के संकट को समझे।

पारदर्शी प्रक्रियाओं, संस्थागत समीक्षा और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले राजनीतिक पदों को लेकर स्पष्ट नियम जैसे संरचनात्मक बदलावों के बिना भरोसे का यह संकट बना रह सकता है।

न्यायपालिका की वास्तविक ताकत केवल उसके संवैधानिक अधिकार में नहीं, बल्कि नागरिकों के उस भरोसे में है कि जब राज्य और व्यक्ति आमने-सामने हों, तब अदालत व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ी होगी।

अगर यह भरोसा लगातार कमजोर होता गया, तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक की वैधता और प्रभावशीलता दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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