क्या न्यूज चैनल अपने फ़ील्ड रिपोर्टरों की पिटाई से कोई सबक़ लेंगे?

इसे देखना वाक़ई हृदय विदारक था।नीट पेपर लीक के ख़िलाफ़ जंतर-मंतर चल रहे आंदोलन को कवर करने पहुँची एबीपी चैनल की एक रिपोर्टर कॉक्रोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके से शिकायत कर रही थीं कि उनके मंच से ‘इन्क़लाब ज़िंदाबाद’ जैसा ‘आपत्तिजनक’ नारा क्यों लग रहा है? उसे पता नहीं था कि इस नारे के साथ शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का नाम नत्थी है। ज़ाहिर है, उसका मज़ाक़ बन गया।

इसे मौजूदा मीडिया के हाल का एक प्रतिनिधि उदाहरण कहा जा सकता है। सामान्य ज्ञान से वंचित और व्हाट्सऐप युनिवर्सिटी से प्रशिक्षित लोगों के हाथ में बड़े-बड़े चैनलों का माइक है जिस पर सवाल सरकार से नहीं उसके विरोधियों से पूछा जाता है। कथित मुख्यधारा मीडिया सरकार के हर क़दम का साथ देते हुए विपक्ष या सरकार के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को किसी न किसी विदेशी साज़िश का हिस्सा बताने का काम इस निरपवाद रूप से कर रहा है कि लोग आजिज़ आ चुके हैं। जंतर-मंतर पर जिस दिन पुलिस ने छात्रों पर लाठी चलायी, उस दिन भी कई रिपोर्टर छात्रों को ही दोषी बता रहे थे। नतीजा ये हुआ कि उन पर हमला हुआ और यह सिलसिला दिल्ली से लेकर पटना तक फैल गया।

इन पंक्तियों का लेखक आज से बीस साल पहले स्टार न्यूज़ (अब एबीपी) का लखनऊ ब्यूरो सम्भाल रहा था। तब आज की तरह पिट्ठी बैग में समा जाने वाली ‘लाइव व्यू मशीनें (सीधे प्रसारण का उपकरण) नहीं होती थीं। इसके लिए ओबी वैन होती थीं जो बाद में तो छोटी कारों में बनने लगीं, लेकिन उस समय बड़े-बड़े ट्रक होते थे। ये वैन दूर से ही नज़र आती थीं और लोगों में उम्मीद भर देती थीं। रिपोर्टर और चैनलों का माइक देखते हुए आम लोग नई शक्ति का अहसास करते थे। उन्हें लगता था कि उनकी समस्या अब सरकार के बहरे कानों तक ज़रूर पहुँचेगी। रिपोर्टरों की मेहमान की तरह जो आवभगत होती थी, उसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती।

लेकिन आज आवभगत जूते-चप्पलों से हो रही है। कोई थूक रहा है तो कोई पीछे से लात मार रहा है। एक नहीं, सभी चैनलों के फ़ील्ड रिपोर्टर्स का यही हाल है जबकि ये महज़ प्यादे हैं। बारह साल पहले जब इसी जंतर-मंतर पर अन्ना का आंदोलन शुरू हुआ था तो चैनलों के तमाम संपादक, यहाँ तक कि कुछ मालिक भी समर्थन करने पहुँचे हुए थे। पूरा मीडिया ‘अन्नामय’ हो गया था। तब यह बात सहज स्वाभाविक लगती थी क्योंकि भारतीय मीडिया की परंपरा हमेशा से सरकार को असहज करने वाली रही है। अख़बार में बाइलाइन या चैनल में पीटीसी (पीस टू कैमरा) होने की शर्त ही यह होती थी कि स्टोरी में सरकार, किसी मंत्री या किसी बड़े अफ़सर की पोल खोली गयी हो।

लेकिन आज यह बात साफ़ है कि अन्ना आंदोलन में दिखा मीडिया का रुख़ किसी प्रतिबद्धता का नहीं, एक षड्यंत्र का नतीजा था। वह इस देश के कॉरपोरेट की योजना का हिस्सा था जो कांग्रेस की सरकार को हटाकर ‘बिज़नेस फ्रैंडली’ नरेंद्र मोदी को सत्ता में लाना चाहता था। 2014 में उनकी साज़िश सफल हो गयी। इसके बाद तो भारत में मीडिया और सरकार के बीच ऐसी जुगलबंदी शुरू हुई जिसकी कोई मिसाल नहीं। यह सिर्फ़ आर्थिक नीतियों के समर्थन तक सीमित नहीं रहा। समाज को धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित करने की बीजेपी की रणनीति को सफल बनाने में उसने धरती-आसमान एक कर दिया। भारत का मीडिया दुनिया की नज़र में अब एक दंगाई मीडिया है। सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाला भारतीय मीडिया वर्ल्ड रैंकिंग में 157वें स्थान पर यूँ नहीं नहीं है।

