अमेरिका और ईरान की इस ‘विन विन सिचुएशन’ में भारत कहां है? भारत के घाटे की भरपाई कौन करेगा? अमेरिका ईरान में समझौता हो गया। दोनों फायदे में हैं। आगे (शायद) अमन से रहेंगे। भारत इस लड़ाई में शामिल नहीं था। हमने एक गोली तक नहीं चलाई फिर भी इतना नुकसान हुआ। अमेरिका और ईरान अपने समझौते को विन विन सिचुएशन कह रहे हैं। सवाल यह है कि इस सारे फसाद में में भारत को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
हॉर्मुज स्ट्रेट में में तीन भारतीय नाविकों की मौत की रिपोर्ट सामने आई, जब ओमान के पास एक तेल टैंकर पर अमेरिकी कार्रवाई हुई। भारत युद्ध में शामिल नहीं था, लेकिन अप्रत्यक्ष असर हुआ. तेल और गैस की आपूर्ति पर दबाव, समुद्री मालभाड़ा और बीमा महंगा हो गया, रुपया और आयात लागत पर दबाव पड़ा, खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों की कमाई मारी गई।
दुनिया में युद्ध अब पहले जैसे नहीं रहे। कभी युद्ध का मतलब होता था, टैंक, सैनिक, सीमा, गोला बारूद, ख़ूंरेज़ी, कब्ज़ा और हार-जीत। अब युद्ध का नया एडिशन आ गया है। अब मिसाइलें चलती हैं, लेकिन असली धमाका तेल के दाम में होता है। जहाज समुद्र में चलते हैं, लेकिन डूबता शेयर बाजार है। सीमा किसी और की होती है, महंगाई आपकी हो जाती है।
और इन आधुनिक युद्धों में एक नया किरदार पैदा हुआ है – वह जो लड़ता नहीं, लेकिन भुगतान उसी से लिया जाता है।
नाम है भारत।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा। बयान आए। चेतावनियां आईं। सैन्य कार्रवाई की खबरें आईं। समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ा। दुनिया भर के टीवी चैनलों ने नक्शे दिखाए, एंकरों ने आवाज ऊंची की और विशेषज्ञों ने समझाया कि यह विश्व व्यवस्था के लिए निर्णायक क्षण है।
फिर अचानक समझौते की खबर आई।
कुछ लोगों ने इसे कूटनीति की जीत कहा।
कुछ ने शक्ति संतुलन कहा।
कुछ ने इसे ‘विन–विन सिचुएशन’ घोषित कर दिया।
अमेरिका ने कहा देखिए – हमने क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित की।
ईरान ने कहा देखिए – हमने दबाव के आगे झुकने से इनकार किया।
बाजार ने कहा – अच्छा है, अब थोड़ा आराम मिलेगा।
और भारत?
भारत अपने कैलकुलेटर में तेल आयात का हिसाब लगाने बैठ गया। क्योंकि इस पूरी कहानी में भारत का रोल वैसा था जैसा किसी शादी में उस रिश्तेदार का होता है जिसे बुलाया तो नहीं गया, लेकिन बिल बांटने के समय उसका नाम सबसे ऊपर लिख दिया गया।
हम युद्ध में नहीं थे।
हमने किसी पर हमला नहीं किया।
हम किसी पक्ष में नहीं खड़े हुए।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें असर नहीं हुआ।
यह वैश्वीकरण का नया खतरनाक गणित है – गोली वहाँ चलती है, जेब यहां कटती है।
भारत की एक पुरानी आदत है। हम दुनिया की हर बड़ी घटना पर कहते हैं कि हम संतुलित हैं, तटस्थ हैं, रणनीतिक रूप से स्वतंत्र हैं।
समस्या यह है कि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तटस्थता को नहीं पहचानती।
तेल बेचने वाला आपसे नहीं पूछता कि आप युद्ध में थे या नहीं।
बीमा कंपनी यह नहीं पूछती कि आपकी विदेश नीति क्या थी।
जहाज यह नहीं देखता कि आपने संयुक्त राष्ट्र में किसे वोट किया था।
उसे केवल जोखिम दिखता है और उसका बिल बना दिया जाता है।
जैसे ही पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा, सबसे पहले तेल बेचनेवाले तेलियों ने प्रतिक्रिया दी।
और तेल का स्वभाव बड़ा दिलचस्प है।
जब कीमत बढ़ती है तो उसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता।
ट्रक महंगा।
परिवहन महंगा।
सब्ज़ी महंगी।
उद्योग महंगा।
बिजली महंगी।
और अंत में वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं – “महंगाई वैश्विक कारणों से बढ़ी है।”
यह ‘वैश्विक कारण’ बड़ा रहस्यमय शब्द है।
जब फायदा हो तो उसे नीति कहते हैं।
जब नुकसान हो तो उसे वैश्विक परिस्थिति।
फिर समुद्री व्यापार का अध्याय शुरू होता है।
जहाजों के बीमा प्रीमियम बढ़ जाते हैं।
जहाज नए रास्ते ढूँढते हैं।
डिलीवरी लेट होती है।
और अचानक हमें समझ में आता है कि जो चीज़ ऑनलाइन पाँच दिन में आती थी, वह अब पंद्रह दिन में क्यों आ रही है। पेट्रोल डीज़ल महंगा हो जाता है। रसोई की गैस की किल्लत हो जाती है। कमर्शियल गैस के सिलेंडर महंगे हो जाते हैं। माल भाड़ा बढ़ जाता है। दूध, सब्जी, फल , दवाई सब महंगे हो जाते हैं। सीएनजी और पीएनजी का कमर्शियल सप्लाय थम जाता है। ईंधन के रूप में गैस का उपयोग करनेवाली फैक्ट्रियां थम जाती हैं। टाइल्स के कारखाने, बर्तन के कारखाने बंद हो जाते हैं। मकानों का निर्माण रुक जाता है। लाखोंलोग काम-धंधा खो देते हैं। कोई चूं नहीं करता। विदेश यात्राएं टल जाती हैं। कई सर्विसेस बंद हो जाती हैं। आर भी आई एक नया आंकड़ा जुमले की तरह उछालता है कि महंगाई थोक में इत्ती बढ़ेगी, फुटकर में इतनी।
बस, महंगाई केवल आंकड़ा ही है क्या ?