नीट पेपर लीक के मुद्दे पर भी मीडिया आमतौर पर सरकार की भाषा बोलता रहा। सीजेपी का मज़ाक़ बनाया गया और जब जंतर-मंतर पर भीड़ उमड़ने लगी तो उनके प्रदर्शन के पीछे तमाम विदेशी साज़िश का क़िस्सा गढ़ा। पुलिसिया लाठी चार्ज को भी ‘मजबूरी’ क़रार दिया।

ऐसे में लोगों का ग़ुस्सा फ़ील्ड रिपोर्टर पर उतर रहा है जो उचित नहीं है। लेकिन जिन स्टार एंकर्स और चैनल मालिकों की वजह से यह ग़ुस्सा पैदा हुआ है, वे तो फ़ील्ड से ग़ायब हैं। उल्टा चित्रा त्रिपाठी जैसी ऐंकर बता रही हैं कि कश्मीर में उन्हें ऐसे ही ‘इंडियन मीडिया गो बैक’ का नारा सुनना पड़ता था। इशारा ये है कि जंतर-मंतर पर इकट्ठा छात्र दरअसल अलगाववादी हैं।

ऐसा नहीं है कि इतिहास में ऐसा हुआ नहीं। हिटलर के प्रचारमंत्री जोसेफ गोएबल्स ने अखबारों, रेडियो, फिल्मों और थिएटर पर पूरा नियंत्रण कर लिया था। मीडिया का इस्तेमाल यहूदियों के खिलाफ घृणा फैलाने, हिटलर की महिमा बढ़ाने और युद्ध को सही ठहराने के लिए किया। पिछली सदी के आख़िरी दशक में रेडियो रवाँडा ने भी नरसंहार की स्थिति लाने में ख़तरनाक भूमिका अदा की थी।

हिटलर के पतन के बाद हुए ‘नूर्नबर्ग ट्रायल’ में जूलियस स्ट्रीचर (यहूदी-विरोधी अखबार डेर स्टर्मर का प्रकाशक) को प्रचार और उकसावे के लिए फाँसी दी गई। कुछ अन्य प्रचारकों को भी सजा हुई।कुछ अन्य को भी देशद्रोह के आरोप में फाँसी हुई। रवांडा नरसंहार (1994) के लिए रेडियो टेलीविजन लिब्रे देस मिल कोलिन (आरटीएलएम) और अखबार कांगुरा के मालिकों/संपादकों (फर्डिनेंड नाहिमाना, जीन-बोस्को बरायाग्विजा, हसन नगेजे) को नरसंहार उकासने के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल में उम्रकैद या लंबी सजा हुई।

निश्चित ही भारत को उस दिन का इंतज़ार है जब ‘रिपब्लिक’ के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने वाले संपादकों और मालिकों का स्पेशल ट्रिब्युनल में ट्रायल होगा। उन्हें कड़ी सज़ा दी जाएगी।

ब्रिटिश सांसद एडमंड बर्क ने 1787 में संसद की प्रेस रिपोर्टर गैलरी को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा था जो तीन एस्टेट्स (क्लर्जी, नोबिलिटी, कॉमन्स) से ज़्यादा महत्वपूर्ण था। आशय यही है कि वह विधायिका, कार्यपालिका ही नहीं, न्यायपालिका पर भी भी नज़र रखे। सचमुच ‘वॉचडॉग’ बने जो हर ग़लत चीज़ को देखकर भौंके। लेकिन भारत का कथित मुख्यधारा मीडिया वॉचडॉग की जगह सत्ता की गोदी में बैठा ‘लैपडॉग’ बन गया है जो सरकार से सवाल करने वालों पर भौंक पड़ता है। नतीजा ये है कि फ़ील्ड रिपोर्टर्स फ़ील्ड में पिट रहे हैं जो आपत्तिजनक जितना हो, अस्वाभाविक बिल्कुल नहीं है। पर सवाल तो ये है कि क्या चैनल इन घटनाओं से सबक़ लेकर अपनी खोई साख वापस पाने के लिए कुछ करेंगे?

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now