यानी समुद्र में तनाव पैदा हुआ, और आपका मोबाइल कवर देर से पहुँचा। अस्पतालों की मशीनरी देर से आने लगी। सरकार ने पेट्रोल डीजल में न केवल मिलावट की मंजूरी दी, बल्कि मिलावट का प्रतिशत भी तय कर दिया। कारों के इंजन खराब हों, तो हों! प्रदूषण बढ़े तो बढ़े !
कितना सुंदर है आधुनिक विश्व!
इसके बाद आती है मुद्रा।
रुपया।
यह बेचारा हर अंतरराष्ट्रीय संकट में ऐसा व्यवहार करता है जैसे किसी संयुक्त परिवार का सबसे जिम्मेदार सदस्य, जिससे सब उम्मीद करते हैं कि वह संभाल लेगा।
उधर तनाव बढ़ता है।
इधर रुपये पर दबाव।
फिर अर्थशास्त्री टीवी पर आते हैं और कहते हैं—“स्थिति नियंत्रण में है।”
यह वाक्य भारतीय नागरिक को हमेशा डराता है।
क्योंकि भारत में जब कहा जाता है कि सब नियंत्रण में है, तब आम आदमी जेब टटोलना शुरू कर देता है।
और इस पूरी कहानी का सबसे कम दिखाई देने वाला पक्ष है—भारतीय प्रवासी।
खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय।
दुनिया जब युद्ध और समझौते की सुर्खियां देख रही होती है, तब ये लोग नौकरी, वेतन, अनुबंध और भविष्य का हिसाब लगा रहे होते हैं।
लेकिन इनकी कहानी अक्सर किसी टीवी बहस का हिस्सा नहीं बनती।
फिर एक दिन समझौता हो जाता है।
हाथ मिलते हैं।
घोषणाएं होती हैं।
बयान आते हैं।
और तब भारत का नागरिक वह सरल प्रश्न पूछता है—
ठीक है, नुकसान हुआ है।
अब इसकी भरपाई कौन करेगा?
क्या अमेरिका करेगा?
क्या ईरान करेगा?
क्या कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था करेगी?
उत्तर आता है—
नहीं।
क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नुकसान की भरपाई नहीं होती।
उसकी व्याख्या होती है।
आपको कोई चेक नहीं मिलेगा।
हां, आपको शब्द मिलेंगे—
रणनीतिक स्थिरता।
क्षेत्रीय संतुलन।
ऊर्जा सुरक्षा।
वैश्विक पुनर्संतुलन।
इन शब्दों का काम यह समझाना होता है कि जो हुआ, वह होना ही था।
और आपका नुकसान इतिहास की कीमत है।
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बड़ी ईमानदार चीज़ है।
जब व्यापार खुलता है तो कहा जाता है कि सबको फायदा होगा।
जब संकट आता है तो कहा जाता है कि सबको थोड़ा नुकसान सहना होगा।
लेकिन यह ‘थोड़ा’ किसके लिए कितना है, इसका हिसाब कोई नहीं रखता।
तो भारत क्या करे?
क्या हर युद्ध का मुआवजा माँगे?
नहीं।
क्या हर संकट पर शिकायत करे?
नहीं।
असल सवाल यह है कि क्या भारत अपनी निर्भरता कम करेगा?
क्या ऊर्जा के स्रोत बढ़ाएगा?
क्या समुद्री व्यापार को अधिक सुरक्षित बनाएगा?
क्या अपने रणनीतिक भंडार मजबूत करेगा?
क्या वह केवल संकट झेलेगा या उससे अवसर भी निकालेगा?
क्योंकि भू-राजनीति का सबसे बड़ा नियम यही है—
दूसरे देशों की सद्भावना से कोई देश सुरक्षित नहीं होता, वह अपनी तैयारी से सुरक्षित होता है।
और शायद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जब युद्ध होता है, तब विजेता तय होने में समय लगता है।
लेकिन बिल बहुत जल्दी बन जाता है।
और वह अक्सर उन देशों तक पहुँच जाता है जिन्होंने युद्ध लड़ा ही नहीं।
इसलिए अगली बार जब कोई वैश्विक नेता मुस्कुराते हुए कहे कि यह एक “विन–विन सिचुएशन” है—
तो भारत को धीरे से पूछ लेना चाहिए—
विन–विन ठीक है… लेकिन हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है